जागर संरक्षण दिवस व जागर सम्राट श्री प्रीतम भरतवाण जी के जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ – डॉ, दीपक सिंह

जागर संरक्षण दिवस व जागर सम्राट श्री प्रीतम भरतवाण जी के जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ – डॉ, दीपक सिंह
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“जागर संरक्षण के लिए आना होगा ‘ओजी वर्ग’ को आगे”

जागर संरक्षण दिवस व जागर सम्राट श्री प्रीतम भरतवाण जी के जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ 

आज से लगभग 10-15 वर्ष पूर्व उत्तराखंड अपनी संस्कृति और सभ्यताओं से परिपूर्ण प्रदेश हुआ करता था, लेकिन जैसे-जैसे यह प्रदेश विकास के पथ पर आगे बढ़ने लगा वैसे-वैसे अपनी गौरवमयी पौराणिक परम्पराओं व संस्कृतियों से दूर होते चला गया और आज वक़्त यहाँ तक पहुंच गया कि प्रदेश की लोक संस्कृति व परम्पराएं विलुप्ति के मुहाने पर आ खड़ी हुई है। अगर आज भी अपनी धरोहरों, परम्पराओं को बचाए रखने के कुछ प्रयास नहीं किये गए तो सम्भव है कि कुछ वर्ष बाद हमें यह परम्पराएँ सिर्फ चित्रों में ही देखने और पढ़ने को मिलेंगी। इन्हीं परम्पराओं व धरोहरों में से एक है पहाड़ की मशहूर जागर शैली, जागर नृत्य और पावड़े, जो आज विप्लुप्ति की कगार पर पहुँच चुके हैं। यहाँ तक की इन्हें प्रस्तुत करने वाले “औजी” वर्ग भी इन्हें अब हीन भावनाओं से देखने लगे हैं और वह अपनी इस परम्परा व संस्कृति को छोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर निकल पड़े हैं, लेकिन कुछ हद तक जिस प्रकार से पिछले कुछ वर्षों से जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण ने इस जागर शैली का परचम पूरी दुनिया में लहराया है,

उससे अब एक उम्मीद जागने लगी है कि एक बार फिर से औजी वर्ग इसे अपनाकर, इसे आने वाली पीढ़ी के लिए संवार के रखेंगे। इसी क्रम में आपको विदित होगा कि जीवन भर पहाड़ की पीड़ा समझने वाले श्री राजीव नयन उनियाल जी, जो ‘घायल’ उपनाम से पूरे पहाड़ में विख्यात हैं। उन्होंने वर्ष 1978 ई0 में डाँडी काँठी क्लब की स्थापना की थी, जो क्लब पहाड़ के एक बड़े संगठन के रूप में धीरे-धीरे प्रसिद्ध हुआ, लेकिन वर्ष 2002 में लोचन जी के देहांत के बाद डाँडी काँठी क्लब के कार्यभार की जिम्मेदारी उनके बड़े पुत्र विजय भूषण उनियाल के कंधों में आ गई थी, जिन्होंने इस क्लब को आगे बढ़ाने का अथक प्रयास किया। इस क्लब द्वारा वर्ष 2016 में तीन दिवसीय डाँडी काँठी महोत्सव का आयोजन कर 17 सितम्बर 2016 को पद्मश्री प्राप्तकर्ता श्री प्रीतम भरतवाण के जन्मदिन को ‘जागर संरक्षण दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया, जिस कारण से आज प्रतिवर्ष डाँडी काँठी क्लब द्वारा 17 सितम्बर को श्री प्रीतम भरतवाण के जन्मदिन को ‘जागर संरक्षण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। डांडी-कांठी क्लब के अध्यक्ष विजय भूषण उनियाल के अनुसार- “यह क्लब समय समय पर अपनी संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए प्रयास करता रहता है। क्लब खेल प्रतियोगिताए, लोक महोत्सव एंव विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से संस्कृति को संजोय रखने के लिए प्रतिबद्ध है।”

प्रीतम भरतवाण उत्तराखण्ड के विख्यात लोक गायक हैं, जिन्होंने वर्ष 1995 में अपनी पहली ‘एल्बम तोंसा बौ’ के नाम से निकाली और दूसरी ‘सरूली’ के नाम से, जिस अल्बम के गीत ‘सरूली मेरू जिया लगी गे’ को लोगों द्वारा खूब पसंद किया गया और इस एल्बम के बाद मानो उनकी ज़िन्दगी ही बदल गयी। भारत सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें पद्मश्री पुरूस्कार से सम्मानित किया था। कालांतर में वे उत्तराखण्ड में बजने वाले ढोल ज्ञाता के रूप में प्रसिद्ध हैं। श्री भरतवाण जी ने राज्य की विलुप्त हो रही संस्कृति को बचाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। प्रीतम जी एक अच्छे जागर गायक और ढोल वादक के साथ ही एक अच्छे लेखक भी हैं। उन्हें ढोल के अलावा दमाऊ, हुड़का और डौंर-थकुली बजाने में भी महारत हासिल है। उन्होंने जागरों के साथ ही लोकगीत, घुयांल और पारंपरिक पवाणों को भी नया जीवन देने का काम किया है। जागरों सम्राट के नाम से मशहूर प्रीतम भरतवाण आज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर के कई देशों जैसे दुबई, ओमान, कनाडा, इंग्लैंड, मस्कट, ऑस्ट्रलिया, न्यूजीलैंड, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में भी अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं और लोगों को अपने जागरों की भोंण पर थिरकने को मजबूर कर देते हैं।

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