दैणा होया खोली का गणेशा हो दैणा होया मोरी का नरेणा हो, गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर

दैणा होया खोली का गणेशा हो दैणा होया मोरी का नरेणा हो, गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर
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गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं..💐💐

आज 10 सितंबर को रिद्धि-सिद्धि के दाता, प्रथम पूज्य, लोक मंगल के देवता, सुख संपदा और समृद्धि प्रदान करने वाले देवता भगवान श्रीगणेश का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। भाद्रपद माह की गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति घर-घर विराजते हैं। पंडालों में इनकी बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं सभी के आर्कषण का केंद्र बिन्दु होती हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र व रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्रीगणेश से अधिक लोकप्रिय शायद ही कोई देवता होंगे, क्योंकि हर शुभ कार्य का शुभारंभ ”श्री गणेशाय नमः” से होता है। भगवान गणेश ज्ञान और बुद्धि के देवता हैं। ये विघ्नहर्ता, परेशानियों को दूर करने वाले और सभी देवताओं में प्रथम पूज्य गणाधिपति ही हैं, जिन्हें किसी दूसरे का आदेश मानने की मजबूरी नहीं। शास्त्रों में भगवान गणेश के कई स्वरूपों का वर्णन किया गया है और मान्यता है कि इनके हर एक 32 रूप में सुख और समृद्धि का वास होता है।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

मान्यता है कि भगवान श्रीगणेश जी का जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद में हुआ था। कहा जाता है कि उत्तरकाशी जनपद में स्थित एक खूबसूरत झील डोडीताल के पास गणेश जी का जन्म हुआ था। मान्यता यह भी है कि उत्तरकाशी जनपद में मां गंगा और यमुना का मायका हैं। इसलिए उत्तरकाशी जनपद का भगवान श्रीगणेश जी से भी संबन्ध बताया जाता है। कहा जाता है कि माता पार्वती जब डोडीताल में स्नान करने जा रही थी, तब उन्होंने अपने उबटन से एक बालक की प्रतिमा तैयार की थी और उन्हें उस प्रतिमा की मूरत इतनी भा गई थी कि शिव भगवान ने उसमें प्राण डाल दिए थे। यही बालक संसार में भगवान श्रीगणेश जी के नाम से विख्यात हुए। आज भी उत्तरकाशी जनपद में माँ पार्वती अन्नपूर्णा के रूप में विराजमान है साथ ही भगवान श्रीगणेश भी माता जी की सेवा में विराजमान हैं।

इतिहास के वाक्यांश में भले ही गणपति उत्सव की शुरुआत वर्ष 1893 में महाराष्ट्र से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने की, जो उत्सव वर्ष 1893 से पहले भी महाराष्ट्र में मनाया जाता था पर वह उत्सव सिर्फ घरों तक ही सीमित था। उस समय आज की तरह पंडाल नहीं बनाए जाते थे और ना ही सामूहिक गणपति विराजते थे। लेकिन गढ़वाल हिमालय में श्रीगणेश भगवान जी की बात करें तो यहाँ श्रीगणेश जी पुरातन से ही यहाँ के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन में सर्वोपरि स्थान रखते हैं। जैसे कि सबको विदित है कि गढ़वाल हिमालय के अधिकांश दुमंजिले भवनों में प्रवेश करने के लिए भवनों के मध्य में एक सीढ़ीनुमा प्रवेश द्वार बनाया जाता था, जिसे ‘खोली’ कहा जाता है। इस प्रवेश द्वार (खोली) पर नक्काशी करके ऊपर से श्रीगणेश की मूर्ति बनाई जाती थी, जो आज भी गढ़वाल हिमालय के अधिकांश घर-गांवों में देखने को मिलती है। इस परंपरा की झलक

सुप्रसिद्ध लोकगायक श्री नरेन्द्र सिंह नेगी के निम्नलिखित गीत से भी मिलती है

बीजी जावा हे खोली का गणेश
बीजी जावा बीजी हे मोरी का नारैण
दैणा होया खोली का गणेशा हो…..
दैणा होया मोरी का नरेणा हो ….
दैणा होया खोली का गणेशा हो…
दैणा होया मोरी का नरेणा हो ….
‘खोली का गणेश’ गढ़वाल हिमालय के प्रत्येक घर में पवित्रता एवं शगुन का प्रतीक माना जाता है। ‘शुक्रनीति’ नामक ग्रन्थ के अनुसार परमार/पंवार राजवंशों में यह प्रथा और भी प्रचलित थी। साथ ही यह विशेषता भी बताई गई है कि उत्तर-भारत में खोली के चित्रों एवं मूर्तियों में श्रीगणेश जी की सूंड बाएँ ओर मुड़ी होती है जबकि गुजरात, महाराष्ट्र व राजस्थान में श्रीगणेश जी की सूंड दाहिने ओर मुड़ी होती है। श्रीगणेश जी की सूंड दाहिनी ओर मोड़ने की यह परंपरा पुरातन है। अतः कहा जा सकता है कि उक्त शैली गढ़वाल हिमालय में परमार वंशी शासकों द्वारा प्रचलित की गई थी।

मान्यता है कि गणेश गुफा (बदरीनाथ-माणा गाँव) नामक स्थान पर श्रीगणेश जी द्वारा ही महाभारत का लेखन कार्य किया गया था जबकि व्यास गुफा (बदरीनाथ-माणा गाँव) से वेदव्यास द्वारा महाभारत का वर्णन किया गया था। इस प्रकार माणा गाँव में स्थित गणेश गुफा महाभारत का लेखन स्थल है।

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