क्यों नहीं बचा पाया हाट गांव अपना अस्तित्व ? – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर

क्यों नहीं बचा पाया हाट गांव अपना अस्तित्व ? – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर
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क्यों नहीं बचा पाया हाट गांव अपना अस्तित्व ?

चमोली जनपद के दशोली ब्लॉक के अन्तर्गत स्थित ऐतिहासिक व सांस्कृतिक हाट गांव नहीं बचा पाया अपना अस्तित्व, क्योंकि हाट गांव में निर्माणाधीन कम्पनी टी0 एच0 डी0 सी0 ने अंग्रेजों की ‘फूट डालो राज करो’ नीति की परिभाषा को भली-भांति चरितार्थ की है। एक पुरानी कहावत है ‘Unity is strength’ अथार्त एकता में शक्ति होती है। यही एकता मेें शक्ति न होने के कारण आज हाट गांव धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अपना अस्तित्व खो चुका है। पौराणिक हाट गांव में रह रहे परिवारों में से एक वर्ग 20वीं सदी के उतरार्द्व से पलायन कर रहा था, जो वर्ग पौराणिक हाट गांव के परिवारों में से आज अपने आप में सबसे मजबूत व शिक्षित वर्ग का है। इसी मजबूत वर्ग में से वर्तमान में दो आई0 ए0 एस0 भारत सरकार के अन्तर्गत सेवारत हैं, जिनमें से एक श्रीमान दीपक गैरोला जी और दूसरे श्रीमान आशीष जोशी जी हैं। आपको यह भी ज्ञात होगा कि श्रीमान आशीष जोशी जी अभी कुछ वर्ष पूर्व (सत्र् 2017-18) अपने पैतृक व गृह जनपद चमोली के जिलाधिकारी के पद पर सेवारत थे। ये वही वर्ग है, जिसने पहले अप्रत्यक्ष रूप से और बाद में प्रत्यक्ष रूप से धीरे-धीरे निर्माणाधीन परियोजना का स्वागत किया है, क्योंकि इस वर्ग को पलायन करने के बाद कभी भी अपने गांव, समाज, संस्कृति व परम्पराओं से कोई लेना-देना नहीं रहा। यहाँ तक कि ये वर्ग 20वीं सदी के उतरार्द्व में पलायन करने के बाद कभी भी मुडकर अपने पैतृक गांव हाट नहीं आया। अतः इस वर्ग के लिए हाट गांव में कम्पनी का आना महज एक तोहफा प्राप्त करना जैसा था। ये वर्ग चाहता तो हाट गांव का अस्तित्व किसी न किसी प्रकार से सुरक्षित रखने में अपनी अहम भूमिका निभाता, लेकिन इस वर्ग ने कभी भी कम्पनी का विरोध नहीं किया, जिसके कारण कम्पनी को अपने मकसद में सफल होने का आसान रास्ता मिल गया।

हाट गांव में दूसरा वर्ग अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का था, जिनके लगभग 20 से 25 परिवार हाट गांव में निवासरत थे। इनमें से बहुत से परिवार के पास मकान के सिवाय कोई भूमि नहीं थी और कुछ ऐसे परिवार भी थे, जिनके पास नाममात्र की जमीन थी। अतः इस वर्ग के लिए भी हाट गांव में कम्पनी का आना मुनाफा से भरा हुआ था, क्योंकि इस वर्ग को लगा कि हमारे लिए लड़ने वाला कोई भी नहीं है। अतःकम्पनी से पैसे मिलते ही पलायन का रास्ता व कम्पनी की पॉलिसी के अनुसार एक व्यक्ति को रोजगार देने की बात ने इनके भीतर खुशियां भर दी थी। इस वर्ग का हाट गांव की संस्कृति परम्पराओं से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं था। अतः इन्हें भी कम्पनी का विरोध करना न्यायोचित न लगा और इस वर्ग ने भी पहले अप्रत्यक्ष और फिर प्रत्यक्ष रूप से कम्पनी का स्वागत किया।

अब एक ऐसा भी वर्ग था, जिस वर्ग के कुछ परिवार दशोली ब्लॉक के अन्य गांवों में एक-दो पीढ़ी से निवासरत थे और इनकी हाट गांव में कुछ पैतृक भूमि थी। अतः इस वर्ग के लिए भी हाट गांव में कम्पनी का आना मतलब एक खुशी का तोहफा आना था। ये ऐसा रहा है, जो कभी हाट गांव गया ही नहीं सिर्फ तहसीलों से अपने दस्तावेज इकट्ठा कर मात्र कम्पनी से पैसे प्राप्त करने की मंशा से कम्पनी के ऑफिसों का चक्कर काटता रहा।
इसके बाद हाट गांव में एक अंतिम निवासरत वर्ग था, जो वर्ग कम्पनी के आने के बाद दो वर्गों में बंट गया। ये वही वर्ग था, जिसमें कम्पनी ने ‘फूट डालो राज करो’ की नीति चरितार्थ की। इसमें से एक वर्ग कम्पनी से अपने हक-हकूक लेकर हाट गांव के सामने मायापुर या अन्य स्थानों पर बसने के लिए राजी हो गया था, क्योंकि इसी वर्ग में से क्रमशः एक के बाद एक अथार्त दो ग्राम प्रधानों ने कम्पनी से मिलकर हाट गांव का भविष्य तय कर दिया था, लेकिन एक वर्ग जिसमें लगभग 10-12 परिवार हैं वे आज तक भी कम्पनी से अपनी मातृभूमि के लिए लड़ रहे हैं, जिन्होंने कम्पनी से अभी तक एक रूपये का मुवाजा तक प्राप्त नहीं किया है और इसी वर्ग में से कालान्तर में हाट गांव के प्रधान श्रीमान् राजेन्द्र हटवाल तथा क्षेत्र पंचायत श्रीमान पंकज हटवाल जी हैं। इन दोनों महानुभाव ने कम्पनी से अपने हक को प्राप्त करने के लिए ही पंचायती चुनाव में भागीदारी ली थी। ये दोनों युवा और कुछ अन्य ग्रामीण मिलकर आज भी कम्पनी का विरोध कर रहे हैं।


हाट गांव की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर को पर्यावरणविद श्रीमान चण्डी प्रसाद भट्ट जी भी नहीं बचा पाए, जो महज हाट गांव से 25 किमी0 की दूरी पर स्थित गोपेश्वर गांव में निवासरत हैं, जो कि शुरू से ही कम्पनी का विरोध कर रहे थे।
हाट गांव के अस्तित्व समाप्त होने से पूरे दशोली ब्लॉक में दुःख की लहर व्याप्त है, क्योंकि हाट गांव की संस्कृति से सिर्फ हाट गांव ही फ़लीभूत नहीं रहा, बल्कि चमोली जनपद के अलग-अलग गांव भी हाट गाँव की संस्कृति से फलीभूत रहे हैं। गढ़वाल हिमालय के समाज में आज भी हाट गाँव के हटवाल ब्राह्मणों द्वारा नौगाँव बण्ड़ व इसके आस-पास स्थित गाँवों के घरों में पूजन-अर्चन व मांगलिक कार्य सम्पन्न किया जाता है। गढ़वाल हिमालय के सभी परिवार आज भी अपने कुल पुरोहित को बुलाकर पूजा व मांगलिक कार्य सम्पन्न करते हैं। अतः हाट गाँव के विद्वानों की ज्योतिषी नागपुर पट्टी के अधिकांश गाँवों से लेकर बदरीनाथ धाम में प्रसारित है।
हाट गांव की ज्योतिष शास्त्र इतनी पल्लवित और पुष्पित थी कि हाट गाँव से वर्ष 1902 ई0 का एक ब्रिटिश पत्र प्राप्त हुआ, जो हाट गाँव के पंडित भीमदत्त हटवाल के नाम पर भेजा गया था। यह पत्र वर्तमान में अधिवक्ता श्री चन्द्रबल्लभ हटवाल के पास सुरक्षित है। इस पत्र कि पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार से हैं-
राजराधेश्वर सपरम् इड़वल्ड की जय
पंडित भीमदत्त हटवाल, हाट
मल्ला नागपुर
सी एस डिप्टी कमिश्नर गढ़वाल
साहनता,
आलम पनाह के ताजपोशी राजतिलक का जलसा विलायत में 19 अगस्त 1902 को हुआ। हिन्दुस्तान में इस जलसे की तारीख 01 जनवरी 1903 है। सरकार गवर्नमंेट ने यह हुक्म फरमाया है। हरजी लह में जलसा ताजपोशी को किया जावे ताकि आमतौर रिआया सरकार इस खुशी में शरीक होने से महरूम न रहे।
डॉ0 अनंतराम हटवाल जिनका जन्म 1948 ई0 में हाट गाँव में हुआ था, जो सेवानिवृति के बाद अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पीपलकोटी में 2014-15 में कार्यरत्त थे। अनंतराम के अनुसार- उनके पिता देवानंद हटवाल के पिता तारादत्त हटवाल 19वीं सदी के महान ज्योतिषाचार्य थे, जो उत्तर प्रदेश के चंदौसी के कुल पुरोहित थे।

दूसरे में हाट गाँव में बिल्लेश्वर महादेव के समीप बिल्वपत्र का सघन बगीचा था, जो 8वीं सदी पुराना था। बिल्वपत्र का ऐसा सघन बगीचा पूरे गढ़वाल क्षेत्र में अन्यत्र कहीं नहीं है। यहाँ तक आज भी हाट गाँव के उत्तर-पूर्व दिशा में कहीं भी बिल्वपत्र के वृक्ष नहीं मिलते हैं। चाहे पाँचवाँ केदार कल्पनाथ महादेव हो या फिर आदि केदारेश्वर महादेव के साथ ही नीति घाटी का प्रसिद्ध टिम्मर महादेव हो। इन मन्दिरोें में श्रावण मास के समय चढ़ाये जाने वाले बिल्वपत्र हाट गाँव से ही ले जाये जाते थे। वर्ष 2020 तक हाट गाँव में बिल्वपत्र के लगभग 90 से 100 के मध्य वृक्ष हरे-भरे थे, जो बिल्व वृक्ष हाट गांव की संस्कृति के साथ धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।

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