जब भी कोई बुढ़िया बोलती है गढ़वाली मुझे याद आने लगती है मेरी दादी – डॉ0 दीपक सिंह

जब भी कोई बुढ़िया बोलती है गढ़वाली मुझे याद आने लगती है मेरी दादी – डॉ0 दीपक सिंह
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मेरे जन्म के कुछ वर्ष बाद गुजर गई थी मेरी दादी
दुःख यही है कि मेरे घर में कोई तस्वीर नहीं है उनकी
पर जब भी कोई बुढ़िया बोलती है गढ़वाली
मुझे याद आने लगती है मेरी दादी
मैं बैठे-बैठे लगता हूँ सोचने
कि कुछ कम-ज्यादा होती चेहरे की झुर्रियाँ
और नाक कुछ छोटी-बड़ी होती
पर होती तो ऐसे ही दिखती मेरी दादी
जिस बूढ़ी दादी की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, फूलती साँसे
तो वह कमर पर हाथ रखकर ऐसे ही कहती—
ऐ माजी मि मर्दु अब
पर अब कभी-कभी सोचता हूँ कि बीस साल बाद
कैसे देख पाएगा कोई गढ़वाली बच्चा
किसी बुढ़िया में अपनी मरहूम दादी??
यही सोचकर मेरा दिल टूट जाता है
कि बीस साल बाद कहीं किसी परदेश में
कोई याद कर रहा होगा अपने पहाड़ को
पर वह कभी नहीं जान पायेगा??
कि सामने बैठा अजनबी उसके पहाड़ से है,
क्योंकि दिन-ब-दिन कम होते जा रहे हैं
मेरी पहाड़ी बोली बोलने वाले लोग
इसलिए भी अब के दौर में किसी और भाषा में बोलती
किसी और बुढिया को देखकर
मुझे कभी भी याद नहीं आई अपनी दादी की

एक पहचान :- “पहाड़ी बोली संरक्षित है जान”

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