पेशावर कांड के महानायक की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन् – डाॅ.दीपक सिंह कुंवर

पेशावर कांड के महानायक की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन् – डाॅ.दीपक सिंह कुंवर
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पेशावर कांड के महानायक की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन्

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसम्बर 1891 को पट्टी चौथन के मांसी रोनशेहरा गढ़वाल के एक साधारण परिवार में हुआ था। वीर चन्द्रसिंह गढवाली का मूल नाम वीर चन्द्र सिंह भण्डारी था। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के पूर्वज चौहान वंश के थे, जो मुरादाबाद में रहते थे लेकिन इनका परिवार काफी समय पहले ही गढ़वाल की राजधानी चांदपुरगढ़ में आकर बस गये थे। इनके पिता जलौथ सिंह भण्ड़ारी अपना गुजर बसर कृषि कार्य से करते थे।

कुंवर सिंह नेगी कर्मठ लिखते है कि चन्द्र सिंह के पिता अपने पुत्र की शिक्षा की व्यवस्था करना चाहते थे पर स्कूल के अभाव के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे अपने पुत्र को दूर के स्कूल में भी नहीं भेज सके। अतः गांव के थोकेदार जब अपने बच्चों को लिखना-पढ़ना सिखाते थे तो उन दिनों चन्द्र सिंह स्कूली शिक्षा के थोडे बहुत आयाम समझे। फिर कुछ समय तक इन्होंने एक ईसाई अध्यापक से दर्जा 2 तक की शिक्षा प्राप्त की, लेकिन पढ़ाई में इनका मन नहीं लगा। ये शरीर से हष्ट-पुष्ट होने के कारण इन्हें भढ़ कहा जाता था।भक्तदर्शन अपनी पुस्तक गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां में लिखते हैं कि चन्द्र सिंह बचपन से ही उत्पातों से भरपूर अल्हड़ जीवन बीताते रहे।

वीर चन्द्र गढ़वाली की आत्मकथा के पृष्ठ संख्या 12 में लिखा है कि बचपन के दिनों में एक बार इनके खेतों में रोपाई हो रही थी। समस्त गांववासी इनके खेतों में रोपाई का काम कर रहे थे। अतः उन सबके लिए घर में भोजन तैयार किया गया था पर वीर चन्द्रसिंह ने एक लड़की से विवाह का स्वांग रचा और अपने दोस्तों के साथ मिलकर रोपाई वालों के लिए बने खाने को जंगल में ले जाकर दावत कर दी। फलस्वरूप रोपाई से लौट आने के बाद ग्रामवासियों को दोबारा से भोजन बनाना पडा। तत्पश्चात कुछ समय बाद उसी लडकी से चन्द्रसिंह गढवाली की शादी कर दी गई, जो उनसे उम्र में दो वर्ष बड़ी थी। वीर चन्द्र सिंह ने कुल चार शादी की थी। घर की स्थिति अच्छी न होने के कारण वर्ष 1913 में वीर चन्द्र सिंह गढवाली ने घर छोड़ दिया था, तो तब उन्होंने ऋषिकेश से बदरी-केदार तक तीर्थयात्रियों के पथ प्रदर्शक के रूप में काम करना शुरू किया था, जिसके एवज में उन्हें 130.00 रू0 मजदूरी प्राप्त होती थी।

चन्द्र सिंह जिस समय 22 वर्ष के थे, उस समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया था। बड़े पैमाने पर सेना में भर्ती होने लगी थी। भक्तदर्शन ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल की दिवंगत विभूतियों में लिखा है कि ‘एक भर्ती करने वाला गढ़वाली हवलदार इनके गाँव पहुँच गया। इन्हें सेना में भर्ती होने का एक सुनहरा अवसर दिखाई दिया। ये भागकर उस भर्ती करने वाले हवलदार के पीछे-पीछे ही चले गए और उसके साथ ढाईज्यूली तथा पौड़ी के रास्ते लैंसडौन छावनी पहुंच गए। 11 सितम्बर, 1914 को इन्हें लेंसडौन स्थित गढ़वाली फौज में भर्ती कर लिया गया और 2/39 गढ़वाली राइफल्स की छठी कम्पनी की बारहवीं सेक्शन में रख लिया गया।
कुँवर सिंह नेगी ‘कर्मठ’ लिखते हैं – ‘ये दिन भर सैनिकों के साथ कुछ न कुछ बोलते रहते थे। इसलिए इनके साथी सैनिक इन्हें व्यंग में ‘चन्द्रीभाट’ कहा करते थे।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1अगस्त,1915 में मित्र राष्ट्रों
की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ फ्रांस भेज दिया गया, जहां से 1 फरवरी 1916 को वापस लैंसडाउन लौटे। पुनः 1917 में अंग्रेजों की ओर से
मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। 1918 में बगदाद की लड़ाई में भी भाग लिया। 1921-23 की अवधि में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में रहे, जहाँ अंग्रेजों और पठानों के मध्य युद्ध हो गया था।

1929 में गाँधी जी कुमाँऊ भ्रमण पर आए। चन्द्र
सिंह उन दिनों छुट्टी पर थे। वे गाँधी जी से मिलने
बागेश्वर पहुंचे और उस दौरान जब गांधी जी ने उन्हें टोपी पहनाई थी तब वीर चन्द्र सिंह गढवाली ने गांधी से कहा था कि मैं इस टोपी की कीमत चुकाऊँगा। गांधी जी ने कहा था कि अगर मुझे एक चन्द्र सिंह और मिला होता तो भारत कब का स्वतन्त्र हो गया होता।

1930 में इनकी बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म हुआ। 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लालकुर्ती खुदाई खिदमदगारों की एक आम सभा हो रही थी।अंग्रेज आजादी के इन दीवानों को तितर-बितर करना चाह रहे थे, जो बल प्रयोग से ही सम्भव था। अंततः कैप्टेन रिकेट 72 गढ़वाली सैनिकों को लेकर जलसे वाली जगह पर पहुंचा और निहत्थे पठानों पर गोलीचलाने का हुक्म दिया। चन्द्र सिंह भण्डारी (गढ़वाली) कैप्टेन रिकेट की बगल में ही खड़े थे। तत्काल उन्होंने ‘सीज फायर’ का हुक्म दिया और सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीचे कर दीं। चन्द्र सिंह ने कैप्टेन रिकेट से कहा”हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते।” इसके बाद गोरों की फौजी टुकड़ी से गोली चलवाई गई। चन्द्र सिंह का और गढ़वाली पल्टन के उन जांबाजों का यह अदभुत और असाधारण साहस था और ब्रिटिश हुकूमत की खुली अवहेलना और विद्रोह था। सरकार ने इस हुक्मअदूली को राजद्रोह करार दिया। फलस्वरूप सारी बटालियन एबटाबाद (पेशावर) में नजरबन्द करदी गई। उन पर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया। हवलदार 253 चन्द्र सिंह भण्डारी (गढ़वाली) को मृत्यु दण्ड की जगह आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। 16 व्यक्तियों को सख्त लम्बी सजाएं हुई। 39 व्यक्तियों को कोर्ट मार्शल द्वारा नौकरी से निकाला गया। 7 अन्य लोगों को बाद में मिलेट्री से बरखास्त किया गया। इन सभी का सारा संचित वेतन जब्त कर दिया गया। यह फैसला मिलेट्री कोर्ट मार्शल द्वारा 13 जून, 1930 को ऐबटाबाद छावनी में सुनाया गया। बैरिस्टर मुकुन्दी लाल ने गढ़वालियों की ओर से मुकदमें की पैरवी की थी।चन्द्र सिंह गढ़वाली तत्काल ऐबटाबाद जेल भेज दिए गए। 26 सितम्बर 1941 को 11 साल 3 महीने 18 दिन जेल के बाद वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली रिहा हुए।


मोतीलाल नेहरू ने पेशावर काण्ड़ से प्रभावित होकर गढ़वाल दिवस मनाने का सुझाव दिया था। इसके बाद सुभाष चन्द्र बोस को आजाद हिन्द फौज बनाने के दौरान देहरादून के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह और पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली से ही प्रेरणा मिली थी, जिसके बाद गढ़वालियों की दो बटालियन को आजाद हिन्द फौज में शामिल किया गया था, जिन दो बटालियन के सेनापति जनरल मोहन सिंह थे।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी,
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का बहुत सम्मान करते थे।

अगस्त 1979 में वे कोटद्वार में बीमार पड़ गए कुँवर सिंह नेगी ‘कर्मठ’ अपनी पुस्तक ‘वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की आत्मकथा’ में लिखते हैं कि तत्कालीन वित्त मंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा को जब पता चला कि ‘गढ़वाली’ बहुत बीमार हैं तो उन्होंने अपनी कार कोटद्वार भेजी और इन्हें डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल दिल्ली में भर्ती करा दिया। वे समय-समय पर इनकी देखभाल के लिए भी आते रहते थे। वे ‘गढ़वाली’ का बहुत आदर करते थे और सभाओं में उनका गुणगान किया करते थे। डॉ. राममनोहर लोहिया, विलिंगटन अस्पताल दिल्ली में गढ़वाली जी का सर्वोतम इलाज हुआ, परन्तु इनके वृद्ध और जर्जर शरीर को अब बचाना मुश्किल था। आखिर
1 अक्टूबर 1979 को 87 वर्ष की अवस्था में इन्होंने संसार से विदाई ले ली।

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