उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में आँगन की लिपाई-पुताई का कार्य हुआ शुरू – डॉ0 दीपक सिंह का खास लेख

उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में आँगन की लिपाई-पुताई का कार्य हुआ शुरू – डॉ0 दीपक सिंह का खास लेख
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उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में आँगन की लिपाई-पुताई का कार्य हुआ शुरू

हमारे पहाड़ों के ग्रामीण अंचलों में आँगन को सजाने का कार्य शुरू हो चुका है, क्योंकि पहाड़ों के उच्चतर हिस्सों में धान की फसल पकनी शुरू हो गई है। वैसे भी धान पकने का क्रम पहाड़ी हिस्सों से मैदानी हिस्सों को जाता है जबकि इसके विपरीत गेहूँ पकने का क्रम मैदानी हिस्सों से पहाड़ी हिस्सों को आता है। आमतौर पर पहाड़ों में ये लिपाई-पुताई का कार्य अनाजों को सुखाने व अनाजों को कीड़े-मकोड़ों के खतरे से बचाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा वर्षभर में यही एक दौर होता है, जब आँगन की साज-सज्जा की जाती है, जिससे वर्षभर आँगन की सुंदरता बनी रहती है। इस लिपाई-पुताई में लाल मिट्टी, गोबर व गोमूत्र का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार की लिपाई-पुताई का महत्व पहाड़ों में ही नहीं बल्कि हमारे पुराणों में भी देखने को मिलता है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गाय का गोबर सर्वाधिक पवित्र माना जाता है, क्योंकि गोबर में लक्ष्मी का निवास माना गया है। इसीलिए जब भी कोई पूजन या हवन जैसा कोई धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है तो उस जगह को गाय के गोबर से लिपा जाता है। इसके अलावा गोमूत्र में गंगा मैय्या का वास माना जाता है।


वैदिककालीन दौर से भारत के गाँवों में गोबर से आँगन को लिपने और गोमूत्र छिड़कने की परंपरा रही है। आज भी अगर आप ग्रामीण पृष्ठभूमि में जाते हैं तो आपको उन ग्रामीण भवनों से सटा हुआ पत्थरों का एक आँगन दिखाई देगा, जिसे स्थानीय भाषा में च्ओक या खऊ कहते हैं। इसी खऊ/आँगन में लगे पत्थरों के ज्वाइंट हिस्से व आँगन/खऊ के चारों ओर बनी एक-डेढ़ फ़ीट या दो हिस्सों में बनी दीवार, जिसे स्थानीय भाषा में भीड़ी कहते हैं पर प्राचीन परंपरा के तहत लाल मिट्टी, गोबर व गोमूत्र का लेपन किया जाता है। कुछ वर्ष पूर्व मैंने गाँवों में देखा था कि धान, गेंहू, मंडुवा व अन्य अनाजों के संग्रहण के लिए प्रयोग में लिए जाने वाले सुपु, टोकरी, डलू आदि जो रिंगाल से बने होते थे, पर भी गोबर व गोमूत्र का लेपन कर सुखाये जाते थे। तत्पश्चात उन वस्तुओं को दैनिक जीवन में उपयोग में लाते थे।

संस्मरण

एक संस्मरण के तहत हम लोग बचपन में घर से दो-ढाई किमी दूर स्थित ‘रिखुना’ नामक स्थान जाकर ये लाल मिट्टी लेकर आते थे। उस दौर में लाल मिट्टी से घर के आँगन की ही लिपाई-पुताई नहीं होती थी बल्कि प्राइमरी शिक्षा प्राप्त करने के दौरान प्रत्येक कक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए मिट्टी की अलग-अलग प्रकार की आकृति बनाकर स्कूल ले जानी होती थी, जैसे- दीया, आम, चिड़िया, केला आदि। अतः समय-समय पर हम इस लाल मिट्टी का उपयोग करते रहते थे।

इतिहासकार द्विजेन्द्र नारायण झा अपनी पुस्तक ‘द मिथ ऑफ़ होली काऊ’ में लिखते हैं कि- गाय के गोबर का प्रयोग विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान व खाना बनाने के लिए उपयोगी आग जलाने में किया जाता है। गाँव-घरों के फर्शों की लिपाई का काम भी गाय के गोबर से ही किया जाता है, घरों के दीवारों की लिपाई भी गोबर व मिट्टी का घोल बनाकर किया जाता है। गाय का महत्व भारतीय समाज में आध्यात्मिकता के साथ-साथ कृषि और खाद्य संग्रहण से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि गाय को भारतीय समाज में अत्यंत उच्च स्थान (माता) प्राप्त है।

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