मौसम शुरू हुआ देवताओं के सेनापति ‘कार्तिकस्वामी मंदिर’ के दर्शन का – डॉ. दीपक सिंह

मौसम शुरू हुआ देवताओं के सेनापति ‘कार्तिकस्वामी मंदिर’ के दर्शन का –  डॉ. दीपक सिंह
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मौसम शुरू हुआ देवताओं के सेनापति ‘कार्तिकस्वामी मंदिर’ के दर्शन का

उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित कार्तिकस्वामी का मंदिर हिन्दुओं का एक पवित्र स्थल है, जो भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को समर्पित है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 3050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहाँ मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं व पर्यटकों को मुख्य सड़क से लगभग 80 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। इस मंदिर से हिमालय की लगभग 80 प्रतिशत चोटियाँ साफ नजर आती हैं। सम्भवतः इसीलिए रुद्रप्रयाग को हिमालय का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। इस मंदिर में टंगी सैकड़ों घंटियों की आवाज वहाँ से लगभग 800 मीटर की दूरी तक सुनी जा सकती है।
यह मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद से 38 किमी0 की दूरी पर स्थित कनकचौरी गाँव के पास क्रांच पर्वत पर स्थित है, जिसकी स्थापना रुद्रप्रयाग जनपद के चापड़ गाँव के निवासी हिम्मत सिंह बुटेला ने की थी। इस मंदिर के श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए कनकचौरी बाज़ार का काम करता है। इस कनकचौरी गाँव से 3 किमी0 का पैदल सफर एक सुंदर कच्चे ट्रैक से करने के बाद ही मंदिर तक पहुँचा जाता है। इस ट्रैक के दोनों ओर खूबसूरत बाँज, बुराँश के जंगल व पक्षियों का कलरव की मधुर ध्वनि आपकी यात्रा में इतनी सुगमता व मनोरमता भर देती है कि पता ही नहीं चलता कब आप हिमालय की गोद में स्थित क्रौंच पर्वत पर बसे इस मंदिर के प्रांगण तक पहुँच जाते हैं। भगवान कार्तिकेय की पूजा उत्तर भारत के अलावा दक्षिण भारत में भी की जाती है, जहाँ उन्हें ‘कार्तिकेय मुरुगन स्वामी’ के नाम से जाना जाता है।

माना जाता है कि कार्तिकेय ने इस जगह अपनी हड्डियां भगवान शिव को समर्पित की थी, क्योंकि एक किवदंती के अनुसार- “भगवान शिव ने अपने दो पुत्र गणेश और कार्तिकेय से एक दिन कहा कि तुम में से जो ब्रह्माण्ड के सात चक्कर पहले लगाकर आएगा उसकी पूजा सभी देवी-देवताओं से पहले की जाएगी।” अतः कार्तिकेय ब्रह्माण्ड के सात चक्कर लगाने के लिए निकल गए, लेकिन दूसरी ओर गणेश ने भगवान शिव और माता पार्वती के सात चक्कर लगा लिए और कहा कि मेरे लिए तो आप दोनो ही संपूर्ण ब्रह्माण्ड हो, जिस कारण भगवान शिव बाल गणेश से काफी प्रसन्न हुए और गणेश को सौभाग्य प्रदान किया कि आज से तुम्हारी पूजा सबसे पहले की जाएगी, लेकिन जब कार्तिकेय ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर आए तो उन्हें इन सब बातों का पता चला, जिस कारण से भगवान कार्तिकेय ने श्रद्धा के रूप में अपने शरीर और हड्डियों को अपने पिता भगवान शिव को समर्पित कर दीं। कई लोग इस मन्दिर को ‘छठे केदार’ की संज्ञा भी देते हैं। उस मंदिर के पीछे एक जल कुंड है, जिसे कार्तिक कुई कहते हैं।

कार्तिक स्वामी मंदिर की यात्रा कई मायनों में आपके लिए खास हो सकती है, क्योंकि धार्मिक आस्था के अलावा यहाँ प्रकृति प्रेमी और रोमांच के शौकीन पर्यटक भी आ सकते हैं। यह मंदिर ऊंचाई पर और पहाड़ियों से घिरा है, इसलिए यहां से कुदरती खूबसूरती का आनंद जी भरकर उठाया जा सकता है। अगर आप एडवेंचर का शौक रखते हैं, तो यहां ट्रेकिंग और हाइकिंग का आनंद भी ले सकते हैं। अगर आप फोटोग्राफी का शौक रखते हैं, तो यहां के अद्भुत नजारों को अपने कैमरे में कैद कर सकते हैं। अतः एक शानदार यात्रा के लिए आप इस स्थल का चुनाव कर सकते हैं। आप मंदिर के दर्शन किसी भी समय कर सकते हैं, लेकिन मौसम के लिहाज से यहां आने का सही समय अक्टूबर से लेकर मार्च के मध्य का है। इस दौरान आप आस-पास की प्राकृतिक खूबसूरती का आनंद जी भरकर उठा पाएंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कार्तिक स्वामी आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

इस मंदिर के कारण स्वरोजगार के मायने में सरकार को चाहिए कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार पैदा करने के सुनहरे अवसरों को भुनाए तथा ‘वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोज़गार योजना’ व ‘दीन दयाल उपाध्याय गृह आवास विकास योजना’ के तहत लोगों को लॉन उपलब्ध कराकर ग्रामीणों को होम स्टे व रेस्टोरेंट खोलने में मदद करें। साथ ही भारत सरकार की ‘हुनर से रोजगार तक’ जैसी योजनाओं को उत्तराखंड के इन पहाड़ी गाँवों तक ले जाया जाए तथा स्थानीय युवाओं को पर्यटन के लिए आवश्यक कौशल की ट्रेनिंग दी जाए। इसका फायदा यह होगा कि स्थानीय लोग पर्यटन के महत्व को समझेंगे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आल वैदर रोड की तर्ज़ पर ही एक सड़क रुद्रप्रयाग-कनक चौरी-हाफला तक प्रस्तावित है, जिसका निर्माण कार्य शीघ्र ही प्रारंभ हो सकता है, लेकिन वर्तमान रुद्रप्रयाग से कनक चौरी तक जो सड़क मार्ग है वह भी अच्छी स्थिति में है।

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