बदरी-केदार तीर्थयात्रा का पहला अस्पताल 1850 में श्रीनगर में खोला गया – डॉ. दीपक सिंह कुंवर का खास लेख

बदरी-केदार तीर्थयात्रा का पहला अस्पताल 1850 में श्रीनगर में खोला गया – डॉ. दीपक सिंह कुंवर का खास लेख
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गढ़वाल हिमालय में बदरी-केदार तीर्थाटन के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रबंधन

प्राचीनकाल से ही गढ़वाल हिमालय में रहने वाले लोग अनेक रोग व चोट आदि का स्वयं ही जड़ी-बूटियों से उपचार करने की विभिन्न विधियों का ज्ञान रखते थे। यहाँ तक यहाँ रहने वाला ब्राह्मण वर्ग भी आध्यात्मिक कल्याण के साथ-साथ शारीरिक कल्याण का भी कार्य करते थे। कुछ लोग व्यवसायिक रूप में भी आयुर्वेद को अपनाने वाले होते थे, जिन्हें सामान्यतः ‘वैद्य’ कहा जाता था। साथ ही उस दौर में टोने-टोटके भी काफी प्रचलित थे।
यहाँ तक की गढ़वाल हिमालय में यह भी मान्यता है कि बकरे की बलि देने से या पूजा-अर्चना करने से ग्राम देवता प्रसन्न हो जाते हैं, जिससे बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो जाते हैं। घरेलू उपचार की प्रणाली में यहाँ के प्रत्येक घर में लोहे का बनाया एक ताला होता था, जो अंगेजी के ‘S’ अक्षर के समान होता था, जिसके …

गढ़वाल हिमालय में बदरी-केदार तीर्थाटन के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रबंधन”

प्राचीनकाल से ही गढ़वाल हिमालय में रहने वाले लोग अनेक रोग व चोट आदि का स्वयं ही जड़ी-बूटियों से उपचार करने की विभिन्न विधियों का ज्ञान रखते थे। यहाँ तक यहाँ रहने वाला ब्राह्मण वर्ग भी आध्यात्मिक कल्याण के साथ-साथ शारीरिक कल्याण का भी कार्य करते थे। कुछ लोग व्यवसायिक रूप में भी आयुर्वेद को अपनाने वाले होते थे, जिन्हें सामान्यतः ‘वैद्य’ कहा जाता था। साथ ही उस दौर में टोने-टोटके भी काफी प्रचलित थे।
यहाँ तक की गढ़वाल हिमालय में यह भी मान्यता है कि बकरे की बलि देने से या पूजा-अर्चना करने से ग्राम देवता प्रसन्न हो जाते हैं, जिससे बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो जाते हैं। घरेलू उपचार की प्रणाली में यहाँ के प्रत्येक घर में लोहे का बनाया एक ताला होता था, जो अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के समान होता था, जिसके बारीक नोक को आग में तपा करके जिस किसी व्यक्ति के जहाँ कहीं भी दर्द होता, लगाया जाता था। इसके अलावा किसी व्यक्ति पर चोट लगने पर बने घाव को गरम तेल या घी या नमक-पानी से सेंकना आदि घरेलू उपचार भी काफी प्रचलित थे। आज भी कतिपय गाँवों में बूढ़े ग्रामीणों में काफी हद तक इन्हीं उपचारों को प्राथमिकता दी जाती है।

तत्कालीन समय में गढ़वाल हिमालय में शासन करने वाले गढ़ नरेशों के साथ ही गोरखा शासकों ने भी यहाँ की प्रजा की स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं की व्यवस्था करना अपना मूल कर्त्तव्य नहीं समझा था। यहाँ तक कि वर्ष 1840 ई0 से पहले ब्रिटिश सरकार ने भी इस सम्बन्ध में कोई उचित प्रबन्ध नहीं किये। अतः तत्कालीन समय में तीर्थयात्रा पर आने वाले बाहरी प्रदेशों के आगन्तुकों की स्थिति बड़ी दयनीय होती थी, क्योंकि यहाँ स्थित बदरी-केदार यात्रामार्ग में उन्हें उचित प्रकार का भोजन न मिलने से, बदलते जलवायु में धूप व वर्षा से, नदी-नालों के गन्दे पानी पीने आदि से उनके स्वास्थ्य में दिन-प्रतिदिन गिरावट आती थी। यहाँ तक कि पैदल यात्रामार्ग के कारण तीर्थयात्रियों के पैरों के तलवे में छाले पड जाते थे, जिससे महीने भर पैदल तीर्थयात्रा करना मुश्किल हो जाता था। अतः स्वास्थ्य सम्बन्धी सेवाएँ उपलब्ध न होने के कारण बहुत से तीर्थयात्री मार्ग में ही बीमारी से जूझते-जूझते मर जाते थे। इस प्रकार की कठिनाईयों को देखते हुए सन् 1840 ई0 में बदरी-केदार तीर्थ पर आने वाले डॉ0 प्ले फेयर ने तीर्थयात्रियों की इस प्रकार की दयनीय दशा के सम्बन्ध में एक प्रतिवेदन लिखा। फलस्वरूप गढवाल के असिस्टेंट कमिश्नर बैटन ने यहाँ के जिलों में चेचक का टीका लगाने वाले वेक्सीनेटरों के द्वारा तीर्थयात्रियों में औषधियों का वितरण करना आरम्भ किया गया, लेकिन जब औषधि वितरण के लिए धनराशि न रही तो स्वयं ही बैटन ने भी ब्रिटिश सरकार को गढ़वाल के स्वास्थ्य सेवाओं के सम्बन्ध में एक प्रतिवेदन भेजा।

परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने गढ़वाल में एक देशी डॉक्टर की नियुक्ति की स्वीकृति प्रदान कर उसके अधीन श्रीनगर स्थित चट्टी में वर्ष 1850 में बदरी-केदार तीर्थयात्रा का पहला अस्पताल खोला। बैटन ने इस अस्पताल के लिए आवश्यक धनराशि जुटाने हेतु बदरीनाथ रोड फण्ड़ अर्थात सदावर्ती गाँवों की आय का उपयोग करने की सोची, क्योंकि यह आय तत्कालीन समय में सड़कों के निर्माण और संरक्षण में व्यय होती थी, अतः वर्ष 1851 ई0 में इस व्यवस्था को समाप्त कर सदावर्ती आय का धन श्रीनगर में स्थित अस्पताल पर व्यय करने का नियम बनाया गया। इस प्रकार सदावर्ती आय से धीरे-धीरे यात्रामार्ग पर कई औषधि वितरण केन्द्र खोले गए। बाद में वर्ष 1880 ई0 में स्वामी विशुद्धानन्द ने अपनी बदरीनाथ तीर्थयात्रा की कठिनाईयों को देखते हुए यात्रामार्ग पर स्थित कई चट्टियों में औषधालयों की व्यवस्था का सुचारू रूप से प्रबन्ध करवाया। इस प्रकार 19वीं सदी में गढ़वाल सबसे अधिक चेचक के टीके लगाने वाला जिला बन गया था, लेकिन हैजा की महामारी भी यहाँ कम न थी।
वर्ष 1892 में 5943 लोगों की मृत्यु

वर्ष 1903 में 4017 लोगों की मृत्यु
वर्ष 1906 में 3429 लोगों की मृत्यु

औऱ वर्ष 1908 में 1775 लोगों की मृत्यु इसी बीमारी से हुई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह बीमारी प्रायः तीर्थयात्रियों के साथ आती थी, लेकिन जब वर्ष 1908 में तीर्थयात्रा बन्द कर दी गई थी तो उस वर्ष भी गढ़वाल में यह बीमारी फैली रही। अतः यह स्पष्ट नहीं था कि यह बीमारी यात्रियों के साथ ही गढ़वाल में प्रवेश करती थी।सन् 1907 ई0 तक बदरी-केदार यात्रामार्ग पर बीमारियों को फैलने के डर से व प्रतिवर्ष मृतको की संख्या को देखते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा बदरीनाथ, जोशीमठ, चमोली, कर्णप्रयाग, श्रीनगर व ऊखीमठ में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था कर दी गई, साथ ही गढ़वाल में तीर्थ यात्रामार्ग के प्रत्येक दो पडावों में सदावर्ती अस्पताल भी बनवाये गये। नदी, तालाब के गन्दे पानी से बढ़ती बीमारियों के कारण सन् 1913 ई0 में बदरी-केदार यात्रा मार्ग पर स्वच्छता को ध्यान देने के लिए जे0 सी0 रावर्टसन व जी0 एफ0 आदम्स के नेतृत्व में एक समिति का गठन भी किया गया था, जिसकी सिफारिश पर सरकार ने हरिद्वार से बदरीनाथ यात्रामार्ग पर सफाई कर्मचारियों की नियुक्तियाँ कर चट्टियों में पहुँचने वाले जल की स्वच्छता को बनाये रखने की दिशा में कार्य किया।

धीरे-धीरे यात्रामार्ग में अस्पताल की संख्या में वृद्धि होने लगी, जिससे सन् 1930-1950 ई0 के मध्य तक गढ़वाल की बहुत सी चट्टियों में सीजनल, आयुर्वेदिक, एलोपैथिक अस्पताल खोले गये। इनमें ये सीजनल अस्पताल-
फूलचट्टी, नाईमोहन, महादेवचट्टी, जखोली, नाला, फाटा, रामपुर, त्रियुगीनारायण, गौरीकुण्ड, रामबाड़ा, केदारनाथ, मण्डल, नन्दप्रयाग, पीपलकोटी आदि चट्टियों में, आयुर्वेदिक अस्पताल- नाला चट्टी में, ऐलोपैथिक अस्पताल- कांडी, देवप्रयाग, अगस्त्यमुनि आदि चट्टियों में तथा कर्णप्रयाग, चमोली, वैरागणा आदि चट्टियों में स्थानीय लोगों के द्वारा चलाये जाते थे। साथ ही श्रीनगर व रूद्रप्रयाग में भी तीर्थयात्रियों के लिए अस्पताल की व्यवस्था की गई थी। बदरी-केदार यात्रामार्ग में जिन-जिन स्थानों पर बीमार यात्रियों को किसी भी प्रकार की चिकित्सा सहायता नहीं मिलती थी और यदि मार्ग में दुर्भाग्य से किसी अनाथ व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी, तो उसके मृत शरीर को भंगी बिना दाह संस्कार किये हुए खड्ड में या गंगा में डाल देते थे। अतः वर्ष 1939 में बदरी-केदार मन्दिर समिति बनने के बाद सन् 1943 ई0 में इन परेशानियों को दूर करने के लिये मन्दिर के व्यय पर नन्दप्रयाग से लेकर बदरीनाथ तक सफरी औषधालय और दो गश्ती वैद्यों की व्यवस्था कर दी गई और एक वैद्य, जो कि अंग्रेजी ढंग की औषधि प्रचार तथा चीर फाड़ में निपुण हो बदरीनाथ मन्दिर में नियुक्त किया गया। इसके अतिरिक्त बदरी-केदार मन्दिर कमेटी ने सरकार से बदरीनाथ व केदारनाथ यात्रामार्ग में स्थित फाटा व पीपलकोटी दो स्थानों पर सरकारी खर्च से दो अस्पताल खोलने की स्वीकृति प्राप्त की। इसके साथ ही चमोली से बदरीनाथ यात्रामार्ग की खास-खास चट्टियों में चट्टी-चौधरियों को 10.00 रू0 प्रत्येक सीजन में देकर लावारिश मृतकों की दाह क्रिया करने का भी प्रबन्ध किया गया।
इस प्रकार गढ़वाल हिमालय में बदरी-केदार तीर्थयात्रा के कारण अंग्रेज प्रशासकों ने व आजादी के बाद सरकार ने अस्पताल व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया, जिससे यहाँ रहने वाले जनमानस को भी इसका समयानुसार लाभ मिला।
शिवप्रसाद डबराल के अनुसार- गढ़वाल के तीर्थ यात्रामार्गों पर मलेरिया, अपच, संग्रहिणी और हैजा आदि रोगों से प्रतिवर्ष सहस्त्रों व्यक्तियों के प्राण जाते थे। एक वर्ष में लगभग 7146 व्यक्तियों की मृत्यु इन रोगों के कारण होती थी। रूग्ण यात्रियों के साथ रोग के कीटाणु पूरे भारतवर्ष में पहुँचते थे तथा यात्रामार्ग पर काम करने वाले कुलियों के माध्यम से ये रोग यहाँ के गाँवों तक पहुँचते थे। संभवतः ये संख्या पूरे गढ़वाल में मरने वालों की रही होगी। पहले ज्यादात्तर तीर्थयात्री ऋषिकेश से ही अपने साथ दवाईयों को खरीदकर बदरी-केदार तीर्थयात्रा के लिए आते थे। 20वीं सदी तक तीर्थयात्रा मार्ग में बहुत से बंगाली चिकित्सकों व अन्य लोगों ने भी व्यापार के कारण अनेक मेडिकल स्टोर खोले, जिन्हें वर्तमान में यहाँ के यात्रामार्ग पर अधिकांशतः देखा जा सकता है। फलस्वरूप इससे गढ़वाल हिमालय में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भी उन्नत हुई है। प्राचीन तीर्थयात्रा से एक बहुत बड़ा लाभ यह भी था कि पैदल यात्रा वे ही श्रद्धालु कर सकते थे, जो कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होते थे, जिससे इन तीर्थ स्थानों पर बीमारी आदि का प्रकोप नहीं हो पाता था, लेकिन अब मरणासन्न व्यक्ति भी मोटर मार्ग से यहाँ पहुँचते हैं, जिससे सम्भव है कि तीर्थों पर बीमारी के विषाणु फैलते होंगे।

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