शीतकाल के लिए बंद हुए श्री फ्यूलानारायण मंदिर के कपाट – रिपोर्ट रघुबीर नेगी चमोली

शीतकाल के लिए बंद हुए श्री फ्यूलानारायण मंदिर के कपाट – रिपोर्ट रघुबीर नेगी चमोली
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रिपोर्ट रघुबीर नेगी चमोली उत्तराखण्ड

श्री फ्यूलानारायण मंदिर के कपाट आज दोपहर दो बजे विधि विधान के साथ बंद हुये

हिमालय सदियों से परम्परा आस्था पौराणिक संस्कृति का केन्द्र रहा है। सूदूरवर्ती हिमालय की गोद में बसे गांव अपनी परम्परा आस्था संस्कृति का आज भी निर्वहन कर रहे हैं। लोगों की अपने आराध्य के प्रति विशेष आस्था यहाँ के निवासियों को अपनी माटी से जोड़े रखती है। यहाँ के गिरि कंदराओं में अनेक रहस्यमयी गाथाएँ छुपी है।


चमोली जनपद के जोशीमठ विकास खंड के उर्गम घाटी में स्थित पंचम केदार श्री कल्पेश्वर धाम के शीर्ष पर 10 हजार फिट ऊंचाई पर स्थित फ्यूलानारायण जी का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के कपाट कम समय के लिए लगभग तिथि के अनुसार डेढ़ से दो माह के लिए खुलते हैं। श्रावण संक्रांति अर्थात 15-16 जुलाई को कपाट खुलते हैं और नंदा अष्टमी के बाद नवमी तिथि को विधिवत बंद हो जाते हैं। अर्थात 30 अगस्त से 15 सितंबर के बीच नारायण के कपाट बंद हो जाते हैं। सप्तमी तिथि को नन्दा स्वनूल के ब्रहमकमल लेकर मायके फ्यूलानारायण पहुंचने के बाद फ्यूलानारायण के कपाट बंद होने की तैयारियां शुरू हो जाती है। श्री नारायण नन्दा के धर्म भाई भी हैं। फ्यूला नारायण के बारे बहुत अधिक जानकारी इंटरनेट की दुनिया में नहीं है आखिर फ्यूलानारायण के कपाट बंद होने की परंपराएं के बारे में वर्णन करते हैं।

फ्यूलानारायण के बारे में केदारखंड के स्कंद पुराण 52से 56 अध्याय के बीच वर्णन मिलता है कि दुर्वासा के द्वारा मेनका नाम की अप्सरा को इंद्र के स्वागत के लिएएक पुष्प माला बनाने को कहा गया। मेनका नाम की अप्सरा ने इस पुष्प माला को फ्यूलानारायण धाम में विष्णु के आश्रम से तैयार किया था। इसी माला को दुर्वासा ऋषि ने इंद्र के स्वागत हेतु दिया था।इंद्र अत्यधिक मदमस्त होने के कारण इस माला को अपने घोड़े के गले में डाल दिया था। दुर्वासा ऋषि ने श्राप दे दिया की तुम्हारी राज्य लक्ष्मी एवं कांति का भी नष्ट हो जाए। इसी श्राप से मुक्ति के लिए देवताओं से इंद्र ने कल्पेश्वर धाम में कई कल्पों तक तप किया था। फ्यूलानारायण के बारे में जनश्रुति के अनुसार इस मूर्ति को आज से 500 वर्ष पूर्व नारायण बगड़ से बकरी पालकों द्वारा अपनी कंडी में लाने की परंपरा बताई जाती है।जब वह पालसी सुबह उठकर बिना भोजन किए मूर्ति को ले जाता तो मूर्ति हल्की होने लगती, जैसे भोजन ग्रहण करता मूर्ति भारी लगती थी। ऐसी मान्यता है नारायबगड से मूर्ति श्री फ्यूलानारायण में स्थापित की गई फ्यूलानारायण में पुजारी नारायण की पूजा अर्चना करते है और नारी नारायण का श्रृगांर के लिए फूलों की माला तैयार करती है। जिसे फ्यूया फ्यूयाण कहा जाता है।

एकमात्र ऐसा मंदिर जहाँ नारी को है विशेष अधिकार

फ्यूयाण या तो 10 वर्ष से नीचे की कन्या होती है या 50 वर्ष से ऊपर की महिला अष्ट वर्षा भवेद गौरी नव वर्षा च रोहणी दशम वर्षा भवेद कन्या उर्ध्वागतरे रजस्वला फ्यूलानारायण में वरूण देव जिसे स्थानीय भाषा में मडकू मामा कहा जाता है की पूजा की जाती है। उसके बाद मंदिर के समीप गूल में पानी की धारा निकल आती है।वैसे फ्यूलानारायण मूल रूप से शक्तिपीठ है यहां मां नंदा एवं सुनंदा की भी विधिवत पूजा की जाती है और यह स्थान नारायण से अति प्राचीन है।मूल रूप से नंदा एवं सुनंदा का स्थान इसे माना जाता है। आज भी नारायण के स्थान पर कपाट बंद की कोई परंपरा नहीं होती है यहां भगवती नंदा एवं सुनंदा दाणी देवी के मूल स्थान पर एक विशेष प्रकार की वनस्पति से कपाट बंद करने की परंपरा पूर्व की जाती है। श्रीफ्यूला नारायण धाम के कपाट बंद होने से पूर्व कुछ परंपराएं पूर्ण की जाती है। भाद्र मास की द्वितीय तिथि को गौरा भवानी छंतोली रिंगाल से बनी कंडी उस पर भोजपत्र लगी होती है देवग्राम के भल्ला लोगों की कुलदेवी गौरा अर्थात पार्वती को माना जाता है। भल्ला लोगों के द्वारा विशेष पूजा नारायण धाम में दिया जाता है। दूसरे दिन तृतीय तिथि को प्रातः फ्यूलानारायण में पूजा अर्चना कर जातरी मल्यूँ ,रोखनी, पहुंच कर जहां भगवती गौरव की विशेष पूजा कर शंकर का ध्यान एवं विशेष प्रसाद चढ़ाकर गौरा को मायका बुला कर लाते हैं।

यहां गौर की फुलवारी से ब्रह्म कमल को तोड़ कर लाते हैं कहा जिता है कि भगवती भवंरे के रूप में ब्रहमकमल के अंदर आती है जो भाग्यवान लोगों को दिखाई देती है। यह स्थान लगभग 12000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से चारों तरफ हिमालय के दिलकश नजारे दिखते हैं कई प्रकार की नाना प्रकार के फूल का यहां खिलना मिटना आम बात है। उसी दिन जातरी फ्यूलानारायण में विशेष पूजा के बाद श्री कल्पेश्वर धाम होते हुए गौरा मंदिर उर्गम पहुंचकर फुल कोठे का आयोजन किया जाता है देवी की प्रतिमा की चारों तरफ ब्रह्म कमल से सजाया जाता है। विशेष प्रकार की पूजा कर यह परंपरा संपन्न की जाती है। फुल नारायण के कपाट बंद होने की दूसरी परंपरा है कि भगवती सुनंदा के मायके वाले पल्ला निवासी हर वर्ष 1 किलो चावल एवं पूजा सामग्री लेकर छठी तिथि को फुल नारायण पहुंचते हैं उस दिन भर्की गांव से नंदा सुनंदा दानी भूमिल क्षेत्रपाल के प्रतीक चिन्ह एवं कंडी लेकर मुंगरी ,काकडी, रेशमी साड़ी ,चूयूड़ा लेकर गांव के लोग फुल नारायण आते हैं यहां 2 दिन तक भगवती के नंदा एवं सुनादा के जागरण का आयोजन किया जाता है। सप्तमी तिथि को सुनंदा नंदा को बुलाने हेतु भनाई बुग्याल पहुंचते हैं वहां विशेष पूजा अर्चना कर भगवती को फूल नारायण बुलाया जाता है यहां ब्रह्मकमल से नारायण का श्रृंगार किया जाता है विशेष प्रकार का राजभोग दिया जाता है अष्टमी तिथि को प्रातः भगवती का विशेष भोग 12 किलो चावल का भोग तैयार किया जाता है साथ ही 4 किलो आटे की पुरी बनाई जाती है हलवा खीर के विशेष भोग के साथ भूमियाल क्षेत्रपाल के अवतारी पुरुष के द्वारा सभी देव डोली के अवतारी पुरुषों एवं छतोली के प्रतिनिधियों को विदा किया जाता है 3 दिन की पूजा का अधिकार भर की पंचनाम देवता के पुजारियों को है अष्टमी तिथि को यहां यहां से देव डोलिया विदा हो जाती हैं नारायण जी के कपाट बंद होने का द्वितीय चरण हो जाता है नवमी तिथि को प्रातः फुल नारायण के पुजारी विधिवत नारायण का स्नान कराते हैं। महिला पुजारी के द्वारा पुष्प वाटिका से पुष्प लेकर नारायण के लिए माला तैयार की जाती है।

महिला के द्वारा भी पूजा अर्चना की जाती है। मायके वालों के द्वारा दिए हुए 1 वर्ष पूर्व के चावल का खीर बनाया जाता है विशेष राजभोग बाल भोग लगाने के बाद भगवती नंदा सुनंदा दाणी के स्थान पर विशेष प्रकार की वनस्पति लगा दी जाती है। जिससे कपाट बंद होना कहते हैं। सभी लोगों के भोजन के पश्चात कुछ विशेष लोगों के द्वारा अग्नि कुंड में हवन किया जाता है इस कार्य के लिए ब्राह्मण होना कोई आवश्यक नहीं है हवन पूर्ण होते ही कपाट बंद कर दिए जाते हैं। मंदिर की परिक्रमा के बाद वापस भरकी पंच नाम देवता के मंदिर में नारायण से भोग प्रसाद जितना भी वापस आए हैं यहां पहुंच जाता है।भूमि क्षेत्र पाल पश्वा लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि नवमी तिथि को भरकी गांव में पंच नाम देवता के मंदिर में भव्य दो दिवसीय मेला लगता है फ्यूलानारायण धाम के कपाट खुलने के लिए यहां प्रथम दिन जिस व्यक्ति की अगले वर्ष वारी पूजा होगी वह दीपक जौ की सूपे में मेला प्रांगण में देता है उसी के बाद मेला की शुरुआत होती है। आज दोपहर दो बजे विधि विधान के साथ शीतकाल के लिए भगवान फ्यूलानारायण धाम के कपाट बंद हो गये आज से देव ऋषि नारद भगवान फ्यूलानारायण की पूजा अर्चना करेगे दो माह बीतने के बाद आज फ्यया फ्यूयाण अपनी गायों सहित चोपता मंदिर भर्की पहुच गये जहाँ ग्रामीणों द्वारा स्वागत किया गया। फ्यूलानारायण के कपाट बंद होने के अवसर पर देवेंद्र चौहान पुजारी, हरीश चौहान,फ्ययूयाण, गोदाम्बरी देवी, उजागर फरस्वार्ण, राजेश्वरी देवी, आनंदी देवी, दलीप सिंह चौहान व मनोज सिह समेत सैकड़ों भक्त उपस्थित रहे।

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