बदरीनाथ धाम में 1882 में खून होने से पहली बार नियत की गई पुलिस – डॉ दीपक सिंह की खास रिपोर्ट

बदरीनाथ धाम में 1882 में खून होने से पहली बार नियत की गई पुलिस – डॉ दीपक सिंह की खास रिपोर्ट
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बदरीनाथ धाम में 1882 में खून होने से पहली बार नियत की गई पुलिस 

कत्यूरी शासनकाल में प्रजा के जीवन एवं सम्पत्ति की सुरक्षा तथा राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये एक पुलिस विभाग था, जिस पुलिस विभाग के अनेक अधिकारियों के नाम कत्यूरी ताम्रलेखों में सुरक्षित हैं। तत्पश्चात समय-समय पर राज्य में सुव्यवस्था बनाये रखने हेतु इसी प्रकार अनेक अधिकारी नियुक्त किये जाते रहे। लगभग इसी प्रकार की व्यवस्था गोरखा शासन काल में भी जारी रही, परन्तु ब्रिटिश गढ़वाल के आरम्भ में पुलिस व्यवस्था का यह काम सेना को सौंपा गया था तथा वर्ष 1815 ई ने कोटद्वार के अन्तर्गत डाडागण्डी व श्रीनगर गढ़वाल में जिन पुलिस थानों की स्थापना की गई थी, उनमें भी सैनिकों की सहायता से ही पुलिस कार्य किया जाता था। उस समय गढ़वाल हिमालय के भीतरी भागों में पुलिस व्यवस्था नियत नहीं की गई थी, क्योंकि कुमाऊँ कमिश्नर विलियम ट्रेल नामक अंग्रेज अधिकारी ने अपने प्रतिवेदन में लिखा था कि इस प्रदेश में किसी भी प्रकार के अपराधों का सर्वथा अभाव है जबकि शिवप्रसाद डबराल, विलियम ट्रेल के इस कथन को पूर्णतः सत्य नहीं मानते हैं।

वे लिखते हैं कि इस क्षेत्र में साधारण मारपीट, व्यभिचार, नारी विक्रय, ऋण लेकर कर्ज न चुकाना और रिश्वतखोरी के अपराध पूर्ववत प्रचलित थे, परन्तु इतना अवश्य है कि मैदानी भागों की तुलना में इन अपराधों को सामान्य कहा जा सकता है। यद्यपि गढवाल हिमालय पर ब्रिटिश शासन वर्ष 1815 ई0 में आरम्भ हो गया था, लेकिन एक लंबे समयांतराल बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा 10 मार्च 1882 ई० को बदरीनाथ तीर्थ में पुलिस नियत करने की आज्ञा प्रदान की गई। फलस्वरूप बदरीनाथ तीर्थ में पुलिस विभाग नियत हुई। बदरीनाथ तीर्थ में पुलिस व्यवस्था स्थापित करने का कार्य सर हेनरी राम साहब की दिनाँक 22 फरवरी 1882 ई० को चिट्ठी से स्पष्ट होता है, जो उन्होंने पश्चिमोतर देश के गवर्नमेण्ट के सेक्रेटरी को भेजी थी, जिसमें लिखा था कि बदरीनाथ तीर्थ के कार्यकर्त्ता दुःखदाई हैं, वे झगड़ा पैदा करते हैं और मन्दिर के चढ़ावे को इस कदर लूटते हैं कि बदरी तीर्थ के रावल को बचाव की आवश्यकता पड़ती है। आगे लिखा है कि तीर्थयात्रियों ने बराबर उन मुसीबतों को पेश किया है, जिसके सामने उनको अवनत होना पड़ता है। गत वर्ष सन् 1882 ई० में बदरीनाथ में एक खून भी हुआ है, जिस कारण से बदरीनाथ धाम में पहली बार पुलिस विभाग नियत की गई थी।

बदरीनाथ तीर्थ में दर्शनार्थ के लिए जो समस्या आज है वही समस्या 1930 के दशक में भी थी, क्योंकि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मनोरंजन जी अपने संस्मरण में लिखते हैं कि- किसी थर्डक्लास वेटिंग रूम के बुकिंग ऑफिस के सामने इतनी भीड़ नहीं होती होगी, जितनी वर्ष 1933 में बदरीनाथ तीर्थ के मुख्यद्वार के सामने थी। उस दौर में भी मन्दिर में जगह कम होने के कारण सभी श्रद्धालु एक साथ अंदर नहीं जा पाते थे। अतः जो दल बदरी तीर्थ के दर्शन करने के लिए एक साथ आया होता था। उस दल को दर्शन के लिए एक साथ भेजा जाता था और उन्हें 05 मिनट के लिए दर्शन का अवसर दिया जाता था। फिर उन्हें निकाल बाहर किया जाता था, जिसमें बल प्रयोग भी करना पड़ता था, क्योंकि अपनी इच्छानुसार से कोई भी श्रद्धालु बाहर नहीं आना चाहते थे, सभी श्रद्धालु भावुक और आँसुओं की धारा के साथ बाहर आते थे, मन्दिर से दूर जाने के लिए कोई भी श्रद्धालु तैयार नहीं होते थे। अतः वर्ष 1933 ई0 के दौरान मन्दिर व्यवस्था के लिए पंजाबी दरोगा श्री साधोराम बदरीनाथ तीर्थ में तैनात थे।

धीरे-धीरे वर्ष 1930-1950 ई0 के मध्य देवप्रयाग (बाह), श्रीनगर, रूद्रप्रयाग व गौचर आदि अनेक चट्टियों में पुलिस चौकी नियत हो चुकी थी, जबकि गुप्तकाशी, नारायणकोटी, फाटा, केदारनाथ व नन्दप्रयाग, बदरीनाथ आदि अनेक चट्टियों में बदरी-केदार तीर्थयात्रा के दौरान सीजनल पुलिस चौकियाँ व्यवस्थित की जाती थी। आज भी बदरी-केदार के कपाट के खुलते ही यात्रामार्ग में कई स्थानों पर सीजनल पुलिस चौकियाँ बनाई जाती हैं। पुलिस न केवल स्थानीय झगड़ों का निपटारा करती है, बल्कि स्थानीय निवासियों व तीर्थयात्रियों के मध्य होने वाले लड़ाई-झगड़ों को भी संभालती है। विभिन्न प्रकार के मामलों की जाँच के लिए पुलिस प्रशासन मौके पर तुरन्त पहुँच जाती है। गढ़वाल हिमालय के प्रत्येक जिलों में पहले पुलिस प्रशासन की आवश्यकता नहीं होती थी, क्योंकि इनके स्थान पर पटवारी चौकी ही सभी प्रकार के मामले देखती थी, परन्तु अब तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के कारण तथा बढ़ते अपराधों के कारण पुलिस व्यवस्था आवश्यक हो गई है।

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