विश्व पर्यटन दिवस के शुभ अवसर पर : गढवाल हिमालय में पर्यटन पर एक नज़र – डॉ, दीपक सिंह कुंवर

विश्व पर्यटन दिवस के शुभ अवसर पर : गढवाल हिमालय में पर्यटन पर एक नज़र – डॉ, दीपक सिंह कुंवर
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विश्व पर्यटन दिवस के शुभ अवसर पर : गढवाल हिमालय में पर्यटन पर एक नज़र

विश्व पर्यटन दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ जानिए गढ़वाल हिमालय में पर्यटन। पर्यटन शब्द अंग्रेजी के टूरिज्म शब्द से लिया गया है , जिस टूरिज्म शब्द का सम्बन्ध लैटिन भाषा के ‘टूअर’ शब्द से है। ‘टूअर’ शब्द का प्रार्दुभाव सर्वप्रथम 1292 ई0 में लेैटिन भाषा के ‘टोरन्स’ शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ- ‘एक औजार या उपकरण’ होता है, जो कि पहिए की तरह गोलाकार या वृत्ताकार होता है। सम्भवतः इसी ‘टोरन्स’ शब्द से यात्रा चक्र ‘टूअर’ का विचार उत्पन्न हुआ।

इस प्रकार टूअर शब्द से धीरे-धीरे टूरिस्ट तथा टूरिज्म शब्द की उत्पत्ति हुई। इस टूअर शब्द का प्रयोग सन् 1643 ई0 के लगभग विभिन्न स्थानों की यात्रा, मनोरंजन, भ्रमण, पर्यटन तथा विभिन्न राष्ट्रों व क्षेत्रों के भ्रमण अथवा यात्रा करने के लिए किया गया था,जबकि गढ़वाल हिमालय में 13वीं सदी से ही पर्यटन का रूप उभरने लगा था, जब भक्ति आन्दोलन को जीवंत बनाने और नेतृत्व प्रदान करने में रामानन्द ने अहम भूमिका निभाई थी। रामानन्द ने उत्तर भारत के अनेक तीर्थों की यात्रा कर, यहाँ के समाज में व्याप्त कुरीतियों ( भेदभाव, ऊँच-नीच) को दूर करने का प्रयास किया था। उनके शिष्यों में कबीरदास ने मूर्ति पूजा का विरोध कर एकेश्वरवाद में विश्वास करने को कहा था, जिससे यहाँ के तीर्थों में एक नया आयाम प्रादुर्भाव हुआ अर्थात भक्ति आन्दोलन के कारण यहाँ के समाज व तीर्थों के प्रति लोगों में विश्वास व आस्था जगी।

फलस्वरूप पर्यटन व तीर्थयात्रा में अन्तर उत्पन्न हुआ, क्योंकि आस्तिक लोग तीर्थों पर आस्था व आध्यात्म के लिए जाते रहे, जबकि इसके विपरीत नास्तिक लोग तीर्थों को देखने व वहाँ घूमने के उद्देश्य से जाते रहे।
गढ़वाल हिमालय में अंग्रजों के आगमन के बाद पर्यटन शनैःशनैः परिष्कृत होता गया। आधुनिक काल में पर्यटक के रूप में गढ़वाल हिमालय आने वाला प्रथम विदेशी पर्यटक फ्रांसिस वर्नियर था, जो कि वर्ष 1656 ई0 में श्रीनगर गढ़वाल तक आये थे, उन्होंने अपने भ्रमण के दौरान यहाँ का मानचित्र भी बनाया था। पर्यटन के प्रादुर्भाव के फलस्वरूप ही 1931 ई0 में फ्रैंक स्मिथ ने फूलों की घाटी खोज तथा वर्ष 1934 ई0 में टिहरी निवासी संत सोहन सिंह ने हेमकुण्ड साहिब को खोज निकाला था।


विश्व स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सर्वप्रथम वर्ष 1908 ई0 में स्पेन, पुर्तगाल और फ्रांस तीन देशों ने पर्यटन के उत्थान हेतु ’फ्रैकों-हिस्पेनों-पुर्तगाल फैड़रेशन ऑफ टूरिस्ट ऐसोसियेशन’ बनाया, जो कि विश्वस्तर पर प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन संगठन था। सन् 1925 ई0 तक आते-आते विश्व के कई देशों के प्रतिनिधियों ने इण्टरनेशनल यूनियन ऑफ आफीशियल टूरिस्ट पब्लिसिटी ऑर्गनाइजेशन की स्थापना की। उसके बाद सन् 1946 ई0 में विभिन्न देशों के पर्यटन संगठनों के प्रतिनिधियों की एक सभा लन्दन में आयोजित हुई और 1947 ई0 में इण्टरनेशनल यूनियन ऑफ आफीशियल ट्रेवेल्स ऑर्गनाइजेशन आ0 यू0 ओ0 टी0 ओ0 की स्थापना हुई। इसी क्रम में सन् 1951 ई0 में पैसेफिक एरिया ट्रेवल्स एसोसियेशन भी प्रारम्भ हुआ और उसके बाद 2 जनवरी 1975 ई0 को विश्व पर्यटन संगठन की स्थापना की गई। तत्पश्चात विश्व पर्यटन संगठन ने पर्यटन के महत्त्व को समझकर पर्यटन के विकास व उत्थान पर कार्य करना प्रारम्भ किया।


भारत में स्वतन्त्रता (1947 ई0) के बाद केन्द्रीय तथा प्रदेश सरकार ने पर्यटन की ओर ध्यान दिया। अतः सन् 1956 ई0 में उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने की दृष्टि से एक योजना तैयार की, जिसको विकास आयुक्त के अधीन रखा गया। यह योजना सन् 1961 ई0 में ट्रांसपोर्ट (परिवहन) कमिश्नर के अधीन दे दी गई। केदार सिंह फोनिया लिखते हैं कि ”उन्हें वर्ष 1956 में भारत सरकार के पर्यटन विभाग में इनफोरमेशन असिस्टेंट के पद पर 160.00 रू0 के बेसिक वेतनमान पर नौकरी मिली, जिसमें 60.00 रू0 मँहगाई भत्ता मिलाकर कुल 220.00 रू0 मिलते थे।” वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के कारण विदेशी पर्यटकों का आना-जाना बन्द हो गया। अतः भारत सरकार ने पर्यटन कार्यालयों को बन्द करने का आदेश दिया और पर्यटन विभाग के सभी युवा कर्मचारियों को बताया गया कि वे टेरीटोरियल आर्मी नामक प्रादेशिक सेना में भर्ती किये जा चुके हैं, लेकिन युद्ध विराम के बाद एक बार फिर पर्यटन विभाग का काम शुरू कर दिया गया। आगे वे लिखते हैं कि वर्ष 1960-70 के दशक तक बहुत से विदेशी धनाड्य लोग जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए पर्यटक के रूप में भी भारत आते थे। वर्ष 1963-64 में उत्तरी अमेरिका के अलास्का राज्य के गवर्नर टौम बौलाक पर्यटक के रूप में भारत आये थे, जो यहाँ से एक जंगली बैल का सिर व मोर पंख अपने साथ ले गये।

इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि किस प्रकार पर्यटन पर सरकार द्वारा पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तथा किस तरह सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध से पर्यटन प्रभावित हुआ। तत्कालीन समय में विदेशी पर्यटकों की रूचि भी इन तथ्यों से स्पष्ट होती है कि किस तरह वे वन्य जीव-जन्तुओं के शिकार के शौकीन थे। अतः पर्यटन से लाभ प्राप्त करने की तुलना में पारिस्थितिकी तन्त्र को नुकसान होता था।

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना से उत्तर प्रदेश के साथ ही गढ़वाल में पर्यटन की ओर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। इसके चलते ही जुलाई 1972 ई0 में एक पृथक पर्यटन निदेशालय की स्थापना की गई, क्योंकि इससे पूर्व परिवहन विभाग के ही अन्तर्गत रहने से पर्वतीय क्षेत्र में पर्यटन विकास की गति बड़ी मंद थी। परिवहन के लिए निर्धारित धन का व्यय सड़कों के विकास एवं रख-रखाव में होता था, जिससे पर्यटन उपेक्षित रह जाता था। अतः सन् 1974 ई0 में प्रदेश स्तर पर व्यापारिक दृष्टिकोण से पर्यटन विकास निगम की स्थापना की गई। तत्पश्चात 01 नवम्बर सन् 1976 ई0 को गढ़वाल मंडल विकास निगम की स्थापना हुई और पर्यटन को इसके अन्तर्गत रखा गया, इससे पूर्व गढ़वाल हिमालय में पर्यटन का कार्य पर्वतीय विकास मंत्रालय द्वारा देखा जाता था। गढ़वाल हिमालय में पर्यटन विभाग उत्तराखण्ड़ अलग होने से पूर्व (2000 ई0) उत्तर प्रदेश सरकार के अर्न्तगत कार्यरत्त था। गढ़वाल हिमालय में पर्यटन के विकास के बहुमुखी आयामों को देखते हुए गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण प्रयास किये, जैसे विभिन्न पर्यटक स्थलों, यात्रा मार्गों पर सुन्दर व आरामदायक भवनों का निर्माण, डीलक्स बसों, पैकेट टूर आदि अच्छी स्कीम चलाकर पर्यटन को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। अतः 20वीं सदी के अन्तिम दो दशकों में सरकार द्वारा प्रशिक्षित गाइडों की नियुक्ति कर तथा पर्वतारोहण, स्कींइग, टैªकिंग आदि की व्यवस्था कर पर्यटन के विकास में प्रगति हुई, जिससे यहाँ का आर्थिक पक्ष और भी मजबूत हुआ।

पर्यटन का मूल उद्देश्य मनोरम स्थलों का भ्रमण होता है। प्रकृति के मनोरम दृश्य निश्चय ही पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। अतः कह सकते हैं कि प्रकृति की गोद पर्यटन का सर्वोत्तम स्थल है तथा गढ़वाल हिमालय ने इस प्रकार के अनेक स्थल दिये हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रकृति के इन सुन्दर दृश्यों के आस-पास पर्यटकों के लिए आवास, भोजन आदि की व्यवस्था उपलब्ध हो। अतः प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यावरण और पर्यटन दोनों का मूल है। इसी कारण हमारे राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव विहार आजकल पर्यटकों को काफी आकर्षित करते हैं। गढ़वाल क्षेत्र में यदि पर्यटन को प्रोत्साहित करना है तो पर्यावरण की सुरक्षा करना सबसे आवश्यक है, क्योंकि भू-स्खलन, दरकते पहाड़ आदि पर्यटकों को कदापि आकृष्ट नहीं कर सकते हैं, बल्कि प्रकृति का श्रृंगार ही एक स्वस्थ मन को आकृष्ट करता है। एक पर्यटक के रूप में कह सकते हैं कि- यूरोप के स्वीटजरलैंड या कश्मीर में क्या है, जो गढ़वाल हिमालय में नहीं। अतः यहाँ के क्षेत्रों की मनोरम प्राकृतिक छटा को बनाये रखना, पर्यटन की दृष्टि से आज के युग की एक मुख्य आवश्यकता है।

पर्यटन पर निर्भर आर्थिकी

तीर्थयात्रा के आर्थिक महत्त्व को देखते हुए ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने ऐसी नीति अपनाई कि अधिक से अधिक यात्रा ब्रिटिश गढ़वाल से होकर जाय और ब्रिटिश सरकार अधिक से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त कर सके। इसके लिए अंग्रेजों ने मोटरमार्गों का विकास किया, जिसके मूल में यह भावना थी कि उचित मोटरमार्गों के उपलब्ध होने से बाहरी आगन्तुकों की संख्या में वृद्धि होगी और परिणामस्वरूप आर्थिक स्तर और भी उन्नत होगा। सम्भवतः इसीलिए अंग्रेजों ने यहाँ की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाई, लेकिन बाद के समय में अंग्रेजों ने गढ़वाल क्षेत्र में अपने आर्थिक पक्ष को और अधिक मजबूत करने के लिए तीर्थों के साथ-साथ पर्यटन की ओर भी विशेष ध्यान देना प्रारम्भ किया, क्योंकि प्रारम्भ से ही अंग्रेजों की नीति उपनिवेशों के शोषण की रही थी।

अतः उन्होंने लाभ को प्रमुखता देकर तीर्थयात्रा के साथ पर्यटन का नियोजन भी अपने ढंग से किया। वे यहाँ के सुन्दर प्राकृतिक स्थलों जैसे- फूलों की घाटी आदि स्थलों को दुनिया के सम्मुख लाये व तीर्थों तक सुन्दर मार्ग बनवाया साथ ही तीर्थों से 10-15 मील की दूरी पर सुन्दर बंगले स्थापित किये। पर्यटन से लाभ को मध्य नजर रखते हुए उन्होंने मसूरी, खिर्सू, लैंसडाउन आदि हिल स्टेशनों का निर्माण किया। इस प्रकार कुल मिलाकर अंग्रेजों ने यहाँ पर्यटन का नियोजन आर्थिक लाभ कमाने की दृष्टि से किया, जिसका लाभ आज यहाँ का जनमानस ले रहा है। तत्पश्चात गढ़वाल हिमालय में पर्यटकों की भारी भीड़ को देखकर अनेक पर्यटन स्थलों पर होटल आदि खुलने लगे तथा सरकार ने भी धीरे-धीरे इस ओर ध्यान दिया और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए गढ़वाल मण्डल विकास निगम की स्थापना कर इसके अन्तर्गत बस सेवायें व आवास व्यवस्था चलाई।

गढ़वाल में जब 6 माह के बाद तीर्थयात्रा बन्द हो जाती है तो वर्ष के बचे 6 माह यहाँ देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं, जिससे यहाँ के स्थानीय निवासियों का रोजगार निरन्तर चलता रहता है। यद्यपि तीर्थयात्रा में पर्यटन के सभी लाभ निहित होते हैं, परन्तु पर्यटन में तीर्थयात्रा अन्तर्निहित नहीं हो सकती है, क्योंकि तीर्थयात्रा की ‘आत्मा तरति पादादिकम पस्मात्’ अथवा तीरयते अनेन में बसती है, जबकि पर्यटन की आत्मा अर्थोपार्जन में बसती है। इस प्रकार गढ़वाल हिमालय को जो लाभ तीर्थयात्रा से होते हैं, वही लाभ पर्यटन से भी होते हैं। यहाँ ट्रेवल्स एजेन्ट्स एक ओर पर्यटक एवं दूसरी ओर परिवहन एवं आवास मालिकों के कार्यों की मध्यस्थता की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। यात्रा-अभिकर्त्ता पर्यटन के विभिन्न अंगों का इस प्रकार संगठन करते हैं कि यह वस्तु या सेवा के रूप में पर्यटकों को उपलब्ध हो सके। पर्यटन विभाग को वर्ष 2000 तक गढ़वाल मण्डल विकास निगम के अन्तर्गत ही रखा गया था।

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