उत्तराखंड का प्रमुख लोक पर्व नंदाष्टमी,सिर्फ देवी ही नहीं, बहिन, बेटी व बहू के रूप में भी घर-घर विद्यमान है नंदा – डॉ0 दीपक सिंह का खास लेख

उत्तराखंड का प्रमुख लोक पर्व नंदाष्टमी,सिर्फ देवी ही नहीं, बहिन, बेटी व बहू के रूप में भी घर-घर विद्यमान है नंदा –  डॉ0 दीपक सिंह का खास लेख
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उत्तराखंड का प्रमुख लोक पर्व नंदाष्टमी 
कहाँ नहीं है नंदा ??
नंदा तो कण-कण में विराजमान है।
सिर्फ देवी ही नहीं, बहिन, बेटी व बहू के रूप में भी घर-घर विद्यमान है, जिस प्रकार अल्मोड़ा के चंद वंशीय परिवार की राजकुमारी नंदा की मृत्यु पर नंदा देवी मंदिर स्थापना की जनुश्रुति है। उसी प्रकार गढ़वाल में एक जागर (स्तुति) के अनुसार चाँदपुर गढ़ नरेश भानुप्रताप की एक पुत्री का नाम नंदा बताया गया है, जिस नंदा का विवाह शिव से हुआ था और उसकी दूसरी बहिन का विवाह धारानगरी के राजकुमार कनकपाल से। इसीलिए नंदा एक ऐसी अकेली लोक देवी है, जो उत्तराखंड के दोनों मंडलों गढ़वाल-कुमाऊं में समान रूप से पूजी जाती है। हालांकि इसके पीछे अनेक जनश्रुतियां एवं ऐतिहासिक प्रमाण दिए जाते रहे हैं। लेकिन सच यह भी है कि नंदा यहाँ के लोक जीवन में एक नारी के प्रति अतुलनीय सम्मान, आस्था एवं श्रद्धा की प्रतीक है। लोक साहित्यकार बीना बेंजवाल की गढ़वाली में लिखी एक सुंदर कविता की पंक्तियाँ–


‘न गढ़पति रैन,
न तौंक राजपाट,
गढ़ भि कख बचिन,
होण से खंद्वार,
पर नंदा त एक चेतना च,
अर चेतना कि सदनि चलदि रंदि जात’
(अर्थात न गढ़पति रहे न उनका राजपाट, गढ़ भी उजाड़ होने से कहाँ बच पाए, पर नंदा तो एक चेतना है और चेतना की यात्रा कभी नहीं रुकती) सच का अंश भी यही है।


उत्तराखंड में प्रत्येक बारह वर्ष में होने वाली ऐतिहासिक नंदा देवी राज जात भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी अर्थात नन्दाष्टमी को की जाने वाली एक देवयात्रा है। जिसे कुमाऊँ मण्डल में अल्मोड़ा और गढ़वाल मण्डल में चमोली जनपद की कन्या की विदाई के रूप में मनाया जाता है। यहाँ के लोगों की आस्था है कि कैलाशवासी भगवान शिव को पति के रूप में वरण करने वाली नन्दा (पार्वती) इसी क्षेत्र की पर्वतीय कन्या थी जो प्रतिवर्ष अपनी ससुराल अर्थात त्रिशूल पर्वत (बधाण) से श्रावण मास में कुछ दिनों के लिए अपने परिजनों से मिलने के लिए अपने मायके चाँदपुर आती है और नन्दाष्टमी के कुछ दिन पूर्व यहाँ के सभी बड़े-बूढ़े-बच्चे उसे सभी आवश्यक भेंट-सौगात के साथ स्नेहपूर्वक ससुराल के लिए विदा करते हैं। इसी वार्षिक अनुष्ठान को नन्दा जात कहा जाता है। लेकिन इसके अतिरिक्त प्रत्येक बारह वर्षों के बाद यहाँ के राजवंशीय कुँवरों द्वारा उसे ससुराल भेजने को जो समारोह सरीखा विशिष्ट राजकीय आयोजन किया जाता है, उसे नंदा राजजात के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस परम्परा की शुरुआत गढ़वाल राजा ने सातवीं शताब्दी में की थी। नंदा जात हर साल अगस्त-सितम्बर माह में होती है। यह कुरूड़ के नन्दा मन्दिर से शुरू होकर बेदनी बुग्याल तक जाकर वापस लौट आती है। जबकि नंदा राजजात हर बारह वर्षों में होती है और इस यात्रा में लगभग ढाई सौ किलोमीटर की सघन वनों, पथरीले दुर्गम रास्तों तथा चोटियों व दरों की यात्रा तय की जानी होती है। यह यात्रा पिछली बार वर्ष 2014 में सम्पन्न हुई थी।

फ़ोटो का यह दृश्य चमोली जनपद में सप्तकुण्ड का है। दरअसल यहाँ हर वर्ष “नंदा देवी लोकजात” का आयोजन होता है,अगर देखा जाय तो यह यात्रा नंदा देवी राजजात से भी भव्य एवं रमणीक होती है। इस नंदा देवी लोकजात में भी प्रत्येक गाँव से नंदा देवी की पवित्र रिंगाल की “छंतोली” के साथ ग्रामीण अलग-अलग क्षेत्रों से आकर शामिल होते हैं और यह भव्य लोकजात चमोली जनपद के घाट (विकासनगर)ब्लॉक में स्थित माँ नंदा देवी के सिद्धपीठ कुरुड़ से यह यात्रा आरम्भ होती है। कुरुड़ से माँ नन्दा देवी की डोली के नेतृत्व में हजारों श्रद्धालु गाँव-गाँव भ्रमण के पश्चात रावण की तपस्थली “बैराश कुण्ड”, दाणी माता ,भुवनेश्वरी मंदिर, पगना, लुन्तरा, घूनी एवं घाट ब्लॉक के अंतिम गाँव रामणी से होते हुए बालपाटा बुग्याल, दँयनाली बुग्याल एवं सिम्बाई बुग्याल के विभिन्न पड़ावों को पार कर सप्त कुण्ड पहुँचती है। यहाँ सात विशाल जल कुण्ड हैं, जो लगभग 05 किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं। जिस कारण से इस क्षेत्र को “सप्त कुण्ड” कहा गया है। बेहद खूबसूरत एक के बाद एक सीढ़ीनुमा सात कुण्ड (सप्त कुण्ड) के दर्शन इस लम्बी दूरी की यात्रा का सबसे सुखद क्षण होता है।धार्मिक मान्यतानुसार कहा जाता है कि यहाँ ये सात कुण्ड “सप्त ऋषि” के रूप में विद्यमान हैं और यहीं पर सृष्टि की रचना भी हुई थी | सैकड़ों रंग-बिरंगी छतोलियाँ एक साथ लेकर श्रद्धालु इन पवित्र कुंडों की परिक्रमा करते हैं, जैसे की फ़ोटो के दृश्य में दिख रहा है। तत्पश्चात श्रेष्ठ कुण्ड के एक छोर पर सभी रिंगाल की पवित्र छांतोलियों को रख दिया जाता है , फिर गौड़ जाति के ब्राह्मणों द्वारा “छतोली” पर से चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदियाँ एवं अन्य खाद्य सामग्री को उतारा जाता है और तत्पश्चात सब भेंट (सम्लौण) माँ नन्दा को समर्पित कर दी जाती है। कुछ लोग हिमालय में स्थित इन पवित्र सप्त कुण्डों के तट पर अपने पितरों को तर्पण भी देते हैं कहते हैं यहाँ पिंड दान करने से जन्म-जन्मान्तर तक के लिए तर जाते हैं।

यह यात्रा विधिवत रूप से सैकड़ों गॉंवों के पैदल भ्रमण करने सहित कुल 16 दिन में पूरी की जाती है, जिसकी लम्बाई लगभग 220 किलोमीटर (आना जाना ) आँकी जाती है । इस यात्रा में घाट (विकासनगर) ब्लॉक, दशोली ब्लॉक, बिरही, निजमुला घाटी व बंड पट्टी के लगभग सभी गाँव शामिल होते हैं।
जब मां नंदा देवी की डोली किसी गाँव से जाने लगती है तो निम्न प्रकार के मार्मिक जागर कुरुड़ के पुजारियों द्वारा लगाए जाते हैं
मेरा मैत्यु वा झाले की कव्हेड़ि
ल्यावा मेरा मैत्यु वा बाड़े की मुन्गेरी!
मील जोण मैत्यु वा अपणा केलासे!!
कना केनी जोलु मी तै उंचा कैलास!
मेंरी जांदु फ्येरी मी मैतो कु मूलुके!!
मेंरी जांदु प्येरी मी उकाल पन्धेर्यु!
मेंरी जांदु फ्येरी मी बूढी लाटी माता!!
कना केनी रोलु मी हिंवाला कैलाश!
तै उंचा कैलास मा सका नि सुण्येंदी!!
तै उंचा कैलास मा ऋतु नि बोड़दी!
माता जी की लाड़ी मी बुबा की कुलाड़ी!!


इन जागरों को सुनकर हर एक माँ रोने लग जाती हैं।उनकी आँखों से आँशुओँ की धारा निकलने लगती है उस समय नंदा भगवती को देवी की तरह नहीं बल्कि एक बेटी की तरह समझा जाता है औऱ बेटी की तरह ही विदा किया जाता है नम आंखों से। इस प्रकार पहाड़ में नंदा देवी उत्सव हिमालयी जनमानस का पारिवारिक एवं पारम्परिक सौहार्द का उत्सव है।

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