उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों को समर्पित कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा दिवस –

उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों को समर्पित कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा दिवस –
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डॉ0 दीपक सिंह

उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों को समर्पित है कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा दिवस

01 सितम्बर 1994 का खटीमा कांड और 02 सितम्बर 1994 का मसूरी गोलीकाण्ड में मारे गए उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों को समर्पित है ‘कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा दिवस’। राज्य की बोली, भाषा और सांस्कृतिक पहचान के लिए उस वक्त जो आंदोलन हुआ था। उसकी याद में प्रतिवर्ष दो दिन अर्थात 1 सितम्बर व 2 सितम्बर को क्रमशः कुमाऊँनी व गढ़वाली भाषा दिवस मनाया जाता है।


हमारे पहाड़ी राज्य की बोली गढ़वाली व कुमाऊँनी, पहाड़ी राज्य से तेजी से लुप्त होती जा रही है। अपनी बोली को सीखने में रुचि की कमी से प्रदेश में हिंदी भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा ने भी हमारे घरों के आँगन तक पैर पसार लिए हैं। यहाँ तक कि हिंदी-अंग्रेजी भाषा अपना वर्चस्व धीरे-धीरे गाँव-घरों की देहरी लाँघकर चूल्हे तक अपना सीमाकंन करने में नित्य लगी है, क्योंकि वर्तमान पीढ़ी के नौनिहालों में यह धारणा अक्सर सींचित है कि शिक्षित और संपन्न लोग गढ़वाली व कुमाऊँनी नहीं बोलते हैं, बल्कि इसे बोलने वाले अनपढ़ और अविकसित लोग होते हैं। इसी का नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा लुप्तप्राय भाषा के रूप गढ़वाली व कुमाऊँनी भाषा को सूचीबद्ध किया गया है।


राज्य में दो भाषाएं गढ़वाली और कुमाऊँनी बोली जाती है, लेकिन इतने वर्ष बाद भी इन दोनों भाषाओं की स्थिति में कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया है। ऐसे में हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि इन भाषाओं को अपनी जीवनशैली में उतारें। वर्तमान दौर में गढ़वाल और कुमाऊं में बोली जाने वाली भाषाएं संक्रमण काल से गुजर रही हैं। इनको संरक्षित करने में अगर हम कमजोर पड़े तो आने वाले कुछ वर्षों में हम अपनी संस्कृति से भी विमुख हो जाएंगे। इसलिए गढ़वाली-कुमाऊँनी बोली/भाषा अवश्य सीखें।

गढ़वाली बोलन क्वी कठिन भाषा नी च ….
पहली त हम कु यो पता होण चैन्दु की
गढ़वाली भाषा कन के की बनी??आवा अब थोड़ा
गढ़वाली बोली का बारा मा जानकारी लेनदा हम..✍️

गढ़वाली बोली/भाषा, हिंदी और गोरखाणीं भाषा के मेल से बनी है। हम लोग कहीं-कहीं पर गुजराती और राजस्थानी भाषा का प्रयोग भी अपनी ‘गढ़वाली भाषा’ में करते है।
उत्तराखंड में पहली बार वर्ष 2019 में पौडी जिले के करीब 80 प्राइमरी स्कूलों में सरकार ने ‘गढ़वाली’ भाषा पढाने की शुरूआत की गई थी । जिले के पौडी़ ब्लाक में सभी सरकारी, अर्ध सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा एक से पांच तक हर रोज एक पीरियड में ‘गढ़वाली’ भाषा पठन-पाठन किया गया था । कक्षा एक से पांच तक के बच्चों के लिए क्रमश: धागुली, हंसुली, छुबकी, पैजबी और झुमकी नाम की पुस्तकें कोर्स में लगायी गयी हैं।


शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने कहा कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इसके लिए संभावनाएं तलाश कर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में पहले से ही गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषा की पढ़ाई करवाई भी जा रही है। उन्होंने नई शिक्षा नीति पर बोलते हुए कहा कि प्रदेश में पहली से पांचवी तक की पढ़ाई गढ़वाली-कुमाऊँनी समेत स्थानीय भाषाओं में करवाने की तैयारी की जा रही है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इसके लिए संभावनाएं तलाश कर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। साफ है कई राज्यों में स्थानीय भाषा को बढ़ावा देते हुए उसको पढ़ाया भी जाता है ऐसे में राज्य सरकार और शिक्षा विभाग अगर यह पहल करता है तो प्रदेश की बोली भाषा को आगे बढ़ाने के लिए यह कारगर कदम साबित हो सकता है।

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