कुमाऊँ में आज मनाया गया ‘गाय’ के लिए समर्पित ‘खतडुवा त्यौहार – डॉ, दीपक सिंह

कुमाऊँ में आज मनाया गया ‘गाय’ के लिए समर्पित ‘खतडुवा त्यौहार – डॉ, दीपक सिंह
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कुमाऊँ में आज मनाया गया ‘गाय’ के लिए समर्पित ‘खतडुवा त्यौहार’

खतडुवा त्यौहार को गैत्यार, भैल्लो त्यौहार आदि नामों से भी मनाया जाता है। खतडुवा पर्व प्रत्येक वर्ष अश्विन संक्रांति-17 सितम्बर (असोज मास) को मनाया जाता है। पंचाग में अश्विन संक्रांति को कन्या संक्रांति भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान सूर्यदेव, सिंह राशि की यात्रा समाप्त कर कन्या राशि मे प्रवेश करते हैं।
अश्विन मास अथार्त असोज मास में पहाड़ के लोगों में खेती के प्रति अफरातफरी मची रहती है। खतड़वा के दिन (17 सितम्बर) कुमाऊँ मण्डल में सुबह साफ-सफाई, कमरों की लिपाई कर दिन में पूजा पाठ कर पारम्परिक पहाड़ी व्यजंनों का आनन्द लिया जाता है। अश्विन मास में खेती का काम ज्यादा होने के कारण घर मे बड़े बुजुर्ग काम मे व्यस्त रहते हैं। इसलिए खतड़वा के डंक (डंडे जिनसे आग को पीटते हैं ) बनाने और सजाने की जिम्मेदारी घर के बच्चों को दी जाती है। परिवार में जितने आदमी होते है ,उतने डंडे बनाये जाते हैं। उन डंडों को कांस की घास के साथ उसे अलग-अलग फूलों से सजाते हैं। खतड़वा के डंडों के लिए कांस की घास और गुलपांग के फूल जरूरी माने जाते हैं। महिलाये इस त्यौहार के दिन गाय के गोशाले को साफ करके वहाँ घास डालती है और गायों के लिए आशीष गीत गाकर खतड़ुवा की शुभकामनायें देती हैं। गीतों की पंक्ति कुछ इस प्रकार रहती है–
औन्सो ल्यूला, बेटुलो ल्युला
गरगिलो ल्यूलो
गाड़ गधेरान बे ल्यूलो
त्यार गुसे बची रो, तू बची रे
एक गोरु बैटी गोठ भरी जो
एक गुसैं बटी भितर भरी जो
अर्थात दो दूर-दूर गधेरों-पर्वतों से तेरे लिए अच्छी घास लाऊंगी, बस तू सुखी सलामत रहे। तेरा मालिक सलामत रहे। एक गाय से पूरी गौशाला खुशहाल हो जाय और तेरे मालिक का घर भी खुशहाल रहे।
खतड़वा के दिन पहाड़ी ककड़ी का विशेष महत्व होता है, क्योंकि पहाड़ी ककड़ी खतडुवा पर्व के दिन प्रसाद के रूप में एक-दूसरे को दी जाती है। इसके लिए ककड़ी को एक-दो दिन पहले से ही चयनित करके ले लिया जाता है। खतडुवा मनाने वाले स्थान पर सुखी घास-पूस इकट्ठा कर टीला सा बना दिया जाता है।


जब समय आता है खतडुवा भैलो मनाने का तब चीड़ की लकड़ी की मशाल जलाकर, खतडुवा के डंडों को गौशाले के अंदर से घुमा कर लाते हैं और यह कामना की जाती है कि आने वाली शीत ऋतु हमारे पशुओं के लिए अच्छी रहे और उनकी रोग दोषों से रक्षा हो। फिर उन डंडों को लेकर व साथ में ककड़ी लेकर उस स्थान पर पर पहुँचा जाता है, जहाँ सुखी घास रखी होती है। उसके बाद सुखी घास में आग लगाकर उसे डंडों से पीटते हैं और कुमाऊँनी भाषा में खतडुवा पर गीत गाये जाते हैं, जिसमें कृष्णानन्द जोशी के लेख ‘कुमाऊँ का लोक साहित्य’ से उद्धरित पंक्ति—
”भैलो जी भैलो खतड़वा भैलो ।
गाई की जीत खतडुवा की हार।
खतडुवा नैहगो धारों धार।।
गाई बैठो स्यो, खतड़ु पड़ गो भ्यो।।”
ऐसे गीत के बाद घर के सभी सदस्य खतडुवा की आग को पैरों से फेरते हैं। इसके लिए कुमाऊँ में कहा जाता है कि जो खतडुवा की आग को कूद के या उसके ऊपर पैर घुमाकर फेरता है, उसे शीत मौसम परेशान नहीं करती है। खतडुवे की आग में से कुछ आग घर को लाई जाती है, जिसके पीछे भी यही कामना होती है कि नकारात्मक शक्तियों का विनाश और सकारात्मकता का विकास । उसके बाद पहाड़ी ककड़ी काटी जाती है व थोड़ी आग में चढ़ाकर, बाकी ककड़ी आपस मे प्रसाद के रूप में बाँटकर खाई जाती है। इसमें भी सबसे विशेष प्रसाद यह होता है कि में कटी हुई पहाड़ी ककड़ी के बीजों का खतडुवा के दिन तिलक किया जाता है अर्थात खतडुवा पर्व पर ककड़ी के बीजों को माथे पर लगाने की परम्परा होती है। किसी-किसी गावँ में तो खतडुवा मनाने के लिए विशेष पर्वत चोटी या धार होती है, जिसे खतडुवे धार भी कहते हैं।
सोचिए कैसी विशाल परंपराओं से भरी पड़ी है उत्तराखंड की धरती। ये ही वो वजह हैं, जिनकी बदौलत उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। खतडुवा पर्व मनाने और उसकी परम्पराओं से यह सिद्ध होता है, कि खतडुवा जाड़ों के आगमन तथा जाड़ों से स्वयं की और पशुओं की सुरक्षा की कामना का त्यौहार है। खतड़ुवा शब्द की उत्पत्ति “खातड़” या “खातड़ि” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है रजाई या दूसरे गरम कपड़े। यह भी ज्ञात है कि सितंबर के महीने में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में हल्की हल्की ठंड पड़नी शुरु हो जाती है।


एक तर्कहीन मान्यता के अनुसार कुमाऊं के चंदवंशीय राजा लक्ष्मीचन्द (8वें आक्रमण में) के सेनापति गैडा सिंह ने वर्ष 1605 ई0 में गढवाल के 44वें परमार वंशीय राजा मानशाह के सेनापति खतड़ सिंह (खतडवा) को इस युद्ध में हराया था, जिस युद्ध की जीत की याद में हर वर्ष कुमाऊँ में खतडुवा त्यौहार मनाया जाता है, पर इस संदर्भ में कुमाऊं के प्रसिद्ध कवि श्री बंशीधर पाठक “जिज्ञासु” की कविता की कुछ पंक्तियां इस कथा को नकारती है —-
अमरकोश पढ़ी, इतिहास पन्ना पलटी,
खतड़सिंग न मिल, गैड़ नि मिल।
कथ्यार पुछिन, पुछ्यार पुछिन,
गणत करै, जागर लगै,
बैसि भैट्यु, रमौल सुणों, भारत सुणों,
खतड़सिंग नि मिल, गैड़ नि मिल,
स्याल्दे-बिखौती गयूं, देविधुरै बग्वाल गयूं,
जागसर गयूं, बागसर गयूं,
अलम्वाड़ कि नन्दादेवी गयूं,
खतड़सिंग नि मिल, गैड़ नि मिल।

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