गढ़वाल हिमालय की प्राचीन चट्टियों का संरक्षण करना आवश्यक – डॉ. दीपक सिंह कुंवर

गढ़वाल हिमालय की प्राचीन चट्टियों का संरक्षण करना आवश्यक – डॉ. दीपक सिंह कुंवर
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गढ़वाल हिमालय की प्राचीन चट्टियों का संरक्षण करना आवश्यक

गढ़वाल हिमालय में मोटर सड़कों के निर्माण के साथ ही प्राचीन चट्टियों की विनाशलीला प्रारम्भ हुई, जिसके फलस्वरूप यहाँ का ऐतिहासिक, सामाजिक ढाँचा चरमरा उठा। शिव प्रसाद डबराल इन चट्टियों की विनाशलीला को इस प्रकार लिखते हैं कि- ”गढ़वाल में मोटर यातायात शुरू होते ही चट्टियों का विनाश शुरू हो जाता है। यात्रा सड़कों पर लारियाँ चट्टियों पर धूल फेंकती और चट्टी स्वामियों के भाग्य पर मिट्टी डालती हुई शोर मचाती हुई दौड़ती हैं”। अनेक चट्टियों के मकानों को नई मोटर सड़कें बनाने के लिए तोड़ दिया गया। श्री डबराल ने उस समय की लगभग 93 से अधिक चट्टियों के विनाश व 02 करोड़ से अधिक सम्पत्ति के नष्ट होने के आंकडे दिये हैं। इस प्रकार जहाँ चट्टियों का विनाश हुआ, वहीं दूसरी ओर कुली, डण्डी-कण्डी व घोडे-खच्चर वालों के रोजगार पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अतः इस व्यथा को तत्कालीन पर्वतीय कलाकार मूँगाबादी ने अपने गढ़वाली गीत में इस प्रकार व्यक्त किया

हरद्वार क्या जांण महाराज, हरिजी की फंड़ी की।
झमपांणी कंडेर बोलदन, हम पर लगगी खैड़ी जी।
मोटर ऐगी महाराज, भरपूर की पट्टी जी।
बाँजा पोड़गेन महाराज, कांड़ी खड की चट्टी जी।

अर्थात टिहरी महाराज को सम्बोधित इस गीत का भावार्थ यह है कि मोटर सड़क ने हमसे सारे आजीविका के साधन छीन लिये हैं। भरपूर पट्टी में मोटर आयी और उधर कई चट्टियाँ बीरान हो गये हैं, क्योंकि उस समय तक ऋषिकेश से कीर्तिनगर तक मोटरमार्ग बन गया था। तत्कालीन समय में बदरी-केदार तीर्थ यात्रामार्ग के प्रमुख स्थानों पर जहाँ वस्तुओं का क्रय-विक्रय, यात्रियों को ठहरने, खाने-पीने व रात्रि विश्राम के लिए कुछ छोटी-छोटी दुकानें होती थी ’हाट’ कहलाते थे। यही ‘हाट’ शब्द धीरे-धीरे गढ़वाल हिमालय में ‘बाजार’ शब्द के रूप में प्रयुक्त होने लगे। तत्पश्चात बाहरी प्रदेशों से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या व व्यापारियों के बढ़ने से यही बाजार कालान्तर में नगरीकरण के द्योतक बनने लगे। अतः प्राचीन चट्टियाँ कालान्तर में अपने क्रमिक विकास के फलस्वरूप क्रमशः हाट व बाजार और फिर धीरे-धीरे नगरों के रूप में स्थापित हुई।

ऐतिहासिक चट्टियों का संरक्षण

कुमाऊँ कमिश्नर विलियम ट्रेल महोदय ने 1827 से 1835 के मध्य प्राचीन चट्टियों से होते हुए बदरी-केदार तीर्थ तक 06 फुट पैदल मार्ग का निर्माण करवाया था, जिससे उस दौरान प्राचीन चट्टियों का मार्ग सुलभ हो गया था। प्राचीन समय में जब श्रद्धालु चार धाम पैदल यात्रा करते थे तब देश के विभिन्न भागों से श्रद्धालु मुनिकीरेती (राम झूला) में एकत्र होकर गंगा में स्नान करके शत्रुघ्न मंदिर में अपनी पैदल यात्रा की सफलता के लिए पूजन-अर्चन कर पैदल यात्रा के लिए आगे बढ़ते थे। तत्पश्चात जब पैदल यात्रियों का समूह गरूड़ चट्टी पहुँचता था तो तब गरूड़ चट्टी पर रूके यात्रियों को मुनिकीरेती की ओर प्रस्थान करने की अनुमति मिलती थी। यह तत्कालीन समय मे इस चट्टी की एक परम्परा सी बनी थी, जिस प्रकार कालान्तर में बदरी-केदार तीर्थयात्रा के दौरान बहुत से स्थानों में गैट सिस्टम के तहत यात्रियों की गाड़ियों को एक ठीक समयान्तराल के बाद ही प्रस्थान करने की अनुमति दी जाती है, ठीक उसी प्रकार तत्कालीन समय में मुनीकीरेती और गरूड़ चट्टी में यात्रियों को प्रस्थान करने की अनुमति दी जाती थी।

प्राचीन पैदल तीर्थयात्रा के समय गढ़वाल हिमालय के चार धाम यात्रा के अन्तर्गत गरूड़ चट्टी पहला पड़ाव होता था। समय के साथ जब तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि होती रही तो बदरी-केदार पैदल तीर्थयात्रा मार्ग में स्थित चट्टियों में धीरे-धीरे बाबा काली कमली ने हर एक कोस (8000 हाथ) अर्थात 02 मील/लगभग 3.25 किमी0 की दूरी पर श्रद्धालुओं की सेवा के लिए निःशुल्क विश्राम व भोजन आदि के लिए आवास स्थापित करना शुरू कर दिया था, जिन धर्मशालों को आज भी गढ़वाल हिमालय के यात्रामार्ग में देखा जा सकता है। ऐसा ही एक धर्मशाला ऋषिकेश से 15 किमी0 आगे मोहन चट्टी/नाई मोहन चट्टी से आधा किमी0 पहले महादेव सैण में आज भी देखा जा सकता है। यहाँ पर धर्मशाला बनाने के लिए श्री राम गिरी ने 13 जून 1927 ई0 को 30 नाली जमीन काली कमली धर्मशाला पंचायत को दान में दी थी। सम्भवतः तत्कालीन समय में यहाँ पर काली कमली ने धर्मशाला इसलिए बनवाया होगा, क्योंकि मोहन चट्टी के एवज में यहाँ पर धर्मशाला बनाने के लिए उचित स्थान रहा होगा, जैसे कि महादेव सैंण (गढ़वाली भाषा में सैंण का अर्थ समतल होता है।) नाम से ही ज्ञात होता है।

आज भी महादेव सैण में स्थित धर्मशाला में एक चौकीदार रहता है, जो धर्मशाला काली कमली द्वारा प्रशासित जर्जर हालत में है। अगर आज भी इस धर्मशाला को देखेंगे तो यहाँ स्थित भवन के दरवाजे पर संगल (दोनों दरवाजों को बन्द करने के लिए लगी लोहे की मोटी जंजीर को गढ़वाली बोली में संगल कहते हैं।) लगा दिखाई देगा, इस प्रकार का संगल हम आज भी गढ़वाल हिमालय के प्राचीन घरों के दरवाजों पर लगा हुआ देखते हैं। महादेव सैंण में वर्ष 1912-13 के समय 05 दुकानें थी, जो 1980-85 के दौर तक घटकर 02 ही रह गई थी, लेकिन कालान्तर में यह स्थान वीरान होता जा रहा हैै। भले ही आज भी इस धर्मशाला में यात्रियों के लिए काली कमली ट्रस्ट द्वारा राशन भेजा जाता है, लेकिन पैदल यात्रियों के अभाव के कारण उस राशन की मूल्य राशि को धर्मशाला के चौकीदार के वेतन में ही समायोजित किया जाता है। आज जब हम इन चट्टियों के मूक इतिहास की स्थिति को देखते हैं तो स्वयं में दुःख का एहसास होता है।

गुजरते थे काफिले कभी, रौनकें बस्ती थी जहाँ।
पुकारते, इमारत जर्जर हुई, आज कोई तो ठहरे यहाँ।।

हमें इन चट्टियों को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संजोकर रखना चाहिए, जिससे हम इस स्वस्थ सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत रूप में स्थानान्तरित कर सके। अतः इन चट्टियों का रख रखाव उसी तर्ज पर किया जाना चाहिए जैसे पौराणिक या मुगलकालीन स्मारको का किया जाता है। कालान्तर में साहसिक यात्राओं के बढ़ते परिप्रेक्ष्य को देखते हुए इन प्राचीन चट्टियों के पैदल मार्ग को सही स्तर पर व्यवस्थित कर अनियंत्रित प्रदूषण पर भी नियंत्रण पाया जा सकता हैं। इन चट्टियों में स्थित पड़ाव व इनसे जाने वाले पैदल मार्ग की देखरेख का जिम्मा उन चट्टियों के समीप स्थित ग्राम सभा या नगर पंचायत को देकर यात्रियों से प्राप्त होने वाली आय स्थानीय विकास में प्रयोग किया जा सकता है।
यदि इन चट्टियों का पुनर्निर्माण व विकास किया जाए तो कालान्तर में जो पैदल यात्राएं की जाती है वे इन्हीं चट्टियों से होते हुए सम्पन्न की जा सकती है जैसे वर्ष 1973-74 से प्रो0 शेखर पाठक द्वारा पिथौरागढ़ के अस्कोट के पांगो नामक स्थान से अस्कोट-आराकोट पैदल यात्रा शुरू की गई थी, जो कालान्तर में बदरीनाथ धाम के लिए भी शुरू की गई है। इस पैदल यात्रा में वर्ष 2014 में लगभग 300-400 तक स्थानीय व विदेशी लोग शामिल हुए थे।
इसी के साथ यदि केदारनाथ आपदा के दौरान प्राचीन चट्टियों का संरक्षण कर उनको संजोया गया होता तो सम्भवतः केदारनाथ आपदा में मरने वालों की संख्या कम होती, क्योंकि जब सारी सड़कें बन्द हो गई थी, तो उस दौरान लोगों को इन प्राचीन चट्टियों से आने-जाने में मदद मिलती।

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