नानी और दादी की प्रेरणा से 24 वर्षीय रविन्द्र कर रहे हैं पौराणिक लोकगीतों का संरक्षण – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर

नानी और दादी की प्रेरणा से 24 वर्षीय रविन्द्र कर रहे हैं पौराणिक लोकगीतों का संरक्षण – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर
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नानी और दादी की प्रेरणा से 24 वर्षीय रविन्द्र कर रहे हैं पौराणिक लोकगीतों का संरक्षण

रविन्द्र सिंह रावत पुत्र श्री मनवर सिंह रावत, जो कि पौड़ी गढ़वाल जनपद के नैनीडाण्डा ब्लॉक के बसेडी गांव के मूल निवासी हैं और वर्तमान में राठ महाविद्यालय नैनीडाण्डा से बी0एड की शिक्षा (सत्र् 2019-21) प्राप्त कर रहे हैं। 24 वर्षीय यह युवा इस चकाचौंध व आधुनिकता के दौर में वर्ष 2016 से अपनी संस्कृति व परम्पराओं को संरक्षित करने की कवायद में जुटा है, क्योंकि वर्ष 2016 में जब रविन्द्र की नानी श्रीमती विमला देवी उनके निवास स्थान/ घर देहरादून आई तो तब रविन्द्र ने उस दौरान अपनी नानी से एक चौंफला लोकगीत सुना था, जिस लोकगीत ने रविन्द्र के जीवन को गढ़वाली लोकगीतों की ओर झोंक दिया था। वह चौंफुला लोकगीत है-

देवों मा देव को देव बड़ों?
देवों मा देव महादेव बड़ों
फूलों मा फूल को फूल बड़ों?
फूलों मा फूल सितराज बड़ों

यही लोकगीत रविन्द्र को इतना भा गया था कि उसके बाद रविन्द्र ने अपनेे प्राचीन लोकगीतों का संकलन करना शुरू कर दिया। मैदानी क्षेत्र से पढ़ाई कर रहे रविन्द्र को उनकी नानी ने उसके बाद न सिर्फ गाने की कला सीखाई, बल्कि रविन्द्र को उन पौराणिक लोकगीतों का अर्थ भी समझाया। तत्पश्चात रविन्द्र की उत्सुकता पौराणिक लोकगीतों के प्रति इतनी बढ गई कि उन्होंने अपने दादा-दादी से भी उनके दौर में गाए जाने वाले प्राचीन लोकगीतों के बारे में भी जानना शुरू किया। रविन्द्र बताते हैं कि उन्होंने अपनी नानी व दादी से सुने लोकगीतों को याद रखने के लिए उन लोकगीतों को एक डायरी में लिखना शुरू कर दिया था। तत्पश्चात डायरी में लिखे लोकगीतों को रविन्द्र रोजाना अभ्यास करने के बाद क्रमशः पहले अपनी नानी को व फिर अपने दादा-दादी को उन डायरी में लिखे लोकगीतों को सुनाते थे। फलस्वरूप लोकगीतों के प्रति रविन्द्र की उत्सुकता व चाह दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई और अन्त में उन्होंने इन लोकगीतों को संरक्षित करने की ठान ली। उसके बाद रविन्द्र को इन लोकगीतों को प्रसारित करने के लिए एक प्लेटफार्म/माध्यम की आवश्यकता हुई।

अतः वर्ष 2018-19 से रविन्द्र ने फेसबुक के जरिए इन लोकगीतों को दुनिया के सम्मुख रखने का प्रयास किया। अतः कालान्तर में रविन्द्र फेसबुक प्लेटफॉर्म के जरिए इन सुन्दर पौराणिक लोकगीतों को गाकर इन्हें आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। रविन्द्र की फेसबुक प्रोफाइल से ज्ञात होता है कि रविन्द्र सुर से भी एक मजे हुए खिलाड़ी हैं, क्योंकि रविन्द्र बहुत से वीडियों में अकेले व कभी-कभी स्कूली बच्चों के साथ सामूहिक रूप से व कभी-कभी गाँव की बूढ़ी दादियों के साथ भी गाते हुए दिखाई देते रहे हैं, लेकिन मुझे हैरानी तब होती है, जब ज्ञात होता है कि रविन्द्र ने अपने 24 वर्ष की उम्र में ज्यादा वर्ष मैदानी क्षेत्रों में बिताए हैं, क्योंकि रविन्द्र बताते हैं कि उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा (01 से 06 तक) गांव की स्कूल बसेडी से प्राप्त करने के बाद मैदानी क्षेत्र से ही शिक्षा प्राप्त की। रविन्द्र ने कक्षा 07 से 12 तक की शिक्षा राजकीय इण्टर कॉलेज कमान्दा दिल्ली, सर्वोदय सह शिक्षा विद्यालय जयदेव पार्क, नई दिल्ली से प्राप्त की। तत्पश्चात स्नातक (बी0 एस0 सी0, सत्र् 2014-17) व स्नातकोतर ((एम0 एस0 सी0- रसायन विज्ञान, 2017-19) की शिक्षा श्री गुरू रामराय पी0 जी0 कॉलेज देहरादून से प्राप्त की।

रविन्द्र के जीवन में इन लोकगीतों की दौड़ तब तेज हुई, जब रविन्द्र ने वर्ष 2019 में बीएड के लिए राठ महाविद्यालय में प्रवेश लिया। अपने बी0एड प्रशिक्षण के दौरान रविन्द्र के जीवन में ऐसे बहुत से मौके आए, जब रविन्द्र को बीएड के दौरान इन लोकगीतों को गाते हुए देखा गया। साथ ही इसी दौर में रविन्द्र को अलग-अलग स्कूली बच्चों के साथ भी इन लोकगीतों को गाते व बच्चों को सीखाते हुए भी देखा गया। रविन्द्र का कहना है कि मैं अपने जीवन में शिक्षक बनकर इन लोकगीतों को भावी छात्र-छात्राओं को सीखाकर, उनके भीतर अपनी प्राचीन संस्कृति के बीजों को अंकुरित कर इन लोकगीतों को हमेशा के लिए जिन्दा रखना चाहता हूं।

रविन्द्र को गढ़वाल की पारम्परिक वेश-भूषा में पेंटिग्स बनाने का भी शौक है, क्योंकि रविन्द्र ने गढ़वाल हिमालय की पारम्परिक वेश-भूषा में चौंफला, तांदी, थड़िया, झौडा, विवाह समारोह, धान कूटने, मांगलिक गीत गाते हुए व नृत्य करती हुई महिलाओं की अनेक पेंटिंग्स भी बनाई है और उन पेंटिंग्सों/चित्रों के एक हिस्से में रविन्द्र द्वारा प्राचीन लोकगीतों को शीर्षक के माध्यम से लिखने की आदाकारी भी खूब भा चुकी है। इन पेंटिंग्सों/चित्रों में हमारी पौराणिक परम्पराएं व रीति-रिवाजों की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। अतः रविन्द्र द्वारा वर्तमान में पेंटिंग्स/चित्रों के माध्यम से भी लोकगीतों को संरक्षित किया जा रहा है।

रविन्द्र का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने प्राचीन लोकगीतों को आने वाली नईं पीढ़ी तक पहुंचाना है। वे ये भी बताते हैं कि ऐसे न जाने कितने गीत और होंगे, जो किन्हीं कारणों से हम तक नहीं पहुंच पाए और बहुत से ऐसे गीत भी होंगे, जो हमारी बूढ़ी नानी-नाना, दादा-दादी से आगे से आने वाली पीढ़ी से भी नहीं पहुंचे होंगे। ऐसे ही एक लोकगीत का जिक्र रविन्द्र ने मुझसे कुछ माह पूर्व 18 जुलाई 2021 को किया था। रविन्द्र ने मुझे बताया था कि जब एक बालिका/कन्या का विवाह 60-70 के दशक में उत्तरकाशी जनपद से पौड़ी गढवाल मेें हुआ तो उस दौर में इस पारिवारिक सम्बन्ध ने देवर-बौजी के रिश्ते ने एक लोकगीत को फलीभूत किया था, जिस लोकगीत ने हमारी प्राचीन संस्कृति को तो जीवंत रखा ही साथ ही उस लोकगीत ने परेडू और रौडी तकनीकी से बनी छांछ को भी अमर किया, जिस लोकगीत कि पंक्ति थी-

रौडी छोली छांछ रे द्यूरा रौडी छोली छांछ झम।
मेरा मुलुक होन्दा रे द्यूरा तांदी झुमैला नाच झम।।
खाई जाला केला हे बौजी खाई जाला केला झम।
तेरा मुलुक मि औंलू हे बौजी मकरैणि माघ मेला झम।।
फूली जाली जाई रे द्यूरा फूली जाली जाई झम।
उत्तरकाशी माघ मेला तू जरूर आई झम।।
कोठारी की सांद हे बौजी कोठारी की सांदा झम।
तेरा रौंत्याला मुलुक हे बौजी क्या लांदा क्या खांदा झम।।
ग्यों जौ की बल सार हे द्यूरा ग्यों जौ की बल सार झम।
कौणि झंगोरु खाणु अर अंगुड़ी को पैरवार झम।।
हैरी चूड़ी कांच हे बौजी हैरी चूड़ी कांच झम।
तेरा मुलुक मा मेरी बौजी कना लगदा नाच झम।।

रविन्द्र के अनुसार – थड़िया लोकगीत स्त्री व पुरूषों द्वारा गाया जाने वाला यह लोकगीत प्रकृति, देवी-देवताओं समसामयिकी घटनाओं, इतिहास, भूगोल, खान-पान, रहन-सहन आदि से संदर्भित होता है।
रविन्द्र अभी तक लगभग 30 से 35 लोकगीतों का संकलन कर चुके हैं, जिनमें से कुछ लोकगीतों पर गढ़वाली ऐल्बम भी रिलीज हो चुकी है।

रविन्द्र द्वारा अक्सर गाए जाने वाले कुछ लोकगीत-

चला बौजी रणा कोली डांडा हैर्यली
क्वीं घास का टालू डांडा हैर्यली
क्वीं पूली बांधा ली डांडा हैर्यली
क्वीं भैंसी चरालूँ डांडा हैर्यली

पैली जनि नि रैगे अब त सौंजड्या तू
खट्टी मिठ्ठि सी ह्वेगे अब त सौंजड्या तू
न पैली जनु वो ब्वलणु बच्याणु
झणि कख हरची हैंसणु हैंसाणु
समणी देखी मुख लुकांदी सौंजड्या तू
सुपिन्यो मा ही आंदी अब त सौंजड्या तू

औंसी की घनघोर रात सुवा
गैणा अगास छन
उज्याली च मुखडी तेरी
जून कु क्या कन

चित लूछि लिजांदी तेरी मायादार छुइं
पैली मिकु गढ़वाल प्यारू दूजी सुवा तूही

छम छम ब्वगदु छंछड्यों कु पाणी
कुयेड्योंन रौली कनी छीं ढकाणि
छम छम ब्वगदु छंछड्यों कु पाणी

ह्यून्द बि ग्याई बसन्त बि ग्याई
लगिगे भादौ चौमासा
हैरी भैरी डाळी बोटी
हैरू हैरू चा घासा
सर सर ब्वगदी डांडयों कि हवा
झम झम बरखा कु पाणी
छम छम ब्वगदु छंछड्यों कु पाणी

द्यो द्यबतों कु थान डांड़यों मा यख
मां नन्दा कु मैत महादेवा कु थान
यख खोळी का गणेश मोरी का नारैण
वीर भड़ों की या थाती महान
मेरु मैत्या मुलक रौंत्यालु भलु स्वाणू यू कुमौ गढ़वाल
धौली गंगा भगीरथी को पाणी अमृत यख बदरी विशाल

हैरी डांडयो बीच बस्यूं रौंत्यलु मुलुक मेरु
देखी हैरी डाल्यों मेरु मन बी ह्वेगे हैरू
हैरा रंग मा रंगिगे देखा छबिलो पहाड़ सैरू
ऐजा बौडी देखी जादी द्यबतों कु देश तेरु

पैली जनि नि रैगे अब त सौंजड्या तू
खट्टी मिठ्ठि सी ह्वेगे अब त सौंजड्या तू
न पैली जनु वो ब्वलणु बच्याणु
झणि कख हरची हैंसणु हैंसाणु
समणी देखी मुख लुकांदी सौंजड्या तू
सुपिन्यो मा ही आंदी अब त सौंजड्या तू

“बाली जाली बत्ती छौ छम ,
तुम जैल्या सुबेर छौ छम
बल मिल चली जाणा रात्ती छो छम
बल भैंसी मूडी कीच छौ छम
हे मिल कख लीजाणि छौ छम
बल रंगरूट्यों का बीच छौ छम “

हे बांज बुरांशी त्वेमा छ्वीं लगांदु
सौंजड्या च मेरी गैणू मा की चांद
डांडयो पोर द्यो बरखी गदनी धुमैली
मयलु पराण वींकू मन की उमैली(पवित्र)
भेद जिकुड़ी कु त्वेमा खोली जांदू
यनी च भग्यान बान्दु मा की बाँद

ननि ननि घिंघरे की डाळी झुम्पा कैन त्वाडा दा
गांव का पधान पूछा झुम्पा कैन त्वाडा दा “

डांडयो की सर सर हवा बगदी
झम झम बरखा कु पाणी
मेरी माया सांची सौंजड्या
त्वेन कबि नि पछ्याणी

रविन्द्र आगे चलकर इन सभी लोकगीतों को एक पुस्तक का आकार देना चाहते हैं, जिस पुस्तक में गढ़वाल हिमालय के अलग-अलग गांवों के लोकगीतों को भी संकलित किया जायेगा, क्योंकि लोकगीत हमें हमारी संस्कृति से जोड़ते हैं। अतः रविन्द्र द्वारा इन लोकगीतों को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने का जो प्रयास किया जा रहा वह सराहनीय/काबिल-ए-तारीफ है। इसलिए मेरा रविन्द्र के लिए एक संदेश-

सोची न समझी, बस पिरोयी जायेगी।
आप वो धुन हो, जो लोकगीतों में गायी जायेगी।।

गढ़वाल हिमालय के लोकगीतों को अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार लिखा और गाया गया है, जिनकी धुन और मिठास से हम मनुष्य ही नहीं, बल्कि इस मिठास से देवी-देवता भी दूर नहीं रह पाए। भले ही हम देश के किसी भी कौने में क्यों न रहे, लेकिन हमें हमारे लोकगीत अपने गांव की मिट्टी से जोड़ ही देते हैं। मैं आशा करता हूं कि ये लोकगीत यूहीं हमें पीढ़ी दर पीढ़ी एक-दूसरे से जोडे़ रखेगी। इन लोकगीतों में ही हमारी संस्कृति जीवन्त दिखाई देती है, क्योंकि लोकगीतों में परिस्थिति और वातावरण की स्पष्ट छाप होती है। गढ़वाली लोकगीतों में हिमालय की सुरम्य सुगन्धित प्रकृति और गरिमामय संस्कृति प्रवाहित होती है। इसीलिए यहां के स्वच्छन्द वातावरण में लोकगीत भी स्वच्छन्द है। हमारे पौराणिक लोकगीत, साहित्य के समान होते हैं, जो सबसे पहले व्यक्तिगत स्तर पर विचारों को परिष्कृत करते हैं और व्यक्तिगत स्तर पर विचार परिष्कृत होने के बाद ही हम समाज को परिष्कृत करने के लिए अग्रसर होते हैं।

मेरा अपना व्यक्तिगत मत तो यही है कि मैं लोकगीत को सबसे ‘पाक’ चीज़ मानता हूँ इतना ‘पाक’ कि वह आपके अंदर के मैल से जब मिलता है तो उस मैल को उजला देता है। लोकगीत सभी को संवेदनशील बनाते हैं। लोकगीत को सुनते ही हमारा सीना भारी हो जाता है, लेकिन समाज में आजकल बहुत से लोग अपनी संस्कृति के बचाव में सिर्फ इसीलिए जुटे हैं, ताकि उनकी एक पब्लिसिटी बनी रहे। वास्तव में उनका किसी संस्कृति-परम्पराओं से कुछ लेना देना नहीं होता है। इसीलिए मुझे समाज में सबसे ज़्यादा समस्या उन्हीं विमर्श वाले लोगों के दोगलेपन से है। जैसे स्कूली कोर्स में ‘गोदान’ उपन्यास पढ़ाते हुए अध्यापक किसान, जीवन की त्रासदी बताएँगे, लेकिन राजनीतिक फ़ायदे के लिए देश में चल रहे किसान आंदोलन को देश विरोधी आंदोलन बताने लगेंगे।

रविन्द्र के लिए कुछ पंक्ति–

जिस आस्था के साथ
करते हैं भक्त अपने
ईष्ट देवता पर अर्पित पुष्प
मैं कोरे कागज़ों पर
अर्पित करता हूँ लोकगीत
क्योंकि
लोकगीत मेरी आस्था का है
सर्वोच्च केन्द्र
लोकगीत से व्यथित होकर
मैंने नहीं किया कभी
ईश्वर का स्मरण,
ईश्वर से व्यथित होने पर
लिखे हैं मैंने लोकगीत।

मेरे पसंदीदा लोकगीत की पंक्ति–
चौमासी रिमझिम मिति सी रैग्यों।
जगा-जगा छूम छ्यटा मिति सी रैग्यों।।

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