गढ़वाल हिमालय में बदरी-केदार तीर्थयात्रा का यातायात व्यवस्था पर खास प्रभाव – डॉ.दीपक सिंह कुंवर का खास लेख

गढ़वाल हिमालय में बदरी-केदार तीर्थयात्रा का यातायात व्यवस्था पर खास प्रभाव – डॉ.दीपक सिंह कुंवर का खास लेख
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गढ़वाल हिमालय में बदरी-केदार तीर्थयात्रा का यातायात व्यवस्था पर प्रभाव

प्राचीनकाल से गढ़वाल हिमालय में सबसे महत्त्वपूर्ण मार्ग बदरी-केदार को जाने वाला तीर्थमार्ग था, जिस मार्ग पर तीर्थयात्री पैदल यात्रा करते थे। धार्मिक आस्था के चलते प्राचीन तीर्थयात्रा करने वालों में बूढे़-बूढ़ियों की संख्या अधिक होती थी, जो पैदल यात्रा के दौरान कहते थे कि-

बदरी-केदार पंथ कठिन हम जानी।
प्रथम चढ़ाई लक्ष्मण झूला, सुनु गंगा घहरानी।।

अर्थात बदरी-केदार का यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। इतना कठिन यात्रामार्ग होने के बावजूद भी गढ़ नरेशों ने बदरी-केदार तीर्थमार्ग की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, लेकिन गोरखाओं के शासनकाल में इस तीर्थमार्ग की मरम्मत यहाँ के ग्रामीणों के द्वारा करवाई गई थी तथा सन् 1800 ई0 में खोह नदी के किनारे कोटद्वार से फतेहपुर तक एक बैलगाड़ी चलने के लिए सड़क का निर्माण कर दिया गया था। ब्रिटिश शासनकाल में ट्रेल नामक अंग्रेज अधिकारी ने बदरी-केदार तीर्थों से अधिक आय प्राप्त करने के लिए यात्रामार्ग की ओर विशेष ध्यान दिया। अतः ट्रेल ने सदावर्ती गाँवों की आय को अपने हाथ में लेकर सन् 1827-28 ई0 हरिद्वार से बदरी-केदार को जाने वाले मार्ग का निर्माण कार्य शुरू कर दिया, जो सन् 1835 ई0 तक एक ऐसा तीर्थ यात्रामार्ग बना चुका था, जिस पर पैदल श्रद्धालु तथा भार लदे पशु आसानी से चल सकते थे। सन् 1840 ई0 के बाद सदावर्ती गाँवों की बचत राशि अर्थात तीर्थयात्रियों के भोज्य सामग्री व औषधि वितरण के बाद शेष बची राशि का उपयोग तीर्थयात्रा मार्ग को चौड़ा करने के लिए किया जाने लगा।

आधुनिक काल में जब मोटर मार्गों का निर्माण किया जाने लगा तो गढ़वाल हिमालय में सर्वप्रथम 1935 में टिहरी नरेश श्री नरेन्द्रशाह बहादुर ने दीवान चक्रधर जुयाल की देख-रेख में जनश्रम से ऋषिकेश से देवप्रयाग तक 44 मील लम्बी सड़क बनवाई थी। बाद में इसे आगे बढ़ाया गया, जिससे बिडोलीसैंण (कीर्तिनगर का प्राचीन नाम) से गढ़वाल में यात्रा करना आसान हुआ। इस प्रकार सन् 1935-36 ई0 तक टिहरी गढ़वाल में ऋषिकेश से कीर्तिनगर तक मोटरमार्ग तैयार किया जा चुका था, जबकि सन् 1936 ई0 में फतेहपुर (दोगड्डा/नाथोपुर, कोटद्वार के समीप) से हरेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में जिलाबोर्ड की ओर से ब्रिटिश गढ़वाल में मोटरमार्ग का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया गया। अतः सन् 1941 ई0 में दोगड्डा मोटरमार्ग सतपुली तक पहुँचा। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इस क्षेत्र के लिए सन् 1948 ई0 में मात्र 260 मील लम्बी सड़क निर्माण की स्वीकृति प्रदान की थी। इसके अतिरिक्त कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया था।

भले ही दिसम्बर 1946 ई0 तक मोटर मार्ग लालसांगा (चमोली) तक पहुँच गया था। इस कारण से मार्च 1947 तक कर्णप्रयाग तक नियमित रूप से यात्री गाड़ियाँ आने लगी थी। स्वतंत्रता के पश्चात उत्तराखण्ड में श्रमदान द्वारा सड़क निर्माण कार्य को लेकर एक आन्दोलन चलाया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक वर्ष के भीतर ही 1953 ई0 में गढ़वाल के चौंदकोट क्षेत्र में जनता ने 60 मील लम्बी सड़क का निर्माण किया। श्रमदान द्वारा निर्मित सड़कों में चौंदकोट, सतपुली-बाघाट-कांसखेत-पौड़ी, कर्णप्रयाग-आदिबद्री, दुगड्डा-लक्ष्मणझूला आदि जगह की अनेक सड़के सम्मिलित थी। यद्यपि भारत-चीन युद्ध (1962 ई0) के बाद सरकार ने यहाँ के मोटरमार्गों के निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया और परिणामस्वरूप मोटरमार्ग का निर्माण भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित माणा व नीती गाँवों तक किया गया, लेकिन जिस प्रकार से यह मोटरमार्ग गढ़वाल हिमालय के तीर्थस्थानों जैसे- देवप्रयाग, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, जोशीमठ, विष्णुप्रयाग व बदरीनाथ, अगस्त्यमुनि, गौरीकुण्ड, गोपेश्वर आदि को जोड़ते हुए निर्मित किया गया, उससे स्पष्ट होता है कि मोटरमार्ग निर्माण के पीछे कहीं न कहीं तीर्थयात्रा को भी ध्यान में रखा गया था।

20वीं सदी के मध्य अर्थात आजादी से पूर्व तक यदि बदरी-केदार तीर्थमार्ग अवरूद्ध हो जाते थे, तो तीर्थमार्ग की मरम्मत स्थानीय लोगों या चट्टियों में रहने वाले लोग स्वयं ही करते रहे थे, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण समय-समय पर तीर्थमार्ग अक्सर अवरूद्ध हो जाते थे और ऐसी स्थिति में मार्ग की मरम्मत न होने सेे तीर्थयात्रा में व्यवधान उत्पन्न हो जाता था। अतः यहाँ के लोग समय-समय पर इन मार्गों का जनश्रम के माध्यम से मरम्मत करते रहते थे। आजादी के बाद सरकार ने मार्ग निर्माण का कार्य अपने हाथों में ले लिया और मार्ग के क्षतिग्रस्त होने पर उसकी मरम्मत का कार्य भी स्वयं करवाया, क्योंकि बदरी-केदार तीर्थ धीरे-धीरे आय के स्रोत बनते जा रहे थे।

गढ़वाल में प्रारम्भ में चलने वाली लकड़ी के स्पोक वाले ठोस पहियों की गाड़ी विलिज ओवर बण्ड थी, जिसे श्री नाथूराम (पनवाड़ी) ने कोटद्वार से दुगड्डा तक चलाया था। इस गाड़ी में 8 सवारियों को बैठने की जगह थी तथा किराया प्रति सवारी एक आना था। उस समय मुसाफिर गाड़ी के सफर से पैदल का सफर ज्यादा सुरक्षित समझते थे, लेकिन धीरे-धीरे इस नये तथा अपेक्षाकृत कम जोखिम भरे व्यवसाय के प्रति गढ़वाल के लोगों की रूचि बढ़ने लगी और यह व्यवसाय रोजगार हेतु एक प्रमुख व्यवसाय बन गया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 1940 के दशक तक बदरी-केदार तीर्थों के यात्रामार्ग को तय करने के लिए मोटर के साथ ही पैदल के अलावा डंडी, झंपान, कंडी, घोड़ा और हवाई जहाज का भी प्रबन्ध था। हरिद्वार से देवप्रयाग तक मोटर बस जाती थी, लेकिन वह केवल गर्मी के दिनों में चलती थी, बरसात में नहीं। यात्रा के लिए केदारनाथ व बदरीनाथ तीर्थ के रास्ते में क्रमशः अगस्त्यमुनि व गौचर तक हवाई जहाज से आने-जाने का भी प्रबन्ध था, उससे आगे पैदल या किसी पहाड़ी सवारी से जाना पड़ता था। ब्रिटिश भारत के वायसराय लार्ड विलिंगडन (1931-36 ई0) के कार्यकाल के दौरान उनकी पत्नी हवाई जहाज से ही बदरीनाथ तीर्थयात्रा पर आई थी।

मोटर मार्गों के विकास के सम्बन्ध में श्री केदार सिंह फोनिया लिखते हैं कि उन्होंने अपने जीवन की पहली मोटर यात्रा सन् 1947 ई0 में की थी, जब वे हाईस्कूल की पढ़ाई करने पौड़ी जाते थे। तब वह पहली बार पौड़ी से आते समय लोक निर्माण विभाग के ट्रक में बैठकर रूद्रप्रयाग आये थे। पर्यावरणविद् श्री चण्ड़ीप्रसाद भट्ट कहते हैं कि प्राचीन तीर्थयात्रा में- ‘पदम्यां गच्छेत्र वै याने यदीच्छेद्धर्ममुन्तमम्’ अर्थात यदि श्रद्धालु तीर्थ का फल चाहता है तो पैदल ही चले क्योंकि जहाँ पैदल ही न चले वहाँ क्या तीर्थ। वे बताते हैं कि सन् 1916 ई0 में दुगड्डा-कोटद्वार व कीर्तिनगर मोटरमार्ग श्रमदान से बनाया जा रहा था। उस समय कोटद्वार की तुलना में ऋषिकेश वाले मोटरमार्ग से कम यात्री आते जाते थे, क्योंकि कीर्तिनगर का सड़क पुल का निर्माण बहुत बाद (1957-58 ई0) में पूर्ण हुआ था। सन् 1950 ई0 तक मोटरमार्ग कर्णप्रयाग तक तथा सन् 1952-53 ई0 तक चमोली, पीपलकोटी व सन् 1959 ई0 में बेलकुची बाजार (पीपलकोटी से आगे) लंगसी (एक स्थानीय गाँव) तक मोटर गाड़ी पहुँच गई थी।

उसके बाद सन् 1960 ई0 में पहली बार जोशीमठ बाजार तक रोड़वेज बस पहुँची। उन्होंने बताया कि वे उस समय जोशीमठ में ही सेवारत्त थे। वर्ष 1997 तक पूरे देश में 57 मोटर मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किये जा चुके थे, लेकिन उत्तराखण्ड जो उस समय तक उत्तरप्रदेश का अंग था, में एक भी मोटर मार्ग राजमार्ग में परिवर्तित नहीं हो पाया था। जब अक्टूबर 1997 में केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री श्री टी0 जी0 वैंकटरमन और उनके साथ लखनऊ से लोक निर्माण विभाग के मंत्री बदरीनाथ यात्रा पर आये तो उन्होंने ऋषिकेश-बदरीनाथ मोटर मार्ग को राजमार्ग घोषित करने की बात की थी, क्योंकि ऋषिकेश-बदरीनाथ मोटर मार्ग, गढ़वाल मण्डल के विकास के लिए रीढ़ की हड्डी समझी जाती है। तत्पश्चात यहाँ के क्षेत्रीय विधायक श्री केदार सिंह फोनिया ने दिनाँक 10 नवम्बर 1997 को श्री वैंकटरमन को एक पत्र भेजा। साथ ही जोशीमठ में कार्यरत्त डी0 जी0 बी0 आर0 के कमान्डर कर्नल वी0 एन0 टण्डन ने दिनाँक 17 दिसम्बर 1997 के अपने पत्र में इस मार्ग को राष्ट्रीय मार्ग घोषित करने की सिफारिश की थी। फलस्वरूप ऋषिकेश-बदरीनाथ सड़क मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग-58 घोषित किया गया, जो उत्तराखण्ड का पहला राष्ट्रीय राजमार्ग बना।

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