आने वाली पीढ़ी के लिए मैं क़िस्सागो बन जाऊँगा, वो सारे खत सुनाने के लिए….’डॉ० दीपक सिंह’

आने वाली पीढ़ी के लिए मैं क़िस्सागो बन जाऊँगा, वो सारे खत सुनाने के लिए….’डॉ० दीपक सिंह’
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          “नम्बर प्लेट से कुछ याद आया”????

एक सुकून भरी शाम बचाई है मैंने
अपने मसरूफ-ए-ज़िंदगी से…..
काटा इसे तो चमचमाता शहर आता है।
रुका यहीं तो मेरा बिछड़ा गाँव आता है।

जब कभी कोई बूढ़ी आँखें तुम्हारा इंतज़ार कर रही हो तो लौटकर उन आँखों से आँखें मिलाकर तो देखो…..

रात वाली रोटियाँ सुबह की चाय के साथ खाकर तो देखो………

मोबाइल के गेम्स छोड़कर एक बार चुपके से दोस्तों के संग गाँव में गुल्ली-डण्डा खेलकर तो देखो…….

होली में बड़ों के साथ बैठकर फगुआ गीत गाकर तो देखो……
गायों के साथ जाकर एक बार ग्वाल पूजा करके तो देखो……
बसंत में फूलदेई के गीतों को सुनकर तो देखो….
             तब अच्छा लगता है…….
सच कहूँ, तो गाँव सिर्फ गाँव नहीं है वो तो धरती-ए-जन्नत है, इसलिए वहाँ इक दफा रहकर तो देखो…

 

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