मधुर स्वर सम्राट गोस्वामी बाबू की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन्….😢😭🙏❤️डॉ० दीपक सिंह

मधुर स्वर सम्राट गोस्वामी बाबू की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन्….😢😭🙏❤️डॉ० दीपक सिंह
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मेरे लिए आप उत्तराखण्ड के मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के बीच की कड़ी हो..❤️❤️…..

          गोपाल बाबू के गुजरे हुए 26 साल बीत गए हैं पर पहाड़ का मर्म आज भी वही है। हम बचपन से सुनते आ रहे हैं– “घुघूती ना बासा…आमै की डाई मा घुघूती ना बासा”। बड़े-बड़े रैपर व मिसऐप गाने वाले आ गए पर पहाड़ के इस सीधे सरल गीत की बात ही कुछ और है। गोपाल बाबू के गीत युगों-युगों तक सुने जाऐंगे। मुझे लगता है कि पप्पू कार्की के बाद शायद ही कोई ऐसा होगा, जो कुमाऊँनी संस्कृति को पकड़ पाया हो। गोपाल बाबू व पप्पू कार्की को खोने के साथ ही साथ हम आज घुघूती और आमै की डाई भी खो चुके हैं।

     जीवन के किसी पड़ाव में हम डी०डी नेशनल पर शाम के समय कभी गोपाल बाबू का गाना- ‘हाई तेरी रुमाला गुलाबी मुखड़ी’ को सुना करते थे। आज उनकी पुण्यतिथि पर फिर यह गीत याद आ गया।

        ना जाने कहाँ खो गई वो सुरीली आवाज?? आखिर कहाँ गए वो सुर सम्राट?? बचपन में घर-गाँव में गोपाल बाबू का विदाई गीत- ‘न रो चेली न रो मेरी लाल, जा चेली जा सौरास’ बारातों में खूब बजता था, जब बेटी की विदाई के समय यह गाना बजाया जाता था, तो सभी के आँखों में आँसू आ जाते थे।

आज भी यह विदाई गीत हर एक उत्तराखण्डी के दिलों में बसता है। अतः विदाई के समय सबकी आँखों को नम कर देने वाला यह विरह गीत आज भी अमर है। मेरे पास इस गाने के लिए कुछ भी कहने के लिए शब्द नहीं है। हम तो इस गाने से सिर्फ प्रेरणा ही ले सकते हैं, जो जीवन भर लेते रहेंगे।

       इसलिए महान अमर लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी जी को उनकी पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन्। उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत हमें आज भी उनकी उपस्थिति का अहसास कराते हैं। जीवन के हर पहलु को छूते उनके गीतों की सूची लंबी है। 1976 में उनका पहला कैसेट एच. एम. वी ने बनाया था। गीत और नाटक प्रभाग की गायिका श्रीमती चंद्रा बिष्ट के साथ उन्होंने लगभग 15 कैसेट बनवाए। उनके मुख्य कुमाऊँनी गीतों के कैसेटों में – “हिमाला को ऊँचो डाना प्यारो मेरो गाँव”, “छोड़ दे मेरो हाथा में ब्रह्मचारी छों”, “भुर भुरु उज्याव हैगो”, “यो पेटा खातिर”,घुगुती न बासा”,आंखी तेरी काई-काई”, तथा “जा चेली जा सौरास”। इसके अलावा हर किसी को रुला देने वाला दुल्हन की विदाई का उनका मार्मिक गीत ‘न रो चेली न रो मेरी लाल, जा चेली जा सौरास’ और ‘उठ मेरी लाडू लुकुड़ा पैरीले, रेशमी घाघरी आंगड़ी लगै ले’ की आज भी जबरदस्त मांग है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक स्व. गोपाल गिरि गोस्वामी को लोग गोपाल बाबू के नाम से जानते हैं।

       उनका जन्म चौखुटिया बाजार से लगे ग्राम पंचायत चांदीखेत में 02 फरवरी 1942 को मोहन गिरि गोस्वामी के घर हुआ था। बचपन से ही गीतकार बनने के जुनून में उन्होंने 5वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया। वह 12 साल की उम्र से ही गीत लिखने और गाने लगे थे। जीवन के 54 सालों में उन्होंने साढ़े पांच सौ गीत लिखे। उनका पहला गीत ‘कैलै बजे मुरूली’ आकाशवाणी नजीबाबाद से प्रसारित हुआ था। 1972 में भारत सरकार के गीत और नाटक प्रभाग में नियुक्ति के बाद गोस्वामी को अपना हुनर दिखाने का अच्छा मंच मिल गया था। यहीं से उनके गीतों की संख्या और लोकप्रियता बढ़ती चली गई। सेवा के दौरान ही बीमारी के चलते 26 नवंबर 1996 को काल के क्रूर हाथों ने एक महान गीतकार को हमसे छीन लिया।


      भले ही अब वह इस दुनिया में नहीं हैं, परंतु लोकसंस्कृति, प्रकृति, नारी सौंदर्य और रीति-रिवाज ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र को छूने वाले उनके गीत हमें हमेशा उत्प्रेरित करते रहेंगे। गोपाल बाबु गोस्वामी के गीत आज भी हर युवा ने सुने और कहीं ना कहीं से जुबान पर निकल आते हैं। गोपाल बाबु गोस्वामी आज भी हमारे दिलो में जीवित हैं।

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2 thoughts on “मधुर स्वर सम्राट गोस्वामी बाबू की पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन्….😢😭🙏❤️डॉ० दीपक सिंह

  1. आदरणीय सर जी आपने महान एवं लोक गायक गोपाल बाबू के बारे में बहुत ही सुंदर वर्णन किया है और उनके द्वारा रचित एवं गाये गये करुणापूर्ण गीत जो हर किसी को रुला देगा काबिल ए तारीफ सर जी🙏🙏🙏

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