उत्तराखण्ड में शिल्पकार चेतना के अग्रदूत मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की 134वीं जयंती पर शत्-शत् नमन् – चारधाम समाचार

उत्तराखण्ड में शिल्पकार चेतना के अग्रदूत मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की 134वीं जयंती पर शत्-शत् नमन् – चारधाम समाचार
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उत्तराखण्ड में शिल्पकार चेतना के अग्रदूत मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की 134वीं जयंती पर शत्-शत् नमन्
प्रत्येक वर्ष 26 अगस्त को उत्तराखण्ड के दलित चिंतक और समाज सुधारक मुंशी हरिप्रसाद टम्टा जी की जयंती मनाई जाती है। हरि प्रसाद टम्टा द्वारा लिखित लेख के निम्नलिखित अंश 6 मई 1935 को अल्मोड़ा से प्रकाशित उत्तराखंड के शुरूआती अख़बारों में से एक ‘समता’ में प्रकाशित लेख से लिए गए हैं, लेकिन चारधाम समाचार के लिए यहाँ इन्हें मेरे द्वारा जीवन राम विश्वकर्मा द्वारा लिखित पुस्तक ‘उत्तराखण्ड में शिल्पकार चेतना के अग्रदूत मुंशी हरिप्रसाद टम्टा’ से लिया गया है।
जिसमें हरिप्रसाद टम्टा जी के शब्द इस प्रकार से लिखें हैं कि
25 साल का लम्बा अर्सा गुजर जाने पर भी मैं अभी तक का एक वाक्य नहीं भूल पाया कि जब वर्ष 1911 में जार्ज पचंम का राज-तिलक हुआ था और हिन्दुस्तान भर में खुशियां मनाई जा रही थी और इसके लिए अल्मोड़ा में भी दरबार लगा हुआ, लेकिन अब की तरह मुझे और मेरे भाइयों को उस अल्मोड़ा दरबार में हिस्सा लेने का हक हासिल न हुआ। मुझे अब भी याद है कि कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह डाला कि अगर हरिप्रसाद सरीखे दरबार में शामिल हुआ तो उसका बलवा होने का अंदेशा है। मैं अपने उन भाइयों की ऐसी बात के लिए लाख-लाख शुक्र-गुजार हूँ, जिन्होंने मुझे और मेरे भाइयों को सोने से जगाया। इन्हीं बातों की बदौलत तो मेरे दिल में इस बात की लौ लगी है कि मैं भाईयो को दुनिया की नजरों में इतना उठा दूं कि लोग उन्हें हिकारत की निगाह से नहीं बल्कि मुहब्बत और बराबरी की नजरों से देखें।


हरिप्रसाद टम्टा समता अखबार में लिखते हैं कि उनके लिये मेरे दिल में रत्ती भर भी शिकवा या शिकायत की गुंजाइश नहीं, बल्कि मैं उनका ता-उम्र एहसानमन्द रहूँगा, क्योंकि उन्हीं की वजह से मेरे दिल में अपनी कौम की बेहतरी के जज्बात पैदा हुए थे। हरिप्रसाद जी अपने मामा की प्रेरणा से वे 1903 से उत्तराखण्ड की अछूत जातियों के उद्धार में लग गए और 26 फरवरी 1960 में अपने देहांत तक इस मिशन में डटे रहे। उत्तराखण्ड के अछूतों में सामाजिक चेतना जाग्रत करने के मकसद से उन्होंने 1905 में “टम्टा सुधारक सभा” की स्थापना की, जो आगे चलकर 1914 से ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के नाम से जानी गयी। इस सभा ने दलितों के उत्थान के लिए कई आन्दोलन किये। इसी सभा के बैनर तले अवांछित व अपमानजनक शब्दों से उत्तराखण्ड के दलितों को संबोधित किये जाने के खिलाफ भी एक व्यापक आन्दोलन की शुरुआत 1920 से की गयी। ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के 6 सालों के आन्दोलन के बाद शासन-प्रशासन ने उत्तराखण्ड के अछूतों को ‘शिल्पकार’ नाम से संबोधित किया जाना स्वीकार किया था।हरिप्रसाद टम्टा ने उत्तराखण्ड के अछूतों के बीच शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किये। उन्होंने अल्मोड़ा में कई रात्रिकालीन स्कूल खुलवाने के अलावा गरीब छात्रों को वजीफा भी दिया। शिक्षा के लिए उनके कार्यों को ‘लीडर’ व अन्य राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया। 01 जून 1934 को ‘समता’ अखबार के प्रकाशन की शुरुआत के साथ ही वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अछूतों का प्रतिनिधित्व करने में जुट गए। 26 सालों तक समता का संचालन करने के साथ-साथ वे लीडर, हिंदी हरिजन, भारती, कमल, अधिकार जैसे कई राष्ट्रीय अख़बारों में भी दलितों की समस्याओं को उठाते रहे। उत्तराखण्ड में सार्वजनिक परिवहन की शुरुआत करने वाले प्रमुख उद्यमियों में भी हरिप्रसाद टम्टा का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने 1920 में ‘हिल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना की. इसके साथ ही वहां चालकों के लिए कुमाऊँ का पहला प्रशिक्षण केंद्र भी हल्द्वानी में शुरू किया। कुमाऊँ में मोटर वाहन का चक्का घुमाने वाले शुरुआती व्यक्तियों में हरिप्रसाद टम्टा एक थे। यही नहीं हरिप्रसाद टम्टा ने 1907 और 1935 के युद्ध के बाद अकालग्रस्त भारत में पूरे कुमाऊँ में सस्ते राशन की दुकानें खुलवायीं। युद्ध के बाद जब इन्फ्लुएंजा का प्रकोप बढ़ा तो हरिप्रसाद टम्टा ने हजारों स्वयंसेवकों की सेना तैयार कर गांव-गांव दवाएं बंटवाई। इस तरह के कई अन्य सामाजिक कामों में भागीदारी करते हुए उन्होंने कभी भी धन व्यय की चिंता नहीं की। सार्वजनिक जीवन में हरिप्रसाद टम्टा की लोकप्रियता ने उन्हें 3 बार म्युनिसिपलिटी के मेंबर-अध्यक्ष और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अल्मोड़ा का वाइस चेयरमैन बनाया।
इस प्रकार उत्तराखण्ड के अछूत शिल्पकारों के सामाजिक उद्धार में हरिप्रसाद टम्टा का अतुलनीय योगदान है। इन्हीं घटनाओं ने हरिप्रसाद टम्टा को शिल्पकार अस्मिता का योद्धा बनाया।

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