हिंदी हमारी आत्मा की भाषा जो अक्सर कहती है हमसे, कभी कभी लगता है कि उपेक्षित हूँ मैं अपने ही घर में – डॉ. दीपक सिंह

हिंदी हमारी आत्मा की भाषा जो अक्सर कहती है हमसे, कभी कभी लगता है कि उपेक्षित हूँ मैं अपने ही घर में – डॉ. दीपक सिंह
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आप सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक
शुभकामनाएँ

हिंदी दिवस के मौके पर सभी भाषाओं को समान सम्मान मिलना चाहिए, क्योंकि हर भाषा वंदनीय है। किसी भी भाषा को थोपा नहीं जा सकता है और नहीं किसी भाषा का विरोध किया जाना चाहिए। हम उस भाषा के हमेशा क़र्ज़दार रहते हैं, जो माँ के दूध के साथ हमें मिलती है और हमें गढ़ती है। हम कहीं भी रहें और कुछ भी बन जाएँ, लेकिन हमें अपनी मातृभाषा से नहीं कटना चाहिए और नहीं उसे बोलने में कभी शर्म महसूस करनी चाहिए। याद रहे कि एक भाषा का मिटना उसे बोलने वाली क़ौम का मिटना है। कोई भाषा उस दिन से धीरे-धीरे मरने लग जाती है, जब उस भाषा को जानने वाले दो लोग आपस में सामान्य बातचीत के लिए भी किसी अन्य भाषा को संवाद की भाषा बनाते हैं। भाषा अपने आप को व्यक्त करने का एक माध्यम भर है, जिस दिन आप भाषा से डरने लग जाएंगे, भाषा आप से दूर होने लग जाएगी।

इसलिए यह बेहद जरूरी है कि आप भाषा से प्रेम करें, जितना ज़्यादा आप एक भाषा को अपनाएंगे उतना ज़्यादा आप खुलकर बेझिझक अपनी बात बेहतर तरीके से रख पाएंगे। अपभ्रंश या यूँ कह लो कि टूटी-फूटी कोशिशों में भी एक अलग खूबसूरती छुपी होती है। अगर आप लिखने के शौक़ीन हैं तो बस लिखिए। भाषा अपने आप आपका साथ निभाएगी। हमारी हिंदी भाषा ऊँच-नीच को नहीं मानती है। इसमें कोई भी कैपिटल या स्माल लैटर नहीं होता। सब बराबर होते हैं। साथ ही आधे अक्षर को सहारा देने के लिए पूरा अक्षर हमेशा तैयार रहता है। आइए हम भी जीवन में बराबरी को महत्व दें और जब भी किसी को सहारे की जरूरत हो तो उसका सहारा बनें।
विनोबा भावे लिखते हैं कि- “हिंदी को गंगा नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा।”
हिंदी भाषा के अपने कुछ वाक्यांश—
मैं हिंदी हूँ, जिस हिंदी को भारतवर्ष की तमाम भाषाओं में अग्रज की भूमिका दी गई है और अपेक्षा की गई है कि मैं अपने समस्त भाई-बहिनों का ध्यान रखूंगी और मानवतावादी सोच के साथ सभी को सम्मान के साथ जीवन यापन और अपने चाहने वालों को विकास के मार्ग पर अग्रसर करती रहूँगी। इसके लिए मुझे राष्ट्रभाषा का पद भी दिया गया है। इसीलिए कहा जाता है कि राष्ट्रभाषा और क्षेत्रीय भाषाएँ एक-दूसरे की पूरक है विरोधी नहीं।

कुछ पंक्ति हिंदी भाषा के संदर्भ में—
हिंदी, हमारी आत्मा की भाषा
जो अक्सर कहती है हमसे……
कभी कभी लगता है कि
उपेक्षित हूँ मैं
अपने ही घर में
मेहमान सी हूँ मैं
यूँ तो देश की शान हूँ
पर कितनी ही बार शर्मसार हूँ मैं
तुम मुझे जानते हो, बोलते हो…
पर मुझे किसी तीसरी ही भाषा के
माध्यम से समझते हो
वाकई स्तब्ध हूँ मैं
गर्व है तुम्हारे इस हिंदी प्रेम से
जो अंग्रेजी में सहज समझा जाता है
अभिभूत हूँ मैं
खैर,जाने दो
कम से कम आज तो सिरमौर हूँ मैं

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