संगीत प्रेमियों के लिए कम समय में प्रसिद्ध हुआ ‘गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियो देहरादून – डॉ दीपक सिंह कुंवर

संगीत प्रेमियों के लिए कम समय में प्रसिद्ध हुआ ‘गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियो देहरादून – डॉ दीपक सिंह कुंवर
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संगीत प्रेमियों के लिए कम समय में प्रसिद्ध हुआ ‘गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियो देहरादून

उत्तराखण्ड़ की संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतनी ही मनमोहक व लोकप्रिय यहाँ के लोकनृत्य व लोकगीत भी। कालान्तर में इन्हीं लोकगीत व लोकनृत्य के संरक्षण व संवर्द्धन में लगा है गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों देहरादून, जिस गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों का संचालन विजय पंत और ज्योति प्रकाश दोनों भाई मिलकर कर रहे हैं, जो रूद्रप्रयाग जनपद के जखोली ब्लॉक के आठोला गांव के मूल निवासी हैं। पंत भाईयों का रूद्रप्रयाग जनपद के आठोला गांव से गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों देहरादून का सफर आसान नहीं था, लेकिन कहते हैं कि जब कोई लगातार आसमान की तरफ देखता है, तो एक दिन उसे पंख जरूर लग जाते हैं।

विजय पंत व ज्योति प्रकाश पंत दोनों भाईयों को बचपन से ही लोकगीत व लोकनृत्य से अथाह प्रेम रहा है, जिसमें छोटे भाई ज्योति प्रकाश पंत लोकगीत व बडे भाई विजय पंत लोकनृत्य मेें माहिर थे। पंत परिवार में हमेशा से ही संगीत का माहौल रहा है, क्योंकि इनके पिता श्री जगतराम पंत जी स्वयं में संगीत प्रेमी रहे हैं। इनके पिता श्री जगतराम पंत जी की अपने क्षेत्र में होने वाले कार्यक्रमों में जैसे रामलीला, कल्चर प्रोग्राम में हमेशा से अहम भूमिका होती थी। यहां तक कि उनके पिता को दूर-दूर से कल्चर प्रोग्रामों के लिए भी बुलाया जाता था। अतः विजय पंत व ज्योति प्रकाश पंत को संगीत की प्रेरणा विरासत में उनके पिता से मिली है। एक साक्षात्कार में पंत दिदा ने स्वयं बताया है कि उन्हें संगीत की प्रेरणा उनके पिता व समय के साथ समाज में निस्वार्थ भाव से अपनी संस्कृति के लिए काम करने वाले लोगों से मिली है, लेकिन दोनों भाईयों में ये कलाएं स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के दौरान तेजी से उभरने लगी थी, क्योंकि स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में दोनों भाई खूब शिरकत करते थे। इस तरह दोनों भाईयों के जीवन में संगीत का ये सिलसिला यूहीं चलता रहा और तत्पश्चात दोनों भाईयों ने मिलकर मंचों पर होने वाले जागरणों में गाना शुरू किया, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण एक दौर पंत भाइयों की ये कलाएं धीरे-धीरे दम तोडने लग गई थी, क्योंकि उम्र के पड़ाव में इन कार्यक्रमों से जिन्दगी नहीं चलने वाली थी। ये बात दोनों भाई भी बखूबी से समझ रहे थे। फिर दोनों भाईयों ने सोचा कि पहले कुछ काम कर पैसा कमाया जाय। फिर सोचा जायेगा लोकगीत व लोकनृत्य के बारे में, लेकिन दोनों भाईयों के अन्दर बचपन की वे कलाएं कहीं न कहीं हमेशा सषुुप्त अवस्था में रही। बस इन्तजार था तो उस दिन का, जिस दिन वे फिर से अपनी कलाओं को एक नया आयाम दे पाएं।

विजय पंत जी ने वर्ष 2012-13 में स्टेज प्रोग्रामों में गढ़वाली लोकगीतों को गाना आरम्भ कर दिया था, जिसके फलस्वरूप विजय पंत जी ने वर्ष 2015-2016 में ‘पंत दिदा’ के नाम से अपना पहला गाना रिलीज किया। तत्पश्चात विजय पंत अपने चहितों में ‘पंत दिदा’ के नाम से प्रसिद्व हो गये। अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए दोनों भाईयों ने यात्राकाल के दौरान केदारनाथ धाम में 5-6 वर्षों तक व्यवसाय कर कुछ पैसा कमाएं, लेकिन वर्ष 2020-21 में कोरोना काल में बदरी-केदार तीर्थयात्रा बन्द होने के कारण आखिर वह दौर आ ही गया, जिसका दोनों भाई को वर्षों से इंतजार था।

अतः 14 फरवरी 2021 को एक बार फिर दोनों भाईयों की जिन्दगी ने करवट बदल दी और जीवन की इस धक्का-मुक्की के बाद दोनों भाईयों ने मिलकर देहरादून के दीपनगर में गीत गंगा रिकोर्डिंग स्टूडियों का शुभारम्भ किया, जिस गीत गंगा स्टूडियों के म्युजिक डारयेक्टर/संगीतकार बने छोटे भाई ज्योति प्रकाश, जबकि बडे भाई विजय पंत गढ़वाली-कुमाऊँनी व जौनसारी लोकगीतों को लिखते व गाते रहे है। गीत गंगा रिकोर्डिंग स्टूडियों ने अब तक इतने कम समय में (14 फरवरी 2021 से सितम्बर 2021 तक) लगभग 1000 से ऊपर गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी लोकगीतों को संगीत दे चुका है।

पंत भाईयों के गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों ने गढ़वाल-कुमाऊं व जौनसार क्षेत्र के हुनरमन्दों लोकगायकों को भी प्लेटफॉर्म देने का काम किया है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर लोकगायकों के गानों को ज्योति प्रकाश पंत संगीत देने/रिकोर्ड करने में भी सहायता कर रहे हैं। इसके अलावा पंत भाईयों ने कालान्तर में 10-15 लोगों को अपने साथ गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों में रोजगार भी दिया है। इस प्रकार कालान्तर में गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों अपनी संस्कृति व उत्तराखण्डवासियों के लिए लगातार काम कर रही है। गीत गंगा रिकॉर्डिंग स्टूडियों के संगीतकार ज्योति प्रकाश अपनी परम्पराओं व संस्कृति पर आधारित अनके लोकगीतों को संगीत दे चुके हैं, जिनमें से कुछ प्रसिद्व लोकगीत–

रीता सयाणी बैठी रे तू आम डाई का छैल मा (गायककार-विजय पंत)
दो पल सुन अर्पिता (गायककार-विजय पंत)
बामणी( गायककार-विजय पंत मीना राणा)

जितुली (गायककार- दर्शन फर्स्वाण व विवेक नौटियाल)
तेरा हाथों मा मेहन्दी (गायककार-अमन नेगी सूरी)
हैलो कौन (गायककार-विजय पंत)
गंगाड़ी बौजी (गायककार-देवराज आगरी, अनीशा रांगड)
प्यारी पहाड़न (गायककार-मीना पंवार)
रौसा भग्यानी (गायककार-नितेश भण्ड़ारी)
झांझरी (गायककार- संजय भण्डारी, अनीशा रांगड)
तक धुणा धुण (गायककार- दीपक चमोली)
चन्दना (गायककार-ममता पंवार)
डौंरी घूरा घूर (गायककार- दीपक चमोली)

बबली तेरो मोबाईल-2 (गायककार-गजेंद्र राणा

विजय पंत जी, जो कि गांव के सामाजिक कार्यक्रमों के साथ-साथ अपनी गढ़वाली बोली व संस्कृति के लिए हमेशा से प्रयासरत रहे हैं। वे अपने को देवभूमि के सिपाही के रूप में देखते हैैैं। वे कहते हैं कि मैं बड़े सरल शब्दों में लिखा हुआ एक जज्बा हूँ, जो हर हाल में गुजर बसर करना जानता हूँ और सिर्फ गुजर बसर ही नहीं बल्कि जिन्दगी की आंखों में आंखें मिलाकर जूझना जानता हूँ व जीना जानता हूँ। आगे कहते हैं कि मैंने हमेशा परेशानियों से हारना नहीं बल्कि हराना सीखा है। विरले (अपवाद) ही होंगे इस दुनिया में, जिन्हें जीने के लिए मरना नहीं पड़ा होगा वरना जिन्दगी ने किसी को नहीं बख्शा। जीवन में सबके अपने-अपने चैलेंजस हैं किसी के थोड़े कम तो किसी के थोड़े ज्यादा, पर दुःख/लडाईयां सबके हिस्से में आई हैं। अतः हमनें जिन्दगी में संघर्षों/दुःखों को हमेशा से स्वीकारा है।


ज्योति प्रकाश जी एक उदाहरण के माध्यम से अपने जीवन के संघर्षों को स्वीकारते हुए कहते हैं कि अधिकतर लोग जिन्दगी में आने वाली तकलीफों और संघर्षों की शिकायत करते रहते हैं, लेकिन वे लोग भूल जाते हैं कि जीवन एक संघर्ष है। बिना संघर्ष के जीवन अधुरा होता है, बिल्कुल वैसा ही जैसे बिना नमक के खाना। नमक का अकेले स्वाद लोगों को पसंद नहीं आता, लेकिन खाने में नमक मिला देने से खाना स्वादिष्ट हो जाता है और उस खाने को लोग बडे चाव से खाते हैं। उसी प्रकार यदि जिन्दगी में संघर्षों का स्वाद मिला हो तो वो जिन्दगी सबको खूब भा जाती है। आगे बताते हैं कि संस्कृति मानव की जीवन शक्ति, राष्ट्रीय आदर्श की गौरवमयी मर्यादा और स्वतन्त्रता की वास्तविक प्रतिष्ठा है। इस तथ्य का चिन्तन करते हुए गढ़वाली, कुमाऊँनी व जौनसारी परम्परा के लोगों ने सदा से ही संस्कृति-निष्ठा के मंगलमय मार्ग को अपनाया है। अतः हमें भी अपनी संस्कृति के लिए निरन्तर प्रयासरत रहना चाहिए, जिससे हमारी पौराणिक परम्परा व संस्कृति पल्लिवित व पुष्पित होती रहे।

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