गढ़वाली फिल्म ‘बोल दियां ऊंमा’ हुई टोरंटो फेस्टिवल में शॉर्टलिस्ट – डॉ.दीपक सिंह

गढ़वाली फिल्म ‘बोल दियां ऊंमा’ हुई टोरंटो फेस्टिवल में शॉर्टलिस्ट – डॉ.दीपक सिंह
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गढ़वाली फिल्म ‘बोल दियां ऊंमा’ हुई टोरंटो फेस्टिवल में शॉर्टलिस्ट

साहित्यकार बल्लभ डोभाल की कहानी पर बनी गढ़वाली शॉर्ट फिल्म ‘बोल दियां ऊमां’ को चौथे टोरंटो मल्टीकल्चरल फिल्म फेस्टिवल में शॉर्टलिस्ट किया गया है। पलायन और गांव की महिलाओं की पीड़ा पर बनी ये शानदार फिल्म आपको भीतर तक झकझोर कर रख देगी। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की गाइडेंस में तैयार इस फिल्म का डायरेक्शन नेगी दा के पुत्र कविलास नेगी जी द्वारा किया गया है, जबकि फिल्म के प्रोड्यूसर का काम अतुलान दास गुप्ता ने किया है। इस फ़िल्म में ड्रोन से फिल्माएं गए खूबसूरत दृश्य का श्रेय गोविंद नेगी जी को जाता है, जबकि इस फ़िल्म की वास्तविक स्टोरी/स्क्रिप्ट का श्रेय बल्लभ डोभाल को जाता है, क्योंकि यह फ़िल्म डोभाल की कहानी पर आधारित पहाड़ी महिलाओं के दर्द से सम्बंधित है। इस फ़िल्म में नेगी दा की पुत्रवधु अंजलि नेगी के साथ राजेश नौगांई ने अहम भूमिका निभाई है। यह फिल्म 11 अगस्त 2021 को ‘नरेंद्र सिंह नेगी ऑफिशियल’ यू-ट्यूब चैनल से रिलीज की गई थी।इस फ़िल्म के जरिये परदेस में रहने वाले पति से दूर पहाड़ में अकेले जीवन बिता रही महिलाओं की वेदना का चित्रण बेहद संजीदगी से किया गया है। अंजलि नेगी और राजेश नौगांई के अभिनय वाली यह फिल्म प्रवासी उत्तराखंडियों और पलायन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाती है।

इस फ़िल्म में एक जगह फिल्म का नायक बद्री कहता है कि आज मेरी छुट्टी का आखिरी दिन है और आखिरी बस भी छूटने वाली है। कहता है कि गांव वालों के पास कितना कुछ है दिल्ली में रह रहे अपनों को देने के लिए, लेकिन इनके परिवार वाले सालों तक दिल्ली में रहकर भी इनके लिए कुछ नहीं भेज पाते हैं, क्योंकि गांव वाले परदेस रहने वाले रिश्तेदारों के लिए नायक बद्री के पास कुछ न कुछ समौण देते हैं, जब फ़िल्म का मुख्य पात्र ‘बद्री’ शहर के लिए आखिरी बस पकड़ने के लिए दौड़ रहा होता है। तब गांव की ही कमला भाभी परदेस में रह रहे अपने पति को रैबार देने के लिए उस नायक बद्री के साथ बस स्टॉप तक आती है। रास्ते में दोनों पात्रों के बीच हुई बातचीत इस कहानी/फ़िल्म का अहम बिंदु है। कमला की स्थिति इतनी दयनीय है कि कमला के पैरों में टूटी चप्पलें हैं, जिन चप्पलों में कमला धागा बांधकर काम चला रही है।

अतः कमला के मन में पति की बेरूखी को लेकर तमाम शिकायतें हैं। फ़िल्म में एक भावुक क्षण तब आता है जब कमला नायक बद्री से कहती है कि ‘उन्हें कह देना कि मैं इंतजार कर लूंगी, लेकिन उम्र तो इंतजार नहीं करती। अगर वो इस साल भी नहीं आए तो मैं यमुना में कूद जाऊंगी’। अतः कमला अपने पति के परदेश से न लौटने पर दुःखी है। कमला अपने पति पर परिवार को भुलाने और गांव न लौटने पर बहुत से ताने भी मारती है, लेकिन बस स्टॉप पर पहुंचने पर उसे लगता है कि अगर बद्री ने उनकी व्यथा पति को बता दी तो उन्हें दुःख होगा। इसलिए बस में बैठ रहे नायक बद्री से कहती है कि उसने जो भी कुछ कहने को कहा है उनसे (पति से) मत बोलना। इस प्रकार पहाड़ के जीवन पर आधारित फिल्म ‘बोल दियां ऊंमा’ करुणा और वियोग श्रृंगार से ओत-प्रोत है। यह फ़िल्म बड़ी सजीवता के साथ एक संदेश हमारे बीच छोड़ आती है कि पहाड़ के युवावर्ग रोजगार की तलाश में घर-बार छोड़कर शहरों की ओर चले जाते हैं, जिस रोजगार के कारण वे अपने घर-गाँव, बच्चे व परिवार से हमेशा दूर रह जाते हैं। इस रोजगार के कारण न जाने हम किस सुख के पीछे भाग रहे हैं, जिस सुख को पाने के लिए पूरी जिंदगी युहीं गुजर जाती है। हम बच्चों के साथ उनका बचपन नहीं जी पाते, जीवनसाथी के संग शांति के दो पल नहीं बिता पाते हैं। इस प्रकार गढ़वाली शॉर्ट फिल्म ‘बोल दियां ऊंमा’ ने हर एक पहाड़ी से उठाए सवाल कि रोजगार-पैसा जरूरी है, लेकिन किस कीमत तक???

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