पूर्वांचल का एकमात्र दृष्टिबाधित विद्यालय का अस्तित्व खतरे में – चारधाम समाचार

पूर्वांचल का एकमात्र दृष्टिबाधित विद्यालय का अस्तित्व खतरे में – चारधाम समाचार
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डॉ0 दीपक सिंह

पूर्वांचल का एकमात्र दृष्टिबाधित विद्यालय का अस्तित्व खतरे में

इक्कीसवीं सदी विमर्शों की सदी है, हाशिए पर रह रहे लोग अपनी अस्मितागत पहचान के लिए लड़ रहे हैं। हाशिए के समाज में ‘विकलांग वर्ग’ हाशिए में भी हाशिए पर है। विकलांगों का हाशिए पर रहने का एक बड़ा कारण उनका ‘वोट बैंक’ न होना है। वोट बैंक न होने के कारण न तो सत्ता में मौजूद पार्टियाँ इनके दरवाज़े पर कदम रखती हैं और न ही विपक्ष में मौजूद पार्टियाँ इनकी कोई सुध-बुध लेती है। वाराणसी के दुर्गाकुंड में स्थित श्री हनुमान प्रसाद पोद्दर अंध विद्यालय पर वाराणसी के बड़े व्यापारियों की नज़रें गड़ चुकी है। दुर्गाकुण्ड मन्दिर के ठीक सामने स्थित इस विद्यालय की स्थापना वर्ष 1972 में स्वतंत्रता सेनानी, परोपकारी व लेखक हनुमान प्रसाद पोद्दार की स्मृति में की गई थी। वह हिंदू धार्मिक ग्रंथों के दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशक गीता प्रेस के निदेशक भी थे। नेत्रहीनों के लिए यह स्कूल शुरू में केवल पांचवीं कक्षा तक था। यह 1984 में एक जूनियर हाई स्कूल और 1990 में एक हाई स्कूल बन गया। 1993 में यह एक इंटरमीडिएट स्कूल बन गया। हनुमान प्रसाद पोद्दार मेमोरियल ट्रस्ट, जो स्कूल चलाता है, 18 ट्रस्टियों से बना है। इसके अध्यक्ष वाराणसी, बनारस के जाने-माने व्यवसायी कृष्ण कुमार जालान हैं। एक को छोड़कर सभी ट्रस्टी, जो स्कूल के प्रिंसिपल हैं, व्यवसायी हैं। यह स्कूल पूरे पूर्वांचल में एकमात्र अन्ध विद्यालय है, जिसमें 250 से अधिक दृष्टिबाधित बच्चे पढ़ते थे, लेकिन विद्यालय के जमीन और सम्पत्ति पर ‘जालान्स कपड़ा व्यापारी’ की नजर गड़ गयी। अब विद्यालय को धीरे-धीरे बन्द किया जा रहा है। वर्तमान सत्र में केवल 8वीं तक प्रवेश हो रहा है। ताकि विद्यालय के बेशकीमती जमीन को हड़पकर जालान्स अपना स्टोर खोल सके। विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे पिछले एक महीने से बारिश और धूप में बैठे हुए हैं, लेकिन शासन-प्रशासन पर कोई भी फर्क नहीं पड़ रहा है। विकलांगों को हमारे समाज ने अपमानजनक नामों से पुकारने के अलावा कुछ ख़ास किया नहीं है। देश आज़ाद होने के 48 वर्षों बाद हमारी सरकारों को याद आता है कि इस देश में विकलांग भी रहते हैं।

आज़ाद होने के 48 वर्षों बाद जाकर ‘विकलांगता अधिनियम’ पारित होता है। याद कीजिए और बताइए आपने कोई ऐसा आंदोलन देखा हो, जो विकलांगों को उनका हक़ दिलवाने के लिए किया गया हो। हमने इतना साहित्य पढ़ा कहानियों और उपन्यासों में विकलांग पात्र जगह जगह हैं लेकिन क्या हमने कभी उनकी समस्याओं पर ध्यान दिया? विकलांग विमर्श पर शोध करते समय मैंने जाना कि सिर्फ़ ‘शिक्षा’ ही वह हथियार है, जिसके चलते ये विकलांग अपना हक़ प्राप्त कर सकते हैं। विकलांग जब तक अपने अनुभव नहीं लिखेंगे अपने साथ हो रहे भेदभाव पर मुखर नहीं होंगे तब तक हम उनकी समस्याओं से भी अवगत नहीं हो पाएँगे उनके लिए काम करना तो बहुत दूर की बात है।
संत कबीर नगर जिले के राजपुर सरैया के 25 वर्षीय पूर्व छात्र शशि भूषण पांडे ने कहा कि कक्षा 9 से 12 के बंद होने के कारण शुल्क तेजी से बढ़ रहे हैं। “स्कूल को सरकार से नियमित रूप से पर्याप्त और अधिक पैसा मिलता है। लेकिन ट्रस्टी स्कूल को बंद करना चाहते हैं और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए परिसर का उपयोग करना चाहते हैं।” संस्थान चलाने वाले ट्रस्टी दावा कर रहे हैं कि उन्हें सरकार से स्कूल चलाने के लिए पर्याप्त मदद नहीं मिल रही है. उनका दावा है कि पहले 75 फीसदी अनुदान सरकार से मिलता था। वर्ष 2018-19 में यह घटकर 50% हो गया और 2019-20 में पैसा नहीं था।


ऐसे में पिछले साल स्कूल ने छात्रों को लिखे पत्र में कहा कि आप सभी को सूचित किया जा रहा है कि स्कूल कार्यकारिणी समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि आर्थिक तंगी को देखते हुए विद्यालय का संचालन स्कूल की कुछ कक्षाएं पूरी तरह से बंद रहेंगी। इसके बाद से स्कूल के छात्र धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इसका कारण आर्थिक तंगी बताया गया। पिछले साल 17 जून को स्कूल प्रशासन की कार्यकारिणी की बैठक में नौवीं से बारहवीं कक्षा में दाखिले रोकने का फैसला लिया गया था। तब से, स्कूल के 250 छात्र विरोध कर रहे हैं।इसलिए आप सभी से विनम्र निवेदन है कि दृष्टिबाधित बच्चों के इस विद्यालय को बचाने में आप सभी सहयोग करें और अगर आप वाराणसी में हैं तो समय निकालकर धरना स्थल पर जाइये। आपकी आवाज ही इन विद्यार्थियों की आवाज है।

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