रामपुर तिराहा काण्ड (मुजफ्फरनगर हत्याकांड) की 27वीं बरसी पर शहादतोें को भावभीनी श्रंद्धाजलि – डॉ. दीपक सिंह कुंवर

रामपुर तिराहा काण्ड (मुजफ्फरनगर हत्याकांड) की 27वीं बरसी पर शहादतोें को भावभीनी श्रंद्धाजलि – डॉ. दीपक सिंह कुंवर
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रामपुर तिराहा काण्ड (मुजफ्फरनगर हत्याकांड) की 27वीं बरसी पर शहादतोें को भावभीनी श्रंद्धाजलि

वक्त और हालातों के आगे बेवस इंसान जब जुल्म की जंजीरों से आजाद होने की कोशिश करता है तो अक्सर जालिम हुक्ममरान अपने हुक्म से उन्हें गुलाम बनाने की जेद्दोजेहद में जुट जाते हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि वक्त का मरहम जख्मों को भर देता है, लेकिन कुछ जख्मों के घाव ऐसे होते हैं, जिनका दर्द जिन्दगी भर महसूस होता रहता है। वो दर्द इंसानों के जज्बातों को बार-बार बाहर ले आता है और जिन्हें चाहकर भी हम उसे भर नहीं पाते हैं।
कुछ ऐसा ही जख्म है उत्तराखण्डवासियों के दिलों में रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड का। वक्त गुजरते-गुजरते दो दशक के पार हो चला आया है, लेकिन हर बार जब भी दो अक्टूबर आता है तो उत्तराखण्ड में लोगों के आंसू भी उस काली रात को सोचकर निकल आते हैं, जो जुल्म एक व दो अक्टूबर 1994 की रात के दरमियान उत्तर प्रदेश सरकार की पुलिस ने बेकसूर निहत्थे लोगों पर ढाया था। एक ऐसा वाक्या जिसकी बानगी आजाद भारत में तो देखने को नहीं मिल सकती थी, हां भले ही अंगेजों की गुलामी के दौरान ऐसे हालातों से गुजरा व देखा जा सकता था।


वर्ष 1994 के साल लोग अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग के लिए दिल्ली जा रहे थे। किसी तरह की हिंसा नहीं थी और नहीं शोर-शराबा था। सब कुछ कानून के मुताबिक चल रहा था, क्योंकि हमारा संविधान भी हमें इस बात की इजाजत देता है कि लोकतंत्र में हम अपनी बातें सरकार की कानों तक पहुंचाने के लिए ऐसा कर सकते हैं, लेकिन जालिम हो चुकी थी उत्तर प्रदेश पुलिस व उनके आका। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर लोगों को रोककर उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया जा रहा था। लोग एक ही बात कह रहे थे कि उन्हें अपना उत्तराखण्ड अलग चाहिए, क्योंकि लखनऊ में बैठकर पहाड़ों के विकास की रूपरेखा तैयार करने वाले नेताओं को ये पता नहीं होता था कि आखिर लोग पहाड में किन के कारणों से दुःखी हैं।

वर्ष 1994 में हुए अत्याचारों को लब्जों में बयां नहीं किया जा सकता है, जिस गोलीकाण्ड के बहुत से लोग आज भी चश्मदीद गवाह हैं। मुज्जफरपुर गोली काण्ड की रिपोर्टिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय कुमार शर्मा बताते हैं कि वह मंजर याद कर उनकी रूह कांप जाती है। विजय कुमार शर्मा रामपुर तिराहे गोलीकाण्ड के सी0 बी0 आई0 गवाह भी थे। विजय जी कहते हैं कि उस काली रात के बाद जब हल्का सेबेरा हुआ और रात को कत्लेआम के बाद शहीद हुए शवों को जब पुलिस विभाग ने उठाना शुरू किया तो शव के खून से जमीन पर पूरे निशान बन चुके थे। यही नहीं आस-पास स्थित पेड़ के पत्ते भी गोली से छलनी हो चुके थे, जो इस बात की गवाही दे रहे थे कि एक व दो अक्टूबर के दरमियान उ0 प्र0 पुलिस जालिम बन गई थी और उन्होंने बेगुनाहों पर बहुत जुल्म उठाया था, जिस कारण से पुलिस फायरिंग में 15 आन्दोलनकारी शहीद हो गए थे। ‘तस्वीर सब कुछ बयां करती है’ इस वाक्यांश का अर्थ उस दिन की तस्वीर बता रही थी।

वर्ष 1994 में हुए इस गोलीकाण्ड ने पूरे देश में खलबली मचा दी थी। रामपुर तिराहे के पास स्थित बागवाली गांव में रहने वाले मुर्सालिन बताते हैं कि उस सायं को मैं गन्ने के खेत में पानी डालने गया था, जहां खेत में पानी भरते भरते रात हो गई थी तभी वहां गोली की आवाज आने लगे। बहुत से लोग इस घटना में भागकर रात को गन्ने के खेतों में छुप गए थे। नवम्बर 2000 ई0 को तत्कालीन उ0 प्र0 के मुख्यमंत्री श्री राजनाथ सिंह द्वारा मुजफफरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनन्त कुमार सिंह पर सी0बी0आई0 द्वारा मुकदमा (सीआरपीसी-धारा 197) चलाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। 1994 से लेकर आज तक दिल्ली जा रहे आन्दोलनकारियों पर किसने गोलियां चलवाई? क्यों गोलियां चलवाने का आदेश दिया? इसका उत्तर कभी भी उत्तराखण्ड प्रदेश को नहीं मिला और नहीं कभी किसी को दोषी ठहराया गया। अतः कोई दोषी नही तो सजा भी किसी को नहीं।

भले ही विश्व भर के लिए दो अक्टूबर का दिन अहिंसा का दिन हो मगर हमारे हिमालयी प्रदेश के लिए यह काला दिन हीं है, जिस प्रदेश की मांग और निर्माण को लेकर इतनी जाने गई उस प्रदेश की स्थिति आज भी दयनीय ही बनी हुई है। अतः आज भी प्रदेश के युवा वर्ग केवल फेसबुक पर पोस्ट कर व दिल्ली, लखनऊ, चंढीगढ़, जैसे शहरों में संगोष्टी कर राज्य के उत्थान की बात करेंगे तो यकीनन भावी पीढ़ी हमें खूब गरियाएगी। इसलिए कम से कम 100 में से लगभग 10 युवाओं को पहाड़ों पर ही रूकना होगा, रोजगार खोजना होगा, लोक संस्कृति व सभ्यता और विधाओं को जानने के लिए उत्सुक होना होगा।

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