गढ़वाल हिमालय में शिक्षालयों का विकास – डॉ. दीपक सिंह कुंवर

गढ़वाल हिमालय में शिक्षालयों का विकास – डॉ. दीपक सिंह कुंवर
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गढ़वाल हिमालय की शिक्षा के संदर्भ में : हेनरी रैम्जे ने (1874 ई0) अपनी रिपोर्ट में लिखा था – ”सबको पढ़ाना कठिन होगा।”

गढ़वाल हिमालय में शिक्षा को जीवन यापन एवं सांस्कृतिक उत्थान का महत्त्वपूर्ण मार्ग माना गया है। शिक्षा के क्षेत्र में गढ़वाल हिमालय वैदिक काल से ही उन्नत दशा में था, क्योंकि प्राचीनकाल से ही यह भू-भाग आश्रम पद्धति की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध रहा है, जैसे कि- बद्रिकाश्रम व कण्वाश्रम आदि के बारे में विदित है कि यहाँ गुरू अपने शिष्यों को आश्रम पद्वति से शिक्षा देते थे। तत्कालीन समय में यहाँ के मन्दिरों व आश्रमों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए दूर-दूर से शिक्षार्थी आते रहते थे। यह बदरी-केदार तीर्थ के आध्यात्मिक व धार्मिक स्थिति का ही प्रभाव था कि इस क्षेत्र में बदरिकाश्रम जैसे शिक्षा केन्द्र स्थापित हुए। वर्तमान समय में चमोली जिले के जोशीमठ, गोपेश्वर-मण्डल, रूद्रप्रयाग जिले के गुप्तकाशी, टिहरी गढ़वाल के देवप्रयाग, ऋषिकेश व हरिद्वार आदि स्थानों में भी आश्रम पद्धति से शिक्षा दी जाती है। शिक्षा की इस आश्रम पद्धति में समय के साथ धीरे-धीरे बदलाव आता रहा और इस बदलाव के साथ शिक्षालयों/विद्यालयों का उत्थान हुआ। फलस्वरूप इन शिक्षालयों में शिक्षा लेने व देने का स्वरूप भी बदलता गया।

गढ़ नरेशों व गोरखाओं के शासनकाल में शिक्षा के लिए व्यवस्था करना राज्य का आवश्यक कर्त्तव्य नहीं माना जाता था। फिर भी उच्च ब्राहा्रणों व राजपूतों में शिक्षा लेने की प्रथा कुछ हद तक प्रचलित थी। श्रीनगर के मन्दिरों में ऐसे विद्वान ब्राहा्रण हिन्दी, संस्कृत की शिक्षा देते थे। प्रारम्भिक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में भी शिक्षा की स्थिति पूर्ववत चलती रही, परन्तु बेकेट द्वारा पहली बार सरकार की ओर से विद्यालय खोलने का निश्चय किया गया तथा राजस्व के साथ शिक्षा के लिए पृथक देय लिया जाने लगा। सन् 1843 ई0 में शिक्षा को केन्द्रीय सरकार ने राज्य सरकार के हाथों में सौंप दिया था। प्रान्तीय सरकार द्वारा 200 घरों वाले गाँव में विद्यालय खोलने का निर्णय लिया गया। अतः केदारनाथ, गमशाली और माणा में ग्रीष्मकालीन विद्यालय खोले गये, जो कि शीतकाल में क्रमशः ऊखीमठ, चमोली व जोशीमठ आ जाते थे। 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक गढ़वाल हिमालय में अधिकांश लोग शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते थे, क्योंकि विद्यालय बहुत कम व दूर-दूर होते थे, आवागमन के साधनों में कमी थी, जिससे कि उन विद्यालय में आने-जाने में ही बहुत समय लग जाता था, साथ ही तत्कालीन समय में अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होते थे। बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार- हेनरी रैम्जे ने 1874 ई0 में अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि- ”सबको पढ़ाना कठिन होगा।” हमें कुछ लोगों को कामचलाऊ शिक्षा देनी चाहिए। जनसामान्य तक शिक्षा को उपलब्ध कराने में मिशनरियों की भी प्रमुख भूमिका रही है। इनके द्वारा स्थापित विद्यालयों से पूर्व यहाँ पर शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोगों तक ही सीमित था, जिनकी संख्या कुल जनसंख्या के 2 प्रतिशत से अधिक नहीं थी।

यदि देखा जाय तो वर्ष 1909 ई0 में यहाँ स्थित नजदीकी मिडिल देशी स्कूल श्रीनगर गढ़वाल व नागनाथ पोखरी में ही स्थित थे। बाद के समय में श्रीनगर का एंग्लो वर्नाकुलर अथार्त अंग्रेजी व देशी भाषा वाले स्कूल का स्तर बढ़ाकर हाईस्कूल कर दिया गया था। अपर कक्षाओं तक पढ़ाने के लिए यहाँ मात्र 37 प्राथमिक विद्यालय थे तथा कुल 69 विद्यालयों में केवल छोटी कक्षाओं की पढ़ाई होती थी। अध्यापक पेशेवर प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अल्मोड़ा स्थित नार्मन स्कूल भेजे जाते थे, जबकि सामान्य प्रशिक्षण की कक्षाएँ नागनाथ (पोखरी, चमोली) स्कूल में चलाई जाती थी। वर्ष 1901 की जनगणना के समय 10,000 की जनसंख्या पर कुल 639 लोग ही शिक्षित थे और इनमें भी ज्यादा शिक्षितों की संख्या देहरादून में थी। श्री केदार सिंह फोनिया लिखते हैं कि सन् 1932-33 ई0 में उनके गाँव छिनका-गमसाली (चमोली) में केवल कक्षा 04 तक का एक प्राथमिक विद्यालय था, जिसके बाद मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए जोशीमठ जाना होता था। सन् 1933 ई0 के दौरान जोशीमठ पैदल जाने के लिए छिनका से दो दिन का समय लगता था। उस समय मिडिल स्कूल का मतलब कक्षा 07 होता था। आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए आस-पास कोई स्कूल नहीं थे। लगभग सन् 1943-44 ई0 के मध्य कर्णप्रयाग में हाईस्कूल स्तर का विद्यालय खुला।

इस संदर्भ में फोनिया जी लिखते हैं कि मेरे पिताजी उस समय अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे, जिसके कारण मुझे 8वीं कक्षा में प्रवेश लेने के लिए मेसमोर हाईस्कूल, पौड़ी गढ़वाल जाना पडा था। उस समय यातायात के कोई साधन न होने के कारण छिनका-गमसाली से 7-8 दिन की पैदल यात्रा के बाद पौड़ी पहुँचा जाता था। अतः ज्ञात होता है कि उन दिनों शिक्षा प्राप्त करना कितना कठिन काम था। इस संदर्भ में हरिकृष्ण रतूड़ी लिखते हैं कि “सन् 1931 ई0 तक देवप्रयाग में भी शिक्षा का अभाव था। आबादी अधिक होने से भी यहाँ शिक्षा में कोई विशेष उन्नति नहीं हुई, जबकि 1931 ई0 के दौरान यहाँ लगभग 400 घर थे।“ सन् 1937-46 ई0 की अवधि में गढ़वाल जिले में एक राजकीय इण्टर कॉलेज खोलने की स्वीकृति मिली, क्योंकि इसके मुख्यालय पौड़ी में तब तक कोई राजकीय हाईस्कूल नहीं था। सन् 1946 के दौरान बदरी-केदार मन्दिर समिति के गढ़वाल और अल्मोड़ा जिले के अन्तर्गत संस्कृत विद्यालय तथा अन्य धर्म व विद्या प्रचारक संस्थायें थी, क्योंकि गढ़वाल व अल्मोड़ा जिले के कुछ विद्यालय व संस्थाओं को, जिनको तत्कालीन समय में शिक्षा के लिए आवश्यक समझा जाता था। इन विद्यालयों उन्हें बदरी-केदार मन्दिर समिति द्वारा 2000 रू0 वार्षिक सहायता दी जाती थी और इन विद्यालयों में पढ़ने वाले गरीब छात्र-छात्राओं को 1000 रू0 वार्षिक धनराशि छात्रवृत्ति के रूप में वितरण की जाती थी। इसके अतिरिक्त मन्दिर समिति ने कर्णप्रयाग ऐंग्लों वर्नाक्यूलर स्कूल में हाई स्कूल की इमारतें बनाने के लिये 3000 रू0 दिये थे। सन् 1963 ई0 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में शिक्षा बजट पर श्री योगेश्वर प्रसाद खण्डूड़ी ने उत्तराखण्ड में प्राविधिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, महिला एवं हरिजनों की शिक्षा के विकास की माँग की थी।

20वीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक यहाँ की शिक्षा की गति में तीव्रता आने लगी, जो कहीं न कहीं बदरी-केदार तीर्थ यात्रा के कारण ही सम्भव हुई, क्योंकि बदरी-केदार तीर्थ यात्रा में सड़क एक ऐसा प्रमुख कारक सिद्ध हुआ, जिससे गढ़वाल हिमालय की शिक्षा की गति में तीव्रता आई। सड़कों के निर्माण से आवागमन सुगम हुआ तथा लोग अब अपने बच्चों को शिक्षा हेतु निकटवर्ती कस्बों व नगरों में भेजने लगे। वहीं यात्रा मार्ग पर बनी प्राचीन चट्टियाँ धीरे-धीरे क्रमिक विकास के फलस्वरूप बाजार व नगरों के रूप में प्रतिस्थापित होने लगी, जिससे रोजगार के साधन भी बढ़ते गये, जैसे- सड़क निर्माण पर काम व ठेकेदारी, कार व बस चालक की नौकरी, यात्रियों के सामान को ढोने के लिए मजदूरी, होटल व रेस्टोरेंट, ढाबा, भोजनालय व अन्य प्रकार की दुकान आदि से गढ़वाल हिमालय के बहुत से परिवार आमदनी प्राप्त करने लगे। इस प्रकार आय के साधन बढ़ने से लोग अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबन्धन करने लगे। इस क्षेत्र के बहुत से गाँवों के बच्चों की शिक्षा आज भी इसी तीर्थयात्रा से जुडी हुई है, क्योंकि बदरी-केदार यात्रामार्ग पर स्थित बाजारों में यहाँ के निवासी दूध, सब्जी, फल व अन्य वस्तुओं का विक्रय करके तथा नौकरी या मजदूरी करके अपनी आजीविका व बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं।

आज गढ़वाल हिमालय के प्रत्येक गाँव-घरों में बच्चों के लिए प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की शिक्षा व जिला स्तर पर उच्च स्तर की शिक्षा का प्रबन्धन किया गया है। साथ ही श्री बदरी-केदार मन्दिर समिति द्वारा भी इस क्षेत्र में अनेक विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं, जिनमें वेद वेदांग संस्कृत महाविद्यालय जोशीमठ, श्री केदारनाथ सनातन धर्म स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय श्री उत्तराखण्ड विद्यापीठ, गुप्तकाशी तथा 1008 सच्चिदानन्द सरस्वती संस्कृत महाविद्यालय मण्डल (चमोली) प्रमुख हैं। 20वीं सदी में बदरीनाथ में भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित एक संस्कृति महाविद्यालय था, जो वर्तमान में वेद वेदांग संस्कृत महाविद्यालय जोशीमठ में संचालित है। वर्तमान तीर्थयात्रा व पर्यटन के महत्व को देखते हुए तथा इससे प्रभावित होकर ही यहाँ के निवासियों ने गढ़वाल विश्वविद्यालय में पर्यटन विषय को खोलने की बात उठाई थी, जिससे वर्तमान में कई छात्र-छात्राएँ प्रतिवर्ष पर्यटन विषय पर शिक्षा ग्रहण करते हैं। यह शिक्षा पर तीर्थयात्रा का ही प्रभाव रहा है कि गढ़वाल विश्वविद्यालय के कई छात्र-छात्राएँ यहाँ के तीर्थों पर शोधकार्य करते रहे हैं। इस प्रकार शिक्षा को मानव प्रगति की कुंजी माना जाता है, शिक्षा का जितना विकास किया जायेगा, प्रगति उतनी ही अधिक होगी, क्योंकि किसी भी क्षेत्र में साक्षरता का प्रतिशत जितना अधिक होगा, वहाँ का आर्थिक विकास भी उतना ही अधिक होगा।

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