आंगी जै फांगी जै औण ज्ड पर ची – डॉ. दीपक सिंह कुंवर का खास लेख

आंगी जै फांगी जै औण ज्ड पर ची – डॉ. दीपक सिंह कुंवर का खास लेख
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आंगी जै फांगी जै औण ज्ड पर ची

आधुनिकता के इस दौर में ग्रामीण परम्पराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है, जिस कारण से ग्रामीण अंचल अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। जैसे कि हमें ज्ञात है कि आज से दो दशक पूर्व माघ माह के शुभारम्भ से ही ग्रामीण अंचल में फगुनाहट का असर दिखने लग जाता था, जो अधिकांशतः आज के दौर में ग्रामीण परिवेश में दिखना सम्भव नहीं रहा और नहीं महसूस किया सकता है। भले ही आज भी पुष्प मंजरी, बसंत की अंगडाई और पछुवा पवन के झोंके फागु मास के संकेत देते हैं, फिर भी आधुनिकता के इस चकाचौंध में हमारी प्राचीन परम्पराएं दम तोड़ रही है। यहाँ तक कि अब फागुन के राग, चौपालों पर भी नहीं सुनाई देते हैं। शहरों की भाग दौड भरी जिन्दगी़ में अब ढ़ोल, मंजीरे, करताल की आवाजें सुनने को मन तरस हो उठता है। यदि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध को स्मरण किया जाए तो गढ़वाल हिमालय के ग्रामीण अंचल में प्रत्येक त्यौहार के समय पर औजी/दास (स्थानीय भाषा में ढ़ोल बजाने वाले के लिए प्रयुक्त शब्द) गाँव के आँगन में आकर ढ़ोल बजाकर (नब्ती लगाकर) आने वाले त्यौहार का स्वागत कर पूरे गाँव में खुशियों का पैगाम बाँटते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह परम्परा भी इतिहास बन गई है।


पहाड़ों में भले ही आज भी गाँव जिंदा है, लेकिन उन गाँवों की संस्कृति, परम्पराएं धीरे-धीरे विलुप्त के कगार पर आ पहुँची है। ऐसा इसलिए सम्भव हुआ है, क्योंकि उन गाँवों की संस्कृति का संरक्षण करने वाले पुरोधा शहरों की चकाचौंध व आकर्षण की ओर अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं। फलस्वरूप उन गाँवों की संस्कृति धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही है और उसकी जगह शहरी संस्कृति का बीजारोपण होता दिखाई दे रहा है। यह बात जानकर हैरानी होती है कि वर्तमान दौर में गाँव बचाना किसी भी लिहाज से किसी के लिए भी एक चुनौती नहीं रही है।

सरकार और आम लोगों का पूरा ध्यान इस बात पर है कि गाँवों को किसी भी तरीके से शहरी दर्जे पर स्थापित किया जाय, क्योंकि उनके ध्येय में गाँव के विकास का मतलब उसका शहरीकरण कर देना रह गया है, क्योंकि हम आए दिन देखते हैं कि जब भी किसी परिवार के पास पैंसे आ जाते हैं तो वह सबसे पहले अपनी धरोहर अर्थात मकान को तोड़कर उसे सीमेण्ट/लैण्टर वाली मकान में तब्दील कर देता है, क्योंकि उसके दिमाग में हमेशा से विकास का मतलब शहरीकरण कर देना या हो जाना रहा है।

अगर ऐसा ही हुआ या होता रहा है तो फिर आने वाले दिनों में शहर और गाँव में क्या अन्तर रह जायेगा? इसका मतलब ये हुआ कि धीरे-धीरे गांव समाप्त हो जायेंगे और यदि गांव समाप्त हुए तो स्वाभाविक है कि उन गांवों की संस्कृति व परम्पराएं भी समाप्त हो जायेगी। अतः वैश्वीकरण के इस दौर में सबसे अधिक नुकसान गाँव व गांव की आत्मा कही जाने वाली संस्कृति को हुआ है या हो रहा है।

कालान्तर में हमारे गाँव व उनकी संस्कृति की हालात का यह दृश्य इसलिए भी है, क्योंकि हमने गाँवों के विकास की जिम्मेदारी ऐसे लोगों के हाथों में सौंपी है, जिन्होंने गाँवों का रहन-सहन, उसकी संस्कृति, विरासत तथा परिवेश को कभी देखा व समझा ही नहीं और नहीं वे कभी ग्रामीण परिवेश में रहे हैं। अतः ऐसे व्यक्ति गाँव व उसकी संस्कृति को कैसे बचा सकते हैं?

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, लेकिन आज इस बदलाव के दौर में यह परिभाषा सार्थक नही रही।

स्वामी विवेकानंद कहते थे कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये, जो भारतवर्ष के गांवों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें।

अब यदि देखा जाए तो कालान्तर में कुछ हद तक अभी भी गाँव बचे हैं, लेकिन समस्या यह है कि उन गाँवों में संस्कृति का दीप जलाने वाले नहीं रहे हैं, जिस प्रकार खेती तो है, लेकिन खेती करने वाले खेतीहर नहीं। परिणामस्वरूप आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम खेती को एक सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में स्थापित नहीं कर पाए, क्योंकि हमने अपनी मानसिकता में खेती को कभी सम्मानजनक व्यवसाय समझा ही नहीं। भले ही हमारे पूर्वजों ने अपने उद्भव व विकास में खेती को ही एक अमूल्य निधि के रूप में संजोया हो। हमारे पूर्वजों ने न जाने कितनी मेहनत से गांवों को बसाया होगा और न जाने कितनी मेहनत से खेतों को बनाया होगा, लेकिन उन पूर्वजों की आने वाली पीढ़ी हर बार इतनी निकम्मी रही कि उनके दौर में अगर खेत का कोई हिस्सा टूट भी गया तो उन्होंने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

अतः वह खेत जो पूर्वजों द्वारा बनाये गये वे धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। इतिहास अपने को दोहराता अगर ये पंक्ति न्यायोचित होती है तो स्वाभाविक है कि हमारी आने वाली पीढ़ी में किसी न किसी एक पीढ़ी को फिर वही करना होगा जो हमारे पूर्वजों द्वारा हमारे लिए किया गया, क्योंकि हमारी एक पीढ़ी तो “उत्तम खेती मध्यम बान निश्चित चाकरी भीख निदान” के कथन से गुजरी है और एक पीढ़ी ने सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए अपनी पूरी जवानी खो दी है और अगर वह इस कार्य में सफल हो भी गये तो उनके लिए जीवन में विकास का मकसद सड़क किनारे एक घर और उस सड़क पर उनकी एक गाड़ी यही रहा है,

लेकिन इतिहास जब दोहरायेगा तो सबसे बड़ी समस्या इनकी ही पीढ़ी के लिए खड़ा करेगा, क्योंकि जब इनके लिए इनके पूर्वजों से विरासत में मिली 40-50 नाली जमीन से जीवन सम्भव नहीं हो पाया तो ये कैसे सम्भव हो जायेगा कि इनके द्वारा सडक किनारे 1-2 नाली ली गई जमीन पर इनकी तीन-चार पीेढ़ी अपना बसेरा कर लेगी?? क्योंकि पलायन करने वाले सभी करोड़पति/अरबपति नहीं हैं और नहीं ये सम्भव है कि उनकी हर पीढ़ी के सदस्य को सरकारी नौकरी मिलेगी ।इसलिए गढ़वाली में एक कहावत प्रचलित है- “आंगी जै फांगी जै औण ज्ड पर ची।”
इससे आगे अगले लेख में……………………..।

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