उत्तराखंड के ब्रह्मपुर : एक खोए शहर की कथा – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर

उत्तराखंड के ब्रह्मपुर : एक खोए शहर की कथा – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर
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उत्तराखंड के ब्रह्मपुर : एक खोए शहर की कथा

सभ्यताएं शहर बनाती हैं और शहर अपना इतिहास बनाते है। तत्पश्चात ‘समय’ अपना काम करता है, जिसके फलस्वरूप अपनी तमाम भव्यता के बावजूद एक दिन शहर खो जाते है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई सारे प्राचीन शहरों को आदमी ने खोज निकाला पर कुछ शहर कभी नहीं मिले। वे शहर बस दंतकथाओं और प्राचीन अभिलेखों में ही दर्ज रह गए। सातवीं शताब्दी में भारत आए ह्वेनसांग के अपने यात्रा वृतांत में उत्तराखंड के एक शहर ब्रह्मपुर का जिक्र किया है। ह्वेनसांग वर्ष 634 ई. में थानेश्वर (हरियाणा) से सुघन (सहारनपुर) होता हुआ गंगा पार कर बिजनौर के मंडावर पहुंचा। वहां से मयूर (मोरध्वज) एवं मायापुर (हरिद्वार) होता हुआ वह ब्रह्मपुर पहुंचा। ह्वेनसांग के अनुसार मायापुर से 300 ली अर्थात 80 किमी दूर बसी ब्रह्मपुर नामक राजधानी क्षेत्रफल में छोटी अलबत्ता घनी आबादी वाली है। यहां की ज़मीन उपजाऊ है और यहां साल भर खेती होती है। ह्वेनसांग, ब्रह्मपुर के रहवासियों के बारे में लिखते हैं- कि यहां लोग रूखे और अक्खड़ स्वभाव के हैं अलबत्ता उनमें आपसी प्यार-मोहब्बत बहुत हैं और वह मिल-जुल कर रहते हैं।

आगे लिखते हैं कि ब्रह्मपुर व्यापारियों का शहर है पर यहां कुछ पढ़ने-लिखने वाले लोग भी रहते है। बौद्ध और हिंदू दोनों धर्म के अनुयायी यहां रहते है और शहर में 5 बौद्धमठ और लगभग 12 मंदिर हैं। ह्वेनसांग लिखते हैं कि यहां की जलवायु ठंडी हैं और तांबा यहां बहुत निकलता है। इस प्रकार इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि हर्षवर्द्धन के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग हिमालय के ब्रह्मपुर राज्य आया था, जिस ब्रह्मपुर को उन्होंने पो-लि-हि-मा-यु-लो नाम दिया था।
ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत के अलावा सातवीं सदी के उत्तराखंड में मिले कई ताम्रपत्रों और मार्कंडेय पुराण में भी ब्रह्मपुर का जिक्र मिलता है। तालेश्वर ताम्रपत्रों में पर्वताकार राज्य के रूप में ब्रह्मपुर का जिक्र किया गया है। वाराहमिहिर की बृहतसंहिता में भी इस पर्वतीय राज्य का उल्लेख मिलता है। यहाँ तक कि कत्यूरी जागरों में भी एक शहर ब्रह्मपुर का उल्लेख इस प्रकार किया गया है।
“असं बांका वासन बांका, बांका ब्रह्म लखनपुर बांका”
अतः ब्रह्मपुर कहां था?? इस बारे में कई सारे मत प्रचलित हैं —
अंग्रेज इतिहासकार डॉ0 कनिंघम आधुनिक गढ़वाल और कुमाऊँ के संपूर्ण भू-भाग को ब्रह्मपुर मानते हैं और लिखते हैं कि पश्चिमी रामगंगा के तट पर बसे लखनपुर ही ब्रह्मपुर है।
पावेल पायस के अनुसार- कत्यूरों की राजधानी बैराठ ही ब्रह्मपुर है ।
एटकिंसन और राहुल सांकृत्यायन ने इसे भागीरथी घाटी के बाड़ाघाट (उत्तरकाशी) के आस-पास कहीं बताया हैं।
कुछ विद्वान मानते हैं कि ये वर्तमान चौखुटिया के आस-पास की जगह है। इसके अलावा कई सारे मत प्रचलित है, हालांकि ठीक-ठीक कोई नहीं जानता है कि ब्रह्मपुर कहां था?? प्यारे घुमक्कड़ों और अजीज पढ़ने लिखने वालो एक शहर कहीं छुपा हुआ है। उसे तलाश पाओ तो तलाश लो..

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