बाँछा की बगिया 20 साल बाद फिर सजेगी – चारधाम न्यूज़

बाँछा की बगिया 20 साल बाद फिर सजेगी – चारधाम न्यूज़
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“20 साल बाद फिर सजेगी बाँछा की बगिया”

वर्ष 2001 में हल्द्वानी में आयोजित रंग महोत्सव के ओपन थियेटर में राज्य के 15 नाट्य दलों ने प्रतिभाग किया था, जिसमें अक्षत् नाट्य संस्था गोपेश्वर के 17 कलाकारों के एक दल ने ‘बगिया बांछा राम की’ नामक नाटक का प्रभावशाली मंचन किया, जिस कारण से इस नाटक को रंग महोत्सव ने विशिष्ट स्थान प्रदान किया था। इस महोत्सव में अक्षत् नाट्य संस्था के कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय व मंच निर्माण के साथ स्टेज क्रॉफ्ट को रंग महोत्सव हल्द्वानी के जजों द्वारा खूब सराहा गया था।

इस प्रकार जिस नाटक ‘बगिया बांछा राम की’ ने आज से लगभग 20 वर्ष पहले अक्षत् नाट्य संस्था-गोपेश्वर के निर्देशक श्रीमान् विजय वशिष्ठ जी की अनुकम्पा में कुमाऊँ की धरती में धूम मचाई थी, वही नाटक एक बार पुनः 20 वर्ष बाद गढ़वाल की धरती पर 01 नवम्बर 2021 को श्रीमान् विजय वशिष्ठ के निर्देशन में अक्षत् नाट्य संस्था के रंगकर्मियों द्वारा रा0 इ0 कॉलेज गोपेश्वर (चमोली) के सभागार में निर्देशित किया जायेगा। इस नाटक में 20 साल पुराने कलाकारों में श्रीमान् विजय वशिष्ठ, उपेन्द्र भण्ड़ारी व कुलदीप करासी जी भी नजर आयेंगे, जिनके अन्दर इस नाटक के मंचन को लेकर बड़ा उत्साह बना हुआ है। इस संदर्भ में श्रीमान् उपेन्द्र भण्ड़ारी जी का कहना है कि इस नाटक ने हमारी 20 साल पुरानी स्मृतियों को एक पुनः उजागर कर दी है। इस नाटक में 20 साल पूर्व भूत की भूमिका में दिखने वाले कलाकार कुलदीप करासी इस बार नौ कौड़ी के किरदार में दिखेंगे।

इस नाटक के निर्देशक श्री विजय वशिष्ठ जी के अनुसार- इस नाटक में 20 साल पुराने और नये कलाकारों के मध्य एक अनूठा संगम देखने को मिलेगा। आगे बताते हैं कि बागिया बांछा राम की नामक नाटक मनोज मित्र द्वारा बंगाली भाषा में लिखा गया था, जिस नाटक का हिन्दी अनुवाद बाद में सांत्वना निगम द्वारा किया गया। बंगाली मूल में लिखा गया यह नाटक भारत के अलग-अलग प्रान्तों में इतना चर्चित रहा है कि पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग भाषाओं में इस नाटक पर अनगिनत शॉ रंगकर्मियों द्वारा आयोजित किये जा चुके हैं।
श्री दीवान सिंह नेगी बताते हैं कि अक्षत् नाट्य संस्था ने इस बार रंगमंच के संरक्षण एवं संर्वद्धन हेतु इस नाटक के प्रदर्शन के लिए न्यूनतम प्रवेश शुल्क टिकट के माध्यम से निर्धारित किये हैं।

कैसे पड़ी नींव अक्षत् नाट्य संस्था की

अक्षत् नाट्य संस्था का स्वरूप पृथक उत्तराखण्ड़ राज्य प्राप्ति आन्दोलन के दौरान अगस्त 1994 में ‘आक्रोश’ नाम से अस्तित्व में आया था। कालान्तर में बॉलीवुड कलाकार श्री जगत रावत के निर्देशन में तत्कालीन परिस्थितियों पर आधारित नाटक ‘पहाड़ की व्यथा’ का मंचन उस दौरान गढ़वाल-कुमाऊँ के अलग-अलग स्थानों पर किया गया। तत्पश्चात देश की राजधानी के प्रमुख स्थान जंतर-मंतर, जवाहरलाल नेहरू विवि0 तथा गढ़वाल विवि0 में भी पहाड़ की व्यथा नाटक का मंचन किया गया, जिस नाटक ने उस दौरान उत्तराखण्ड़ राज्य आन्दोलन को आग की हवा देने का काम किया था।

इसलिए रंगकर्मियों द्वारा आक्रोशित जनता को पहाड़ का दुःख, दर्द दिखाने के लिए ‘आक्रोश’ नामक संस्था का गठन किया गया, जिसे उत्तराखण्ड़ राज्य प्राप्ति के पश्चात वर्ष 2002 में ‘आक्रोश’ नाम से बदलकर ‘अक्षत् नाट्य संस्था’ के नाम से पंजीकृत किया गया। तब से आजतक अक्षत् नाट्य संस्था रंगमंच के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु निरन्तर अग्रसर है। इस वजह से अक्षत् नाट्य संस्था लगातार जिलास्तर, राज्यस्तर व राष्ट्रीय स्तर पर अपने नाटकों का मंचन कर चमोली जनपद का नाम गौरवान्ति कर रहा है। अक्षत् नाट्य संस्था के कलाकार आज बॉलीवुड के अन्दर अपनी कला की छोड़ चुके हैं, जिनमें मुख्य रूप से श्री जगत रावत, संगीता किमोठी व जगत गैरोला जी हैं जबकि लोक गायककार श्री किशन महिपाल जी भी अक्षत् नाट्य संस्था के पुराने कलाकार रह चुके है, जो आज भी अपने शॉ के मंचन से पूर्व अक्षत् नाट्य संस्था का नाम लेते हैं। अक्षत् नाट्य संस्था ने ही सर्वप्रथम रामलीला के मंचन में महिलाओं को पात्र/किरदार के रूप में उतारना शुरू किया।

जिले के अन्तर्गत रंगशालाएं न होने से परेशानियां

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी आज तक जनपद के अन्तर्गत एक भी रंगशाला/परीक्षा गृह न होने के कारण नाट्य मंचन में लगातार परेशानियां बनी रहती है। फिर भी जिले के कलाकार अपने कम संसाधनों से ही रंगकर्मों को जिन्दा रखने का प्रयास कर रहे हैं। आज तक भी किसी राजनीतिक पार्टियों ने कभी भी अपने घोषणापत्र में रंगकर्म के संवर्द्धन हेतु कोई भी स्थान नहीं दिया, जिस वजह से धीरे-धीरे राज्य की लोककलाएं अपना अस्तित्व खो रही हैं।


अक्षत् नाट्य संस्था के निर्देशक श्रीमान् विजय वशिष्ठ जी के अनुसार- हमें नाट्य मंचन के दौरान कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें सबसे बड़ी समस्या जिला मुख्यालय में रंगशाला का न होना है। इसलिए हम अपने नाट्य प्रदर्शन को हर बार वेडिंग प्वाइंट व राजकीय इण्टर कॉलेज गोपेश्वर के सभागार में करने के लिए मजबूर रहते हैं।

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