आज भिगाते हैं कुमाऊँ में सातूं-आठूं लोकपर्व के लिए बिरुड़ा – डॉ0 दीपक सिंह का खास लेख

आज भिगाते हैं कुमाऊँ में सातूं-आठूं लोकपर्व के लिए बिरुड़ा – डॉ0 दीपक सिंह का खास लेख
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आज भिगाते हैं कुमाऊँ में सातूं-आठूं लोकपर्व के लिए बिरुड़ा

कुमाऊँ में गौरा महोत्सव, बिरुडा पंचमी, सातूं-आठूं पर्व व गंवरा-महेश पूजन आदि नाम से प्रसिद्ध लोकपर्व की तैयारी आज भाद्र माह के शुक्ल पंचमी से शुरू होती है, जिसे यहाँ के पंचागों में ‘बिरूड़ा पंचमी’ नाम से जाना जाता है।

बिरुडा पंचमी का यह त्यौहार गौरा (गंवरा) और महेश को समर्पित है। यह त्यौहार कुमाँऊ में कई जगह मनाया जाता है। इस लोकपर्व में शुक्ल पंचमी के दिन सारी महिलायें एकत्र होकर अपनी संस्कृति के परिधान में तैयार होकर ताँबे के बर्तन में बिरुड़ भिगाती हैं।

 

बिरुड या बिरूड़ा’ शब्द ‘पंचनाज’ के लिए दिया गया शब्द है।

आज के दिन स्त्रियाँ नहा-धोकर इस पंचनाज को, जिसमें चना, मटर, गेहूँ, कलों, गुहेश (गहत), भट आदि अनाज होते हैं, इन्हें ताँबे के बर्तन में भिगाने डालते हैं। बर्तन के बाहर चारों ओर पाँच जगहों पर गोबर लगाकर दूब घास के तिनके भी रोपे जाते हैं। इस त्यौहार में व्रत की कथा को महिलाएं लोकगीत के रूप में गाती हैं, जब सास, बहु (गंवरा) से सन्तान की कामना करती है, तो देवी (बहु) अर्थात गंवरा कहती है कि-
“गौरा देवी को सप्तमी को बरत,
करूं सासु सप्तमी को बरत।”
सास कहती है –
“सात समुन्द पार बटिक लाओ,
कुकुड़ी-माकुड़ी को फूल।”
बहु कहती है कि –
“गहरी छू गंगा चिफलों छ बाटो
कसिकै ल्यूलों इजु
कुकड़ी माकुड़ी को फूल।”

आज के दिन कुमाऊँ में स्थित गाँव के कई घरो में गौरा और महेश की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है, इस पूजा में विशेष दो फूलों का प्रयोग किया जाता है। धधुरा और हीवे का फूल सारे गाँव की महिलाएं अपने घरों से पूजा की थाली को सजाकर लाते है। फिर सब मिलजुल करके पूजा करते है। इस पूजा में गाँव की सारी महिलायें और बच्चे शामिल होते हैं और साथ ही भक्ति गीतों के साथ नाच गान भी किया जाता है। दूसरे दिन सुबह शुद्ध जल से धोकर बिरुड़ा और लाल रंग की दूव की डोर धारण करती हैं। अष्टमी के दिन कुंवारी कन्या द्वारा सोंवा के पौधे से गंवरा यानी गौरा बनाई जाती है और तत्पश्चात डलिया में रखी जाती है। वहाँ पर एक चादर में माल्टा, नारंगी आदि स्थानीय फलों को एक चादर में डालकर उछाला जाता है। यदि किसी कन्या के पास फल आकर गिरता है तो माना जाता है कि इस साल उसका ब्याह/विवाह हो जायेगा। नवमी के दिन गौरा और महेश को एक टोकरी में रखा जाता है और फिर विधि-विधान से दोनों की पूजा-अर्चना की जाती है और उनके गीत गाये जाते हैं और फिर गाँव के किसी माता के मंदिर में गाजे-बाजे के साथ इनको ले जाया जाता है और अश्रुपूर्ण विदाई दी जाती है। इसे गमरा सिलाना कहा जाता है।


जानकारों के मुताबिक भाद्र मास के पर्वों में बिरुड़ पंचमी को पवित्रता के साथ ही कृषि की प्रधानता के लिए भी अलग स्थान दिया गया है। बिरुड़ का अर्थ किसी अनाज का अंकुरित होने से है। सातूं-आठूं उत्सव के लिए एक शुद्ध वस्त्र में सात या पांच अनाजों को दूब के साथ पोटली बनाकर महिलाएं स्नानादि के बाद अपने घर के देव मंदिर में एक पात्र में भिगो देती हैं। अभुक्ताभरण सप्तमी को इसके जल से स्नान करती हैं और बिरुड़ों से गौरा, महेश की पूजा करती हैं।

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