भाद्र मास 2021 की ‘नंदा की वार्षिक लोकजात’ क्यों रही भव्य? – डाॅ. दीपक सिंह

भाद्र मास 2021 की ‘नंदा की वार्षिक लोकजात’ क्यों रही भव्य? – डाॅ. दीपक सिंह
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भाद्र मास 2021 की ‘नंदा की वार्षिक लोकजात’ क्यों रही भव्य?

इस वर्ष चमोली जनपद के 07 विकासखण्डों तथा अलकनंदा, पिंडर व मन्दाकिनी घाटी के लगभग 250-300 गाँवों में नंदा की वार्षिक लोकजात के दौरान हर्षोल्लास का माहौल छाया रहा। हिमालयी क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष भादों माह की सप्तमी-अष्टमी को नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा आयोजित की जाती है, जो इस वर्ष 31 अगस्त से शुरू होकर 13 सितम्बर को सम्पन्न हुई। इस लोकजात में कुरुड़ से राजराजेश्वरी की डोली बेदनी बुग्याल, दशोली से नंदा की डोली/छतोली बालपाटा व बंड भूमियाल की छतोली नरेला बुग्याल में तर्पण पूजा के बाद सम्पन्न हुई।

इस वर्ष नंदा की यह वार्षिक लोकजात कई मायनों में नंदा देवी राजजात व इससे पूर्व हुई नंदा की वार्षिक लोकजात से भव्य रही है, जिस भव्यता को दिखाने में सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है, क्योंकि उत्तराखंड के घर-गॉंवों से लेकर भारतवर्ष के कौने-कौने तक डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से माँ नंदा के लोकगीत और जागर की वीडियो व फोटोग्राफ ने धूम मचा रखी है। नंदा के जयकारों ने इस वर्ष ऐसा महसूस कराया है कि मानो नंदा अपने जीवन के बीते वर्षों में इतनी खुश व प्रत्येक घर में इतनी गूँजयमान कभी नहीं रही हो, जितनी इस वर्ष रही है। गढ़वाल के कई हिस्सों में हिमालय की अधिष्ठात्री देवी नंदा की वार्षिक लोकजात में ढ़ोल-दमाऊं, भौंकरे के साथ इस वर्ष मशकबीन व ब्रांश-बैंड भी देखने को मिला है, जो कि लोकजात के आकर्षण का केंद्र बिंदु बना रहा, साथ ही पहाड़ी पगडंडियों पर सभी छतोलियों को सुसज्जित सजाया हुआ देखा गया व छतोली धारक और नंदा देवी के अन्य कार्यकर्ताओं के द्वारा लाल-पीली परिधान की धोती पहने हुए एक अलग सा सुकून इस वर्ष की लोकजात में देखने को मिला है।अपनी संस्कृति परम्पराओं के प्रति युवावर्ग में इस प्रकार की सौहार्द की भावनाओं को देखकर नंदा की इस वार्षिक लोकजात ने देवभूमि को एक बार फिर से अपने अतीत के गौरवमयी उत्सवों/त्यौहारों की परिपाटी में ले खड़ा किया है। युवावर्ग का अपनी देवी-देवताओं के प्रति इस प्रकार के अथाह प्रेम के लिए कोटि-कोटि नमन्।

इस वार्षिक लोकजात को भव्य बनाने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान पहाड़ के युवावर्ग ने दिया, जो कोरोना संक्रमण के इस दौर में देश-विदेश से लौटकर अपने पैतृक घर-गाँवों में ही रह रहे थे। उन्होंने इस वार्षिक लोकजात में अपनी सभी ध्याणियों को मायके बुलाकर ‘नंदा के मायके’ को लोकसंस्कृति के रंग में सरोबार करने में अहम भूमिका निभाई है। फलस्वरूप ध्याणियों ने मायके आकर इस वार्षिक लोकजात में दंकुडी, झोडा, चांचरी, झमेलों, चौफुला……
जशीलि ध्याण तू जशीलि व्हे रेई।।
अपणा मैत्यों पर छत्र छाया बणाई रेई।।


जैसी मधुर ध्वनियों से माँ नंदा के मायके में चार चांद लगाए, जिस कारण से नंदा लोकोत्सव के लोकगीतों व जागरों से पूरे हिमालय क्षेत्र के घर-गॉंवों के चौक-चौबाटे व सीढ़ीनुमा खेतों की पगडंडी में लंबी कतारों के साथ नंदा का मायका लोकोत्सव में डूबा/झूमा रहा। इन लोकगीतों व जागरों की कुछ पंक्ति इस प्रकार से रही है—

~ भादों का मैना की नंदा अष्टमी……
~ मेरी मैत की धियाणी तेरू बाटू हेरदु रोलू…..
~जै भगौती नंदा, नंदा ऊँचा कैलाश की….
~ नंदा तेरी जात कैलाश लिजोला…….
~ पेर-पेर गौरा तु, हाथों की…..
~ खोल जा माता खोल भवानी…..
~ जय बद्रीनाथ जी की जामको…….
~ जय देवी नंदुला तेरी….

माँ नंदा के इन्हीं पारम्परिक लोकगीतों और जागरों से वीरान पड़े घर-गाँवों में कुछ वक्त के लिए नंदा ने खुशियाँ लौटा दी थी। इस वार्षिक लोकजात ने ही नंदा से मिलने के बहाने बरसों बाद मिल रहे ध्याणियों और रिश्तेदारों में करुणा के बंधन ने एक-दूसरे को फिर से एक ड़ोर में बाँधने का काम किया है। अतः इस वार्षिक लोकजात को अंततः करूणा के संयोग-वियोग के स्तर पर पहुंचाने में ध्याणियों का अहम योगदान हमेशा से रहा है, जब माँ नंदा की डोली कैलाश की ओर प्रस्थान करती है तो नंदा को विदा करते समय सभी ध्याणियों की आँखें नम व चित्त करूणा की फफक से वियोग श्रृंगार को उत्पन्न कर देती है, जिस करुणा को उत्पन्न करने में पौराणिक लोकगीत व जागर सहायक होते हैं। इस प्रकार नंदा की वार्षिक लोकजात को रंगीन बनाने में ध्याणियों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है और इस बार युवावर्ग ने अपनी सभी ध्याणियों को मायके बुलाकर इस लोकोत्सव में चार चाँद लगाएं हैं। गढ़वाल हिमालय में आज भी नंदा के प्रति असीम प्रेम, आस्था व लगाव होने के कारण ही लोग खुशी-खुशी अपनी बेटी का नाम नंदा रख देते हैं। अतः कह सकते हैं कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में न जाने कितने घरों में नंदा नाम से कन्याएँ आज भी अपने परिवार को खुशियाँ बाँट रही है।

इस वर्ष नंदा की वार्षिक लोकजात के कार्यक्रम श्री नंदा देवी राजराजेश्वरी मंदिर समिति अथार्त नंदा बधाण द्वारा इस प्रकार से घोषित किए थे कि 31 अगस्त को राजराजेश्वरी की डोली कुरूड धाम मंदिर से हिमालय की ओर प्रस्थान करेगी। तत्पश्चात—-
31 अगस्त को कुरुड़ से चरबंग.
1सितम्बर को चरबंग से मथकोट.
2 को मदकोट से उस्तोली
3 को उस्तोली से भेंटी
4 को भेंटी से बूंगा
5 को बूंगा से डुंग्री
6 को डुग्रीं से सूना
7 को सूना से चेपडो़
8 को चेपडो से बेराधार
9 को बेराधार से फल्दिया गाँव
10 को फल्दिया गाँव से मुन्दोली
11 को मुन्दोली से वाण
12 को वाण से गेरोली पातल
13 को गेरोली पातल से वेदनी बुग्याल, जहाँ तर्पण पूजा और माँ नंदा की पूजा के बाद वेदनी मेला संपन्न होगा। तत्पश्चात नंदा की डोली रात्रि विश्राम के लिए बाँक गाँव पहुंचेगी।
14 को बांक गाँव से ल्वाणी
15 को ल्वाणी से उंलग्रा
16 को उंलग्रा से पूर्णा
17 को पूर्णा से जौला
18 को जौला से विजेपुर
19 को विजेपुर से बैनोली गांव
20 को बैनोली से सिद्धपीठ देवराडा में बधाण की नंदा राजराजेश्वरी की डोली अगले 6 महीने के लिये स्थापित होगी। फिर उत्तरायण में नंदा देवी अपने मायके नंदा धाम कुरूड़ हेतु प्रस्थान करेगी।

वहीं दूसरी ओर बंड क्षेत्र में बंड भूमियाल किरूली गांव और नौरख पीपलकोटी गांव में केलावीर मंदिर में नंदा उत्सव भव्य हुआ। और आगे बढ़ कर देखें तो उर्गमघाटी घाटी, सलूड – डुंगरा, डुंगरी बरोसी, के साथ बड़ागांव, जैंशाल गांव, बेमरू, स्यूंण, डुमक,कलगोठ और बदरीनाथ बामणी गांव में नंदा उत्सव भव्य हुआ।

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