बदरीनाथ पैदल तीर्थयात्रा में हाट चट्टी यात्राकाल का एक मुख्य व 14वाँ पड़ाव – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर

बदरीनाथ पैदल तीर्थयात्रा में हाट चट्टी यात्राकाल का एक मुख्य व 14वाँ पड़ाव – डाॅ. दीपक सिंह कुंवर
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क्यों महत्वपूर्ण थी : प्राचीन हाट चट्टी

प्राचीनकाल में गंगाद्वार से लेकर बदरी-केदार पैदल यात्रामार्ग पर कई पड़ाव बनाये गये थे, जिन्हें सामान्यतः चट्टियाँ कहा जाता था, जिन चट्टियों में यात्राकाल के दौरान भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु विश्राम करते थे।
राहुल सांकृत्यायन व यशवंत सिंह कठोच के अनुसार- जब हरिद्वार से बदरीनाथ तीर्थ की पैदल यात्रा की जाती थी तब हरिद्वार से हाट चट्टी की दूरी 143 मील थी, जबकि लक्ष्मण झूला से इस चट्टी की दूरी लगभग 122 मील थी। तत्कालीन समय में बदरीनाथ पैदल तीर्थयात्रा में हाट चट्टी यात्राकाल का एक मुख्य व 14वाँ पड़ाव होता था। हाट चट्टी से बदरीनाथ धाम के बीच की दूरी मात्र 43 मील थी, जबकि इस चट्टी के बाद बदरीनाथ धाम तक पहुंचने के लिए यात्राकाल के कुल 04 पड़ाव थे। इस प्रकार प्राचीन पैदलयात्रा में हरिद्वार से बदरीनाथ तीर्थ के बीच की कुल दूरी 186 मील थी, जबकि इस पैदल तीर्थयात्रा में कुल 18 पड़ाव थे।

हाट चट्टी से पूर्व 01 मील की दूरी पर सियासैंण चट्टी व आगे 04-05 मील की दूरी पर पीपलकोटी चट्टी थी। उस दौरान पीपलकोटी चट्टी में उत्तर-पूर्वी नागपुर, दशोली, उत्तरी बधाण और पैनखण्डा के निवासी अपने घी को बेचने के लिए आते थे। अतः तत्कालीन समय में बण्ड पट्टी में स्थित पीपलकोटी चट्टी घी के क्रय-विक्रय का एक प्रमुख केन्द्र था। इसी चट्टी से घी के अधिकांश भाग को बाद में बदरीनाथ पहुँचाया जाता था। पीपलकोटी चट्टी पैदल तीर्थयात्रा के दौर में नन्दप्रयाग चट्टी के बाद बदरीनाथ धाम तक स्थित चट्टियों में सबसे बड़ी चट्टी थी।

गढ़वाल हिमालय की इस पैदल तीर्थयात्रा के दौरान बदरीनाथ धाम के पुजारी (रावल) तत्कालीन समय में एक रात्रि विश्राम हाट चट्टी में ही करते थे और दूसरे दिन प्रातःकाल यहाँ स्थित श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की पूजा कर बदरीनाथ तीर्थ के कपाट खोलने के लिए प्रस्थान करते थे। इस प्रकार तत्कालीन समय में सभी पैदल तीर्थयात्री सियासैंण व हाट चट्टी में ही रात्रि विश्राम कर यहाँ स्थित प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों का दर्शन कर बदरीनाथ तीर्थ के लिए प्रस्थान करते थे। यहाँ स्थित ऐतिहासिक धरोहरों में तीर्थयात्री सप्तकुण्ड़, जिसमें मुख्य रूप से नारदकुण्ड़ के साथ सूर्यकुण्ड़ के दर्शन करते थे, इसके अलावा भगवान बिल्लेश्वर महादेव, लक्ष्मीनारायण मंदिर, मल्कादेवी, दक्षिण मुखी हनुमान, गणेश भगवान, माँ चण्ड़िका, बगडवाल देवता, रामचरण पर्वत आदि के दर्शन कर पुण्य कमाते थे।

अलकनंदा नदी के दाँयें तट अर्थात हाट चट्टी से बाँयें तट अर्थात बदरीनाथ तीर्थयात्रा के पैदल मार्ग को जोड़ने के लिए तत्कालीन समय में ग्रामीण लोग प्राचीन तकनीकी के अनुसार बबूलू/बबूला (एक प्रकार का जंगली घास) व लकड़ी की सहायता से पुल बनाते थे, जिसे उस दौर में भूतर (भूमि में उतरने के लिए लकड़ी से बनाया गए पुल को) कहा जाता था। तत्पश्चात 20वीं सदी के तीसरे-चौथे दशक में ब्रिटिश सरकार ने हाट चट्टी को बदरीतीर्थ के लिए जाने वाले पैदल मार्ग से जोड़ने के लिए अलकनंदा नदी पर एक स्थाई झूला पुल का निर्माण करवाया, लेकिन जैसे ही 1950-60 के दशक में बदरीनाथ तीर्थ को सड़क मार्ग से जोड़ दिया गया, वैसे ही धीरे-धीरे इन चट्टियों से जाने वाले प्राचीन मार्ग विरान होते गये।


हाट चट्टी व सियासैंण चट्टी में स्थित दुकानों पर तीर्थयात्रियों के अलावा यहाँ स्थित नजदीकी गाँवों के ग्रामीण लोग भी निर्भर रहते थे, क्योंकि ग्रामीण लोग इन चट्टियों के द्वारा ही सामानों का आयात-निर्यात करते थे, जैसे- कुँजों, डुंग्री, मैकोट, जैसाल, कौडिया, ल्वां, दिगोली, बाटुला, गड़ोरा, किरूली, अमरपुर, मठ, गुनियाला, बेमरू, स्यूणं, झडेता, बजनी, बेडुमाथल, कुणखेत आदि गाँव हाट व सियासैंण चट्टी पर ही निर्भर रहते थे, क्योंकि हाट चट्टी के बाद नजदीकी चट्टी पीपलकोटी में स्थित थी, जो चट्टी हाट से लगभग 4-5 मील की दूरी पर स्थित थी। अतः उस दौर में इन गाँवों को बाहरी दुनिया से जोड़ने में हाट चट्टी का एक महत्वपूर्ण स्थान था। इन गाँवों का व्यापार-व्यवसाय से लेकर शिक्षा तक सभी चीजें इस चट्टी से ही जुड़ी थी। तत्कालीन समय में इन गाँवों से जितने भी विद्यार्थियों ने शिक्षा ग्रहण की, वे सभी इ चट्टियों के प्राचीन मार्ग से भली-भाँति परिचित थे, क्योंकि वे सभी इसी चट्टी से होते छिनका-घमसाली में स्थित स्कूल से ही शिक्षा ग्रहण करते थे। तत्पश्चात इनमें से कुछ गाँवों को पीपलकोटी बाजार से जोड़ने के लिए तेंदुली नामक स्थान पर वर्ष 1965-70 के मध्य अलकनंदा नदी की सबसे संकरी घाटी के ऊपर एक झूला पुल का निर्माण किया गया था, जिससें इन गांवों का सम्पर्क हाट चट्टी से कम होने लगा, लेकिन जब घर-गांव में कुछ मांगलिक कार्य या पूजा-पाठ होना होता था तो तब बहुत से लोग बेलपत्री व अपने कुल पुरोहित को बुलाने उसी प्राचीन मार्ग से जाते थे। तेंदुली नामक स्थान पर बने पुल के सम्मुख वर्ष 1965 में बनी हिन्दी फिल्म ’हिमालय की गोद’ के कुछ दृश्यों का फिल्मांकन किया गया था।

1960 के दशक के बाद गढ़वाल हिमालय में सड़क निर्माण के चलते इन चट्टियों का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा था, क्योंकि इन चट्टियों से श्रद्धालुओं के आवागमन में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी थी। कालान्तर में हाट चट्टी के क्षेत्रान्तर्गत टी0 एच0 डी0 सी0 द्वारा 444 मेगावाट की विद्युत परियोजना का निर्माण कार्य चल रहा है, जिस कारण से हाट व सियासैंण दोनों चट्टियों का अस्तित्व समाप्त की ओर है। यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो इन चट्टियों को एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संजोया जा सकता है।


कुमाऊँ कमिश्नर विलियम ट्रेल महोदय ने 1827 से 1835 के मध्य प्राचीन चट्टियों से होते हुए बदरी-केदार धाम तक 06 फुट पैदल मार्ग का निर्माण करवाया था, जिससे चट्टियों का मार्ग सुलभ हो गया था। हमें इन चट्टियों को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संजोकर रखना चाहिए, जिससे हम इस स्वस्थ सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत रूप में स्थानान्तरित कर सके। अतः इन चट्टियों का रख रखाव उसी तर्ज पर किया जाना चाहिए जैसे पौराणिक या मुगलकालीन स्मारको का किया जाता है। कालान्तर में साहसिक यात्राओं के बढ़ते परिप्रेक्ष्य को देखते हुए इन प्राचीन चट्टियों के पैदल मार्गों को सही स्तर पर व्यवस्थित कर अनियंत्रित प्रदूषण पर भी नियंत्रण पाया जा सकता हैं। इन चट्टियों में स्थित पड़ाव व इनसे जाने वाले पैदल मार्गों की देखरेख का जिम्मा उन चट्टियों के समीप स्थित ग्राम सभा या नगर पंचायत को देकर यात्रियों से प्राप्त होने वाली आय को स्थानीय विकास में प्रयोग में लाया सकता। यदि इन चट्टियों का पुनर्निर्माण व विकास किया जाए तो कालान्तर में जो पैदल यात्राएं की जाती है, वे इन्हीं चट्टियों से होते हुए सम्पन्न की जा सकती है।

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