वह देवदार का वृक्ष हँसता है कैसे निज शीश उठाकर सचमुच सब सच कहते हैं बैकुंठ यहीं है भू-पर – चारधाम समाचार

वह देवदार का वृक्ष हँसता है कैसे निज शीश उठाकर सचमुच सब सच कहते हैं बैकुंठ यहीं है भू-पर – चारधाम समाचार
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डॉ0 दीपक सिंह

काफल का फल कैसा है, गौरीफल कितना सुंदर
कैसी रसधार भरी है, इस किरमोरा के अंदर।
वह देवदार का वृक्ष हँसता है, कैसे निज शीश उठाकर।
सचमुच सब सच कहते हैं, बैकुंठ यहीं है भू-पर

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो0 मनोरंजन अपने संस्मरण में लिखतेे हैं कि 13 मई 1933 को हरिद्वार से मेरी बदरी-केदार तीर्थ के लिए पैदल यात्रा शुरू हुई थी और आज भी मुझे जब बदरी-केदार तीर्थ की चट्टियों से पैदल यात्रा की याद आती है तो मेरा चित्त गद्-गद हो जाता है और मन में होता है कि यदि मैं वह दृश्य न देखता तो संसार का एक बहुत सुंदर दृश्य देखने से रह जाता। वे लिखते हैं कि वर्ष 1933 की बदरीनाथ तीर्थयात्रा में यात्रियों की भीड़ का क्या कहना! भले ही दर्शनार्थियों में अधिक संख्या बढ़े-बुढियों की थी, लेकिन दर्शन के लिए वे एक-दूसरे पर टूट रहे थे और उस समय वहाँ छोटा सा मन्दिर व छोटा सा दरवाजा। अतः उन सबका प्रबंध किस प्रकार से हो? मन्दिर बनाने वालों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आयेगा, जब हज़ारों की संख्या में लोग श्री बदरीनाथ तीर्थ के दर्शन के लिए पहुँचा करेंगे। अतः बदरीनाथ तीर्थ में जो समस्या आज विद्यमान है, लगभग वही समस्या 1930 के दशक में भी थी, क्योंकि उनके अनुसार किसी थर्डक्लास वेटिंग रूम के बुकिंग ऑफिस के सामने इतनी भीड़ नहीं होती होगी, जितनी वर्ष 1933 में बदरीनाथ तीर्थ के मुख्यद्वार के सामने थी। उस दौर में भी मन्दिर में जगह कम होने के कारण सभी श्रद्धालु एक साथ अंदर नहीं जा पाते थे। अतः जो दल एक साथ आया होता था उन्हें एक साथ दर्शन के लिए भेजा जाता था और उन्हें 05 मिनट के लिए दर्शन का अवसर दिया जाता था। फिर उन्हें निकाल बाहर किया जाता था, जिसमें बल प्रयोग भी करना पड़ता था, क्योंकि अपनी इच्छानुसार से कोई भी श्रद्धालु बाहर नहीं आना चाहते थे, सभी श्रद्धालु भावुक और आँसुओं की धारा के साथ बाहर आते थे मन्दिर से दूर जाने के लिए कोई भी श्रद्धालु तैयार नहीं होते थे, मानो ऐसा लगता था जैसे किसी बेटा-बेटी को उन्हें उनके माँ-बाप से दूर कर रहे हों। अतः श्रद्धालुओं के भगवान बदरी विशाल से मिलने और बिछड़ने का दृश्य से आने-जाने वाले श्रद्धालुओं में संयोग-वियोग श्रृंगार को भरपूर देखा जा सकता था। उस दौरान मन्दिर व्यवस्था के लिए पंजाबी दरोगा श्री साधोराम वहाँ तैनात थे, क्योंकि 10 मार्च 1882 से बदरीनाथ धाम में पुलिस व्यवस्था नियत हो चुकी थी।

वर्ष 1831 में ‘बद्री यात्रा कथा’ नामक पुस्तक में अयोध्या नरेश बख्तावर सिंह की पत्नी सुदानी लिखती है कि बदरी यात्रा कथा निजकृत लिख्यते।
इस कथा को लिखने के पीछे सुदानी की भावना समस्त संसार के कल्याण की थी—-
तासु रानि सुषदानी जग, जात्रा कीन्ह उदार
हरद्वार की मगकथा, वरनी हित संसार
जय बदरी विशाल

बटोही फिर यह मीठी तान
फिर न मिलेगा सुनने को यह मधुर मनोहर तान।
हिम की ऊंची चोटी पर उन किरणों का मुस्काना।
पर्वत के सुंदर प्रभात में चिड़ियों का यह गाना
धीरे-धीरे हो जायेंगे सारे स्वप्न समान।

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