हेमकुंड साहिब के कपाट शीतकाल के लिए हुए बंद – हेमकुंड साहिब की किसने और कैसे की खोज पढ़ें डॉ. दीपक सिंह कुंवर का खास लेख

हेमकुंड साहिब के कपाट शीतकाल के लिए हुए बंद –  हेमकुंड साहिब की किसने और कैसे की खोज पढ़ें डॉ. दीपक सिंह कुंवर का खास लेख
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वर्ष 1934 में खोजे गए ‘हेमकुण्ड साहिब’ के कपाट आज हुए श्रद्धालुओं के लिए बन्द

वाहेगुरुजी का खालसा
वाहेगुरुजी की फतह

पंजाब से आए विशेष बैंड की धुन के साथ आज गुरुग्रंथ साहिब को पंचप्यारों की अगुआई में दरबार साहिब से सचखण्ड साहिब के गर्भगृह में ले जाया गया। इस प्रकार ठीक डेढ़ बजे हेमकुण्ड साहिब के कपाट बंद कर दिए गए। विदित है कि इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते हेमकुंड साहिब और लोकपाल लक्ष्मण मंदिर के कपाट 18 सितंबर 2021 को खोले गए थे। इसके बावजूद भी 10,300 श्रद्धालु ने हेमकुण्ड साहिब में मत्था टेका।

हेमकुण्ड एक संस्कृत भाषा का शब्द है, जो हेम+कुण्ड से बना है। हेम का अर्थ है ‘बर्फ’ और कुण्ड का अर्थ ‘कटोरा’ अथार्त बर्फ का कटोरा, जिसे अमृत सरोवर यानी अमृतम् तालाब और लोकपाल भी कहा जाता है। यह कुंड 400× 200 गज लम्बा व चौड़ा है। सिक्ख धर्म का यह पवित्र तीर्थ स्थल उत्तराखंड के चमोली जनपद के बदरीनाथ तीर्थमार्ग के गोविंदघाट में सप्तपर्वतों के मध्य स्थित है, जो सिक्ख धर्म की एकता का प्रतीक माना जाता है। करीब 8 महीने बर्फ की चादर में लिपटे रहने वाले इस स्थल पर एक भव्य गुरुद्वारा, तारों यानि स्टार के आकार का बना हुआ है, जिसके पास में ही लक्ष्मण जी का सुंदर मंदिर अवस्थित है। यहाँ के देवता व रक्षक ‘लोकपाल महादेव’ को माना जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि लक्ष्मण जी को ही यहाँ ‘लोकपाल’ कहते हैं। इसलिए भी पुराणों में यह तीर्थ ‘लोकपाल’ के नाम से वर्णित है। ‘हेमकुण्ड साहिब’ का गुरुद्वारा दो मंजिला है, जिसे देखने पर इसका आकार कमल के उल्टे फूल की तरह लगता है। इस गुरुद्वारे का निर्माण सिक्ख श्री सोहन सिंह जी द्वारा किया गया था, जो बाद में महान सिक्ख सन्त श्री सोहन सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुए थे।

 

20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में गुरुग्रन्थ साहिब को पढ़ने के शौकीन रहे सिक्ख फौजी श्री सोहन सिंह के हाथों अचानक सिक्खों के 10वें गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित पुस्तक ‘विचित्र नाटक’ हाथ लगी, जिसमें गुरु गोविंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म का उल्लेख किया था। उस दौर में सिक्ख सोहन सिंह उस पुस्तक को पढ़कर बहुत विचलित व अधीर हो गये थे, तब उन्होंने ठान लिया था कि वह इस पुस्तक में वर्णित स्थल की खोज करके ही रहेंगे।

खालसा पंथ (1699ई0) के प्रवर्तक और सिक्ख धर्म के दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा ‘बछित्तर नाटक”/’विचित्र नाटक’ में अपने पूर्वजन्म के
स्थल का हवाला देते हुए लिखा है कि

“तप साधत जेही विधि मोहि जाना,
हेमकुण्ड पर्वत है जहाँ,
सप्तश्रृंग सोहत है वहाँ,
सप्तश्रृंग तेहि नाम कहाना,
पांडुराज जहाँ लोग कमावा,
तहँ हम अधिक तपस्या साधी,
“महाकाल”-‘कालिका’ अघारी।”
अथार्त:- हिमालय पर्वत की सप्तश्रृंग चोटी पर स्थित एक हेमकुण्ड तीर्थ पर सात मनोहारी चोटियों का मिलन होता है, जहाँ पांडवों के पिता पांडुराज ने महादेव का कठोर तप किया था, वहीं मैंने भी महाकाल और माँ कालिका भवानी की तपस्या की, आराधना की।

“विचित्र नाटक” में ही गुरु गोविंदसिंह जी ने आगे अपना अनुभव लिखा है कि… महाकाल की कठिन आराधना करने के पश्चात, जब मैं और महाकाल एकाकार हो गए, तब भोलेनाथ ने पृथ्वीलोक पर जाकर कल्याणकारी धर्म बनाने का आदेश दिया।

वाहेगुरू में आस्था है, तो
उलझनों में भी रास्ता है।

टिहरी गढ़वाल के रहने वाले एक सिक्ख फौजी सोहन सिंह ने गुरु गोविंदसिंह द्वारा रचित ‘विचित्र नाटक’ में बताये गए स्थान को खोजने का निश्चय करके वर्ष 1930 में घर से निकल गये थे। तत्पश्चात श्री सोहन सिंह जी ने अनेक धर्मग्रंथों का अध्ययन किया व बहुत से सिद्ध साधु-संतों से मिले, उत्तराखंड के कई चरवाहों, गड़रियों से गुरु गोविंदसिंह द्वारा लिखी आत्मकथा के मुताबिक पूर्व जन्म में लिखे स्थान की जानकारी ली।

तुम दया करो मेरे साईं …..
विन वोलया सब किछ जानदा…

फौजी सोहन सिंह को विश्वास था कि एक दिन यह स्थल जरूर मिलेगा। वाहेगुरू बोलता नहीं है पर जानता सब कुछ है। फौजी चुप रहकर बहुत समय तक हिमालय के जंगलों में भूखे-प्यासे, अकेले भटकते रहे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और उनकी नजर हमेशा हिमालय पर्वत की श्रृंखलाओं में उन सात शिखरों को ढूंढती रहीं, जिनका उल्लेख गुरु गोविंदसिंह जी ने अपनी आत्मकथा ‘विचित्र नाटक” में किया था। घूमते-घूमते एक बार साधुओं के काफिले के साथ सिक्ख फौजी श्री सोहनसिंह जी पांडुकेश्वर नामक शिवालय पर पहुंच गये। रात्रि में एक चर्चा के दौरान कुछ सन्तों ने बताया कि यह वही स्थल है, जहाँ पांडवों के पिता राजा पांडु ने महाकाल यानि भोलेनाथ का घनघोर तप किया था।

क्यों आ कर रो रहा है-गोविंद की गली में,
हर दर्द की दवा है-गोविंद की गली में…..

सिक्ख श्री सोहन सिंह की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वाहेगुरुजी का स्मरण करते हुए, वह सोचने
लगे कि इतने समय तक भटका-भटकाकर हे! महादेव तुमने मुझे मेरे गुरु तीर्थ पर पहुंचाया, सच्चे पादशाह से मिलवाया। उस स्थल पर पहुंचने के पश्चात उन्हें लगा कि वर्षों की खोज के बाद आज वे कामयाब हो गए, उनके चेहरे पर रोनक आ गई। साधुओं के सत्संग को छोड़कर वे, बाहर आकर देखने लगे कि सप्तश्रृंग पर्वत किस ओर है। किंतु बर्फीली घाटी में शाम के वक्त चारों तरफ घना अंधकार होने से कुछ नहीं सूझा। मन-मसोसकर वह सुबह होने का इंतजार करने लगे।

तेरा नाम न जपया मैं अभागा….

पूरी रात वाहेगुरुजी को याद करते हुए काटी। उनकी आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। सुबह जैसे ही अंधकार की काली चादर हटी, तो सोहनसिंह ने चारों दिशाओं में निगाह दौड़ाई। सात शिखरों का मिलन होते उन्हें कहीं नहीं दिख रहा था। बहुत खोजबीन के बाद उनकी नजर लोगों के एक झुंड पर पड़ी, जो कतार बनाकर पहाड़ियों की पगडंडी पर चले जा रहे थे। सोहन सिंह ने एक साधु से उन लोगों के बारे में जानना चाहा,
तो पता चला कि तीर्थयात्रियों का यह समूह “लोकपाल”
के दर्शनार्थ जा रहै हैं। अतः सोहन सिंह जी भी उनके साथ शामिल हो गए। लोकपाल पहुंचकर जब काफिला रुका, तो शाम हो चली थी। अचानक उन्हें सात शिखरों का मिलन होते दिखा। आखिर लगा कि उन्होंने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया।

यात्री वहां स्नान कर रहे थे और सोहन सिंह जल में पड़ते सप्तश्रृंग के प्रतिबिम्ब को देखकर अभिभूत हो उठे। पता लगा कि यही लोकपाल तीर्थ, वही हेमकुण्ड साहिब है, जिसकी चर्चा गुरु गोबिंदसिंह जी ने अपनी किताब में की है। यही उनका पूर्व जन्म का साधना स्थल था। इस प्रकार वर्ष 1934 में श्री सोहन सिंह ने हेमकुण्ड साहिब को खोज निकाला।
सन्त श्री सोहन सिंह जी इस हेमकुण्ड साहिब गुरुद्वारे के निर्माण के लिए पंजाब के सभी गांवो में घूमकर चंदा एकत्रित किया, लेकिन उस छोटी सी रकम से कुछ नहीं होना था। अतः वे बहुत व्यथित होकर बैठे थे, कि अचानक उनकी मुलाकात अमृतसर के भाई वीरसिंह जी से हुई। तत्पश्चात उन्होंने अपनी पूरी कथा व व्यथा उन्हें सुनाई, तो वीरसिंह बहुत भाव-विभोर होकर इस पुनीत कार्य के लिए अपना सब कुछ दान कर दिया, जिसके कारण हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा बनकर तैयार हो गया।

सन 1936 में एक 10×10 का एक कमरा तैयार बनकर तैयार हुआ, जिस कमरे में गुरुग्रन्थ साहिब का पाठ शुरू किया गया। अतः वर्ष 1937 में वहां पहले ‘प्रकाश दिवस’ मनाया गया। तत्पश्चात गुरु ग्रन्थ साहिब की स्थापना की गई। वर्ष 1939 में सोहन सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले हेमकुण्ड के विकास का काम जारी रखने के मिशन को श्री मोहन सिंह को सौंपा था। हेमकुण्ड में पहली संरचना मोहन सिंह द्वारा ही निर्मित कराई गई थी। वर्ष 1960 में अपनी मृत्यु से पहले मोहन सिंह ने एक सात सदस्यीय कमेटी बनाकर इस तीर्थ यात्रा के संचालन की निगरानी कमेटी को दे दी। आज गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब के अलावा हरिद्वार, ऋषिकेश, श्रीनगर, जोशीमठ, गोविंद घाट आदि गुरुद्वारों में सभी तीर्थयात्रियों के लिए भोजन और आवास उपलब्ध कराने का प्रबंधन इसी कमेटी द्वारा किया जाता है।
हेमकुण्ड साहिब में तीर्थयात्रियों की संख्या के आंकड़े–
1975 में 5,630
1976 में 5,869
1977 में 10,359
1978 में 11,108 इनमें से 61 विदेशी थे।
1979 में 14,640 इनमें से 180 विदेशी थे।
1980 में 25,609 इनमें से 171 विदेशी थे।
1981 में 24,309 इनमें से 120 विदेशी थे।

पं0 डॉ तारासिंह नरोत्तम जी हेमकुंड की भौगोलिक स्थिति का पता लगाने वाले पहले सिक्ख थे। 1884 में प्रकाशित ग्रन्थ अपने ग्रन्थ श्री गुड़ तीरथ संग्रह में इस तीर्थ की महिमा का विस्तार से वर्णन किया है। इस पुस्तक में करीब 508 दुर्लभ गुरुद्वारा तीर्थो के बारे में लिखा है।
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोविंद
गुरु मेरा परब्रह्म, गुरु भगवंता

मेघनाथ के वध के पश्चात पाप शमन के लिए लक्ष्मण ने हेमकुंड नामक स्थल पर ही तपस्या की थी, जो तपस्या लक्ष्मण जी ने यहाँ शेषनाग के रूप में की थी। इसी कारण लोकपाल/ अमृत तालाब के सम्मुख आज भी लक्ष्मण जी का मंदिर अवस्थित है। हरिवंश पुराण एवं स्कन्द पुराण के केदारखंड में उल्लेख है कि लक्ष्मणजी ने यहां दशानन रावण से शिवदर्शन ज्ञान लेकर “लोकपाल महादेव” की तपस्या कर शेषनाग के दर्शन किये थे, जिस लक्ष्मण जी को बाल्मीकि रामायण में शेषनाग का अवतार बताया गया है।

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