मेरे प्रिय गुरु राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती पर शत्-शत् नमन् – डॉ.दीपक सिंह

मेरे प्रिय गुरु राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती पर शत्-शत् नमन् – डॉ.दीपक सिंह
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मेरे प्रिय गुरु राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती पर शत्-शत् नमन्

भले ही मेरे जीवन पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की अहम भूमिका व छाप है, लेकिन मेरे जीवन में हिंदी साहित्य का प्रवेश अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान दिनकर जी हुई थी। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान सबसे पहले दिनकर जी को सुना था। वह भी तब, जब परीक्षा में सूरज का पयार्यवाची शब्द पूछा गया था तब मैंने परीक्षा में सूर्य, रवि और ‘दिनकर’ लिखा था। मुझे आज भी याद है जब चौथा पाठ पढ़ाने से पहले मेरे गुरु जी ने बताया कि आज की कविता जो हम पढ़ेंगे, वह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के द्वारा लिखी गयी है। गुरुजी द्वारा कुछ पंक्ति पढ़ाने के बाद मैंने गुरु जी से पूछ लिया था कि इन्होंने अपने नाम के आगे एक अतिरिक्त शब्द ‘दिनकर’ क्यों जोड़ लिया था? क्योंकि मैं ‘दिनकर’ शब्द को सूर्य के पर्यायवाची के रूप में ही देख रहा था। तब मेरे गुरु जी एक साधारण सा ज़वाब दिया था कि उनकी रचनाएँ सूर्य की भाँति ओजपूर्ण होती है। ये जो भी लिखते है सूर्य के ताप/तपन को टक्कर दे देते हैं। इतना सुनकर मैं उत्साहित हो गया और आगे कुछ और सोच पाता कि गुरु जी ने मुझे खड़ा होकर कविता पाठन करने की जिम्मेदारी सौंप दी। पंक्ति थी–
“रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।”
सिर्फ उक्त लिखी गई पँक्तियों को ही पढ़ी थी मैंने कि मुझे सच में लगा कि जैसे मैं सूर्य के ताप/तपन के सामने खड़ा होकर इन पंक्तियों के साथ सूर्य को ही चुनौती दे रहा हूँ। मेरे लिए यह पहला अनुभव था कि कवि रात के चाँद से भी बातें कर सकता है। कविता के अंत में जाते-जाते पता ही नहीं चला कि कब मेरी आवाज़ एक वीर सैनिक की तरफ तेज़ हो गयी और जब कविता समाप्त हुई तो सारी कक्षा शान्त थी, तालियां बज रही थी जैसे मैंने अनजाने में ही सही वीर रस की कविता पढ़ी हो। ये वही दिन था, जब मैं दिनकर से भावपूर्ण जुड़ गया था। फिर मैं दिनकर के बारे में और जानने के लिए उत्सुक हो चला था, लेकिन जब मैंने बड़े भाई साहब की हिंदी की पुस्तक उठाई तो खुशी चार गुनी बढ़ गई, क्योंकि मैंने उस पुस्तक में दिनकर जी की कविता देखी, लिखा था ‘रश्मिरथी’ खण्ड 5, पंक्ति थी–
हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ?
कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ?
धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान?
जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान?

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। रामधारी सिंह दिनकर हिंदी जगत के वो निर्भीक कवि और लेखक रहे है, जिनकी लेखनी देश के शत्रुओं के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री तक पर चली। वर्ष 1962 के युद्ध हार के दौरान जो क्रोध इनकी कवितों में दिखाई देता हैं वो तो देखते ही बनता हैं। इन्होंने उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भैंसा तक कह दिया था। नेहरू की नीतियों की का विरोध करने से भी वे नहीं चुके। दिनकर ने लिखा कि–
देखने में देवता सदृश्य लगता है
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो
समझो उसी ने हमें मारा है॥
एक किस्सा 20 जून 1962 का है, जब उस दिन दिनकर राज्यसभा में खड़े हुए और हिंदी के अपमान को लेकर बहुत सख्त स्वर में बोले तो उन्होंने कहा-
देश में जब भी हिंदी को लेकर कोई बात होती है, तो देश के नेतागण ही नहीं बल्कि कथित बुद्धिजीवी भी हिंदी वालों को अपशब्द कहे बिना आगे नहीं बढ़ते। पता नहीं इस परिपाटी का आरम्भ किसने किया है, लेकिन मेरा ख्याल है कि इस परिपाटी को प्रेरणा प्रधानमंत्री जी से मिली है। पता नहीं, तेरह भाषाओं की क्या किस्मत है कि प्रधानमंत्री ने उनके बारे में कभी कुछ नहीं कहा, किन्तु हिंदी के बारे में उन्होंने आज तक कोई अच्छी बात नहीं कही। मैं और मेरे देशवासी पूछना चाहते हैं कि क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया था ताकि सोलह करोड़ हिंदीभाषियों को रोज अपशब्द सुनाएं दें? क्या आपको पता भी है कि इसका दुष्परिणाम कितना भयावह होगा? यह सुनकर पूरी सभा सन्न रह गई थी। ठसाठस भरी सभा में भी गहरा सन्नाटा छा गया। यहाँ मुर्दा-चुप्पी तोड़ते हुए दिनकर ने फिर कहा- ‘मैं इस सभा और खासकर प्रधानमंत्री नेहरू से कहना चाहता हूं कि हिंदी की निंदा करना बंद किया जाए। हिंदी की निंदा से इस देश की आत्मा को गहरी चोट पहंचती है।’


दिनकर को राष्ट्रकवि के नाम से जाना जाता हैं। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। दिनकर ने कई सारी कविताएं लिखी हैं, जो पूरे हिंदी साहित्य में बहुत ही बेहतरीन कविताओं में गिनी जाती है। चांद का कुर्ता दिनकर साहब की सबसे अच्छी बाल कविताओं में गिनी जाती है। ये कविता आज इतने सालों बाद भी लोग खूब पढ़ते हैं, जिसकी पंक्ति–

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,
‘‘सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।
सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।’’
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।
घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।
अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएँ,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?’’

कृष्ण की चेतावनी, ‘रश्मिरथी’ का सबसे बेहतरीन प्रसंग हैं। ये कविता दिनकर की बेहतरीन कविताओं में से एक है, जिसका एक छोटा सा अंश यहाँ पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं….


वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।
मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।
दिनकर की कविता ‘कोई अर्थ नहीं’ की पंक्तियां–
नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

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