सड़क किनारे कूड़े का ढेर ✍️✍️✍️ – डॉ. दीपक सिंह कुंवर

सड़क किनारे कूड़े का ढेर ✍️✍️✍️ – डॉ. दीपक सिंह कुंवर
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“सड़क किनारे कूड़े का ढेर”✍️✍️✍️🙏

शहरों में संभ्रांत वर्ग के लोग आते हैं।
और सड़क किनारे कूड़ा फेंककर चले जाते हैं।।

कूड़े का छोटा सा ढेर,
आए दिन पहाड़ की शक्ल ले रहा है।
इसलिए आस-पास से गुजरते,
संभ्रांत वर्ग के लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं।।

तब एक योद्धा कंधे पर झाडू रखे,
इस पहाड़ की तरफ बढ़ता है।
योद्धा बिना नाक-भौं सिकोड़े कूद जाता है,
कूड़े के मैदान में।।

और पल में धराशायी कर देता है, कूड़े के पहाड़ को।
और गाड़ी में भर के शहर से दूर ले जाता है कूड़े को।।

पर तालियों और वाहवाही के बजाय,
उसे मिलती है गालियाँ, अपमान और अछूत की संज्ञा।
योद्धा पेट के खातिर आये दिन,
ऐसे ही न जाने कितने कूड़े के पहाड़ों से करता है युद्ध।।

और विजयी होने पर उसे मिलती है गालियाँ, अपमान और अछूत की संज्ञा।
अतः ऐ संभ्रांत वर्ग के लोगों याद रखना,
जिस दिन आत्मसम्मान की भूख हाबी होगी पेट की भूख पर।।

उस दिन योद्धा कर देगा विद्रोह,
और तब कूड़े का छोटा सा ढेर पहाड़ की शक्ल लेगा।
लेकिन पहाड़ को धराशायी करने,
योद्धा नहीं कूदेगा मैदान में।।

पेट की भूख से मारा जाएगा योद्धा।
और योद्धा के मरते ही मर जायेंगे संभ्रांत लोग।।

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