शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की पुण्यतिथि पर ‘नूरानांग डे’ की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं..💐💐🙏❤️

शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की पुण्यतिथि पर ‘नूरानांग डे’ की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं..💐💐🙏❤️
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           पौड़ी जिले के बीरोंखाल ब्लॉक के ग्राम बांड़ियू में जन्मे जसवंत सिंह रावत 19 वर्ष की आयु में 19 अगस्त 1960 को गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए। 14 सितंबर 1961 को ट्रेनिंग पूरी होने के बाद अरुणाचल प्रदेश में चीन सीमा पर तैनाती मिली। 17 नवंबर 1962 को चौथी बटालियन की यूनिट को नूरानांग ब्रिज की सुरक्षा के लिए वहां तैनात किया गया। इस बीच चीनी फौज वहां तक पहुंच चुकी थी, जिसका राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ने अपने दो साथियों लांसनायक त्रिलोक सिंह व राइफलमैन गोपाल सिंह के साथ डटकर मुकाबला किया। लेकिन, चीनी सैनिकों की भारी उनके दोनों साथी शहीद हो गए। युद्ध में तीन अधिकारी, पांच जेसीओ, 148 अन्य पद व सात गैर लड़ाकू सैनिक मारे गए, फिर भी चौथी बटालियन के शेष जवानों ने दुश्मन को आगे नहीं बढ़ने दिया। 20 नवंबर 1962 को चीन ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी।

       राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ने जिस तरह युद्ध में अदम्य साहस एवं वीरता का परिचय दिया, उसे देख चीनी सैनिक भी भौचक्के रह गए। उन्होंने राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की पार्थिव देह को सलामी देकर उनकी एक कांसे की प्रतिमा भी भारतीय सेना को भेंट की।

             राइफलमैन जसवंत सिंह रावत को शहीद हुए भले ही 59 वर्ष गुजर चुके हों, लेकिन भारतीय फौज का विश्वास है कि उनकी आत्मा आज भी देश की रक्षा के लिए सक्रिय है। वह सीमा पर सेना की निगरानी करती है और ड्यूटी में जरा भी ढील होने पर जवानों को चौकन्ना कर देती है। सेना ने जसवंत सिंह की स्मृति में अरुणाचल प्रदेश की नूरानांग पोस्ट पर एक स्मारक का निर्माण किया है, जो जवानों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है। ये वही पोस्ट है, जहां जसवंत सिंह ने शहादत दी थी। भारतीय सेना इस जांबाज को ‘बाबा जसंवत’ के नाम से सम्मान देती है, जिस पोस्ट पर बाबा जसवंत सिंह रावत शहीद हुए थे, भारत सरकार ने उसे ‘जसवंत गढ़’ नाम दिया है।

              देश के खातिर शहीद हो चुके जसवंत के जूतों पर जसवंत गढ़ में ही रोजाना पॉलिश की जाती है और पहनने-बिछाने के कपड़े प्रेस किए जाते हैं। इस काम के लिए सिक्ख रेजीमेंट के पांच जवान तैनात किए गए हैं।यही नहीं, रोज सुबह और रात की पहली थाली जसवंत की प्रतिमा के सामने परोसी जाती है। बताया जाता है कि सुबह-सुबह जब चादर और अन्य कपड़ों को देखा जाए तो उनमें सिलवटें नजर आती हैं। वहीं, पॉलिश के बावजूद जूतों बदरंग हो जाते हैं।

               जसवंत सिंह रावत भारतीय सेना के अकेले सैनिक हैं, जिन्हें मौत के बाद प्रमोशन मिलना शुरू हुआ था। पहले नायक फिर कैप्टन और अब वह मेजर जनरल के पद पर पहुंच चुके हैं। उनके परिवार वालों को पूरी सैलरी पहुंचाई जाती है। घर में शादी या धार्मिक कार्यक्रमों के अवसरों पर परिवार वालों को जब जरूरत होती है, तब उनकी तरफ से छुट्टी की एप्लिकेशन दी जाती है और मंजूरी मिलते ही सेना के जवान उनके तस्वीर को पूरे सैनिक सम्मान के साथ उनके उत्तराखंड के पुश्तैनी गांव ले जाते हैं। वहीं, छुट्टी समाप्त होते ही उस तस्वीर को ससम्मान वापस उसी स्थान पर ले जाया जाता है।

        जसवंत सिंह रावत की स्मृति में गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट के मुख्यालय (लैंसडौन) में भी ‘जसवंत द्वार’ बनाया गया है।

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