मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि – डॉ. दीपक सिंह कुंवर

मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि – डॉ. दीपक सिंह कुंवर
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‘मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि’

“विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला।” 🙏🙏🙏

आज 08 अक्टूबर हिंदी कथा उपन्यास के सबसे सशक्त स्तम्भ मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि, जिन्होंने हिंदी कथा-साहित्य को तिलस्मी कहानियों के झुरमुट से निकालकर जीवन के यथार्थ की ओर मोड़ा व आम जन की पीड़ा को शब्दों में पिरोया, यही वजह है कि उनकी हर रचना कालजयी है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यासों से मानव जीवन की बारीकियों और संघर्षों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। उनकी कालजयी रचनाएँ सदैव हमें सामाजिक हितों के लिए प्रेरित करती रहेंगी।
यदि हमनें भारतीय साहित्य को पढा और प्रेमचंद से अछूते रहे तो इसका मतलब वैसे ही हुआ जैसे हम समुद्र-तट तक गए और पानी ही न देखा, क्योंकि प्रेमचंद साहित्य की धारा के वे रस हैं, जिनके बिना उसके पान में कोई स्वाद नहीं रह जाता है।

प्रेमचंद कहते हैं कि- “साहित्य को समाज का दर्पण ही नहीं बल्कि मशाला भी होना चाहिए।”

गोदान, गबन, निर्मला, कर्मभूमि, मानसरोवर जैसी किताबें देने वाले प्रेमचंद न सिर्फ़ हिंदी बल्कि उर्दू में भी लेखन कार्य किया है। ऐसे महान व्यक्तित्व सदैव समाज के उत्थान और प्रगति की ही सोचते हैं। आज के विशेष दिन पर उनके चाहने वाले उन्हें (प्रेमचंद) पढ़े, उनके धनपतराय से प्रेमचंद हो जाने की कहानी को जाने, अभावों के बीच उनके संघर्ष को सोचें तथा अपने समय से जूझते उनके क्रांतिकारी तेवर को समझे। सम्भवतः यही उनके चाहने वालों की तरफ से उन्हें सच्ची श्रंद्धाजलि होगी।

जब हम प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ते हैं तो उनकी कहानियों में जो दुःख दिखता है। दरअसल वे सभी दुःख उनके निजी जीवन से सम्बंधित है। अतः हम पाते हैं कि प्रेमचंद का दर्शन स्वदर्शन है।
जब 08 साल की उम्र में प्रेमचंद जी की माँ चल बसी थी तो उन्होंने इस आधार पर ‘दूध के दाँत’ कहानी लिखी, जिस कहानी में मंगल नामक मातृहीन बालक का वर्णन किया गया है। इस कहानी को पढ़ने से ज्ञात होता है कि वो मंगल बालक स्वयं में प्रेमचंद जी है, क्योंकि प्रेमचंद ने एक जगह पर लिखा है कि–“दुनिया में सबसे बड़ा दुःख किसी बच्चे का माँ के बिना होना है।”

प्रेमचंद ने बेरोजगारी बहुत देखी, जब उनकी शादी 15 साल की उम्र में हो जाती है। तब जीवन में जहाँ श्रृंगार रस उत्पन्न होना था, वहाँ भयानक रस उत्पन्न हो जाता है, जिस कारण विवाह सम्बंध शून्य हो जाता है। इसलिए अनमेल/बेमेल विवाह प्रेमचंद के साहित्य की सबसे बड़ी समस्या है। अतः प्रेमचंद की हर रचना में अनमेल विवाह का जिक्र मिलता है।
तब प्रेमचंद ने फिर शादी करने की सोची पर सोचा कि अब शादी करूँगा तो बाल विधवा से ही करूँगा, क्योंकि प्रेमचंद अपनी रचना ‘प्रेमा’ में पहले ही बाल विधवा विवाह का समर्थन कर चुके थे। अंत में शिवरानी देवी से विवाह किया। इसलिए उनकी रचना ‘गोदान’ में झुनिया और गोबर का विवाह पढ़ेंगे तो वहाँ भी प्रेमचंद नज़र आयेंगे।

प्रेमचंद लमही नामक देहात गाँव के रहने वाले थे, जहाँ बचपन में उनका प्रिय खेल गुली-डंडा था, जिस कारण प्रेमचंद ‘गुली-डंडा’ नामक कहानी लिखते हैं, जिस कहानी में हम मुख्य किरदार के रूप में स्वयं प्रेमचंद को ही पढ़ेंगे। गुली-डंडा खेलते-खेलते प्रेमचंद शिक्षा विभाग में इंस्टेक्टर के पद पर नियुक्त होते हैं तो प्रेमचंद कहानी लिखते ‘मैं और गया’ यहाँ भी जो मैं का किरदार है, वह स्वयं प्रेमचंद जी का है।
अतः प्रेमचंद के ज्यादा से ज्यादा साहित्य में वे खुद ही बैठें हैं। प्रेमचंद गाँव के रहने वाले थे, जिस कारण से गाँव की समस्या, अपने जीवन की समस्या, आर्थिक समस्या उनके सम्पूर्ण साहित्य के केंद्र में है।
इस प्रकार समाज के हर हिस्से में पड़े उपेक्षित लोहे को अपने साहित्यिक स्पर्श से कंचन बना देने वाले तथा कौड़ियों से लेकर बेशकीमती मोतियों तक को एक धागे में पिरोकर साहित्य की सर्वप्रिय जयमाला बनाने वाले हिंदी कहानी के प्रतीक मुंशी प्रेमचंद को उनके पुण्यतिथि पर सादर प्रणाम/शत्-शत् नमन्
आप मेरे जैसे उन युवाओं के सिर की छत हो, जिनसे अक्सर पूछा जाता है कि साहित्य को पढ़कर क्या करोगे?? तब इतना जरूर है कि हम सभी आपका नाम लेकर इतरा सकते हैं

“दौलत से आदमी को जो सम्मान मिलता है वह उसका नहीं उसकी दौलत का सम्मान है।”–प्रेमचंद

एक सवाल क्या आप जानते हैं कि ‘मुंशी’ और ‘प्रेमचंद’ दो अलग-अलग व्यक्ति थे?

प्रेमचंद ने अपने नाम के आगे ‘मुंशी’ शब्द का इस्तेमाल खुद कभी नहीं किया। न किसी ख़त में इसका ज़िक्र मिलता है, न ही किसी समकालीन लेखकों के संस्मरणों में प्रेमचंद के साथ मुंशी शब्द का जिक्र है। साल 1935 की ‘हंस पत्रिका’ में वो अपने उपनाम ‘नवाबराय’ पर मजाक करते जरूर पढ़े गए। दरअसल बाद में उन्होंने ‘नवाबराय’ नाम भी छोड़ दिया था।
उस संस्मरण में एक किस्सा था, जब लेखक और उनके दोस्त सुदर्शन जी ने उनसे पूछा कि – “आपने ‘नवाबराय’ नाम क्यों छोड़ दिया ?” तो प्रेमचंद ने कहा “नवाब वह होता है, जिसके पास कोई मुल्क हो। हमारे पास मुल्क कहां?” सुदर्शन बोले “बे-मुल्क नवाब भी होते हैं” प्रेमचंद ने मुस्कुराकर जवाब दिया “यह कहानी नाम हो जाय तो बुरा नहीं, मगर अपने लिए यह घमंडपूर्ण है। चार पैसे पास नहीं और नाम नवाबराय। इस नवाबी से प्रेम भला, जिसमें ठंडक भी है और संतोष भी।

पर सवाल ये है कि जब प्रेमचंद ने अपने नाम के आगे कभी ‘मुंशी’ नहीं लगाया तो उनका नाम ‘मुंशी प्रेमचंद’ कैसे पड़ा। दरअसल इसकी वजह भी ‘हंस’पत्रिका है। हुआ यूं कि ‘मुंशी’ शब्द असल में ‘हंस’ के सह-संपादक कन्हैयालाल मुंशी के साथ लगता था। क्योंकि संपादक दोनों थे। इसलिए संपादको के नाम की जगह पर ‘मुंशी, प्रेमचंद’ लिखा जाता था। ये सिलसिला लंबा चला। कई बार ऐसा भी हुआ कि छपाई के दौरान ‘अल्पविराम’ न छपने के वजह से नाम ‘मुंशी प्रेमचंद’ छप जाता था। लगातार ऐसा छपने के बाद लोगो ने इसे एक ही नाम समझ लिया और इस तरह प्रेमचंद जी “मुंशी प्रेमचंद” हो गए। प्रेमचंद को पढ़ा जाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अगर ये महान कथा शिल्पी न होते तो शायद हम अपनी आत्मा से इतना कभी न जुड़ पाते। इसलिए नमन् उपन्यास सम्राट, नमन् बाबू नवाबराय, नमन् धनपतराय श्रीवास्तव, नमन् मुंशी प्रेमचंद।

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