परदेस में रह रहे रहवासियों के लिए पहाड़ से एक संदेश – डॉ.दीपक सिंह

परदेस में रह रहे रहवासियों के लिए पहाड़ से एक संदेश – डॉ.दीपक सिंह
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परदेस में रह रहे रहवासियों के लिए पहाड़ से एक संदेश

गढ़वाली फ़िल्म ‘बोल दियां ऊमा’ में वियोग से सिंचित एक भावुक क्षण तब दृष्टांत होता है, जब ‘कमला’ अपने परदेस में रह रहे पति के लिए नायक ‘बद्री’ से संदेश के माध्यम कहती है कि- “उन्हें कह देना कि मैं इंतजार कर लूंगी, लेकिन उम्र तो इंतजार नहीं करती है। अगर वो इस साल भी घर नहीं आए तो मैं यमुना नदी में कूद जाऊंगी”। अतः गढ़वाली फ़िल्म ‘बोल दियां ऊमा’ के इस दृश्य को देखकर व सुनकर परदेस में रह रहे रहवासियों के लिए पहाड़ से कविता के माध्यम से एक संदेश…


लौटना
जैसे चैत में लौटता है बुराँश..
फागुन में लौटती है बर्फ..
श्रावण में लौटती है वर्षा..
लौटना ऐसे जैसे घर लौट रहे हो प्रवासी पक्षी..
लौटना
जैसे धार से लौटता है सूरज..
पूर्णिमा में लौटता है चाँद..
लौटना ऐसे जैसे चरागाहों से लौटते हैं मवेशी…
लौटना
ऐसे जैसे वर्षों पहले लिखी हुई कोई पंक्ति
आती है अचानक याद….
जैसे डायरी में मिल जाए
वर्षों पहले रखा कोई सूखा गुलाब…
लौटना
ऐसे जैसे फ़ाग में लौटता है फगुनाहट
ह्यून्द में लौटता है ह्यूनाल
ऐसे नहीं लौटना
जैसे कुछ दिन के लिए आए हो….
लौटना
ऐसे जैसे कहीं गए ही नहीं थे…

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