कार्तिकमास की शुभ संध्या पर गोपीनाथ की पावन भूमि में सजी ‘बांछा की बगिया’

कार्तिकमास की शुभ संध्या पर गोपीनाथ की पावन भूमि में सजी ‘बांछा की बगिया’
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पिछले कुछ दिन पूर्व (01नवम्बर 2021) राजकीय इंटर कॉलेज गोपेश्वर के सभागार में ‘अक्षत् नाट्य संस्था’ द्वारा मनोज मित्र द्वारा बंगाली मूल में कृत नाटक ‘बगिया बांछाराम की’ का सफल मंचन किया गया, जिस नाटक का अनुवाद हिंदी में सांत्वना निगम द्वारा ‘बूढ़ा मर गया’ के नाम से किया गया है।
‘बगिया बाँचाराम की’ नाटक को रा० इ० कॉलेज के सभागार में उपस्थित सभी दर्शकों की भरपूर सराहना प्राप्त हुई। इस नाटक के निर्देशक श्रीमान् विजय वशिष्ठ जी द्वारा कलाकारों की स्वाभाविक संवाद, अदायगी एवं अभिनय को बड़ी कुशलता के साथ मंच पर अभिनीत कराया गया। इस नाटक को आकर्षक एवं तत्कालीन देशकाल व परिस्थितियों के अनुसार ढालकर प्रभावशाली बनाने में मंच निर्माण की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिस मंच निर्माण में बाँछा की बगिया व नौकोड़ी का महल नाटक को वास्तविक बनाने में पूर्ण रूप से सफल कारगार साबित हुए। इस प्रकार ‘अक्षत् नाट्य संस्था’ की यह प्रस्तुति रंगमंच की आधुनिकता एवं समृद्धशाली रूप को प्रदर्शित करती है।


संपूर्ण नाटक की सफलता का आंकलन दर्शकों के ठहाकों एवं तालियों की गड़गड़ाहट से लगाया जा सकता है।
यह नाटक बाँछाराम नाम के एक गरीब किसान के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसकी सजी-सजाई बगिया को गाँव का जमींदार नौकोड़ी अपने कब्जे में करना चाहता है। इसलिए नौकोड़ी, बांछाराम को हर बार किश्तों का लालच देकर कहता है कि तुम्हारे जिंदा रहने तक लालन-पालन एवं दवा-दारू सब कुछ की जिम्मेदारी मैं लूँगा। अतः आपके (बांछा के) मरने के बाद संपूर्ण बगिया पर मेरा मालिकाना हक होगा। इस नाटक में जमींदार नौकोड़ी समझता कि वृद्ध किसान बांछाराम साल-छः महीने में मर जायेगा, लेकिन होता इसके विपरीत की बांछा स्वस्थ हो जाता और नौकोड़ी जमींदार मर जाता है।

इस नाटक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वालों में
विजय वशिष्ठ-बांछाराम, कुलदीप करासी-नौकोड़ी, मोहित कोठियाल-गोपी, उपेंद्र भण्डारी-लोटन व छोटन, चन्द्रप्रभा करासी-मालकिन, दीवान सिंह नेगी-पंडित जी, आयुष वशिष्ठ-मुख्तार, अविनाश यादव-छेकौड़ी, धीरज राणा-गोविंद व चोर तथा कलावती-पद्मा के किरदार में दिखाई दिए जबकि आयुष रावत-ग्रामीण युवक की भूमिका में व नाटक के बैक स्टेज में अमृता ठाकुर-ध्वनि प्रवाह और पूजा डुंगरियाल-मंच सामग्री की भूमिका में थे।

‘अक्षत् नाट्य संस्था’ के निर्देशक श्रीमान् विजय वशिष्ठ जी के अनुसार- “इस नाटक के सफल मंचन का श्रेय कलाकारों के कठिन परिश्रम व रंगमंच के प्रति कलाकारों के पूर्ण समर्पण की भावनाओं को जाता है।”
कुलदीप करासी जी के अनुसार- “जब भी ‘अक्षत् नाट्य संस्था’ की ओर से कोई भी नाटक नगर के अंतर्गत मंचित किया जाता है तो उस नगर के सभी बुद्धजीवियों, साहित्यकारों, विद्यार्थियों व व्यापारियों को अपनी पूर्ण भागीदारी देनी चाहिए। तभी इस विधा को नगर के अंतर्गत जीवित रखा जा सकता है।”

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