शहरों में पर्यावरण दिवस मनाने से क्या होगा, जब जंगल ही रेगिस्तान में बदल रहे हो????

शहरों में पर्यावरण दिवस मनाने से क्या होगा, जब जंगल ही रेगिस्तान में बदल रहे हो????
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शहरों में पर्यावरण दिवस मनाने से क्या होगा, जब जंगल ही रेगिस्तान में बदल रहे हो????

      गोपेश्वर। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कभी प्राकृतिक कारणों से जंगलों में आग लगती है, तो कभी अपने निहित स्वार्थों के कारण जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है। पहाड़ के जंगलों में हमेशा गर्मियों में आग लगती है।

            पहाड़ की सड़कें हों गांव के रास्ते, सभी कहीं ना कहीं जंगलों से जुड़े हैं और ऐसे में कई बार राह चलते राहगीर बीड़ी या सिगरेट पीते समय बिना ध्यान दिए माचिस की अधजली तिल्ली या अधजली सिगरेट बीड़ी को बिना ध्यान दिए ही फेंक देते हैँ और यही कई बार आग की सबसे मुख्य वजह बन जाती है, क्योंकि गर्मियों में हर जगह सूखे की स्थिति बनी होती है और अगर पिरूल में थोड़ी सी भी चिंगारी फैल जाए तो वो आग ऐसे ही पूरे जंगल में फैल जाती है, जिस पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है।


             दूसरा कारण, आजकल पहाड़ में लोग खेतों की सफाई के साथ-साथ घास के लिए अपनी बंजर पड़ी भूमि की भी सफाई करते हैं और उससे निकलने वाले कूड़े को एकत्र कर कुछ दिन सूखा कर आग लगा देते हैं, कई बार आग लगाने के समय तेज हवा चलती है, जिस कारण आग फैल जाती है और इतनी फैल जाती है कि वो जंगलों का रूख कर लेती है। एक जंगल दूसरे जंगल से जुड़े रहते हैं और हवा के साथ पिरूल होने के कारण आग और भयावह होते हुए कई जंगलों में फैल जाती है।

            आग से जंगलों का नुकसान होने के साथ-साथ वहां रहने वाले जंगली जानवरों को तो नुकसान होता है, जो कई बार रिहायशी क्षेत्रों में आ जाते हैं। हाल के वर्षों में जंगल में आग सुलगाने और उसे फैलाने वालों का एक गिरोह भी बन गया है। उसमें सरकारी मुलाजिम भी हैं और ग्रामवासी भी। इनके लिए आग एक जरूरत बन गई है, क्योंकि हर साल इसका एक बजट बनता है। फलस्वरूप आग रोकने के लिए उपकरण लिए जाते हैं, लोगों को अस्थायी नौकरी पर रखा जाता है। यह सब कागज पर ही होता है, क्योंकि आग लगने पर न इन उपकरणों का इस्तेमाल किसी ने देखा और न ही आग बुझाने को कोई आगे आये।


             सरकार और आम जनता नहीं जानती कि आग के प्रति इस बेरुखी से वे मानव जाति का कितना नुकसान कर रहे हैं। पहाड़ों में इस बार न कफुवा पक्षी का गान सुनाई दिया और न ही काफल पाको का गीत। न्योली यानी पहाड़ी कोयल भी अब अपने विरह गीत सुनाने को कोई और ठिकाना तलाश रही है। कितनी वनस्पतियां, औषधीय प्रजातियां खाक हो जाती हैं, कितने वनचर, नभचर अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं, इसका हिसाब नहीं लगाया जा सकता। पहाड़ के जलस्रोत सूख रहे हैं। तापमान लगातार बढ़ रहा है। भू-जल स्तर लगातार गिर रहा है, लेकिन हमारे नीति-नियंता अपनी राजनीति में व्यस्त हैं। शहरों में पर्यावरण दिवस मनाने से क्या होगा, जब जंगल ही रेगिस्तान में बदल रहे हो

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