सूबे में मर्यादा ‘पुरूषोत्तम श्रीराम” की मर्यादा शिथिलता की ओर….डॉ० दीपक कुँवर

सूबे में मर्यादा ‘पुरूषोत्तम श्रीराम” की मर्यादा शिथिलता की ओर….डॉ० दीपक कुँवर
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             राम के आदर्श त्याग, बलिदान व दयालु स्वभाव के लिए आज भी लोग उन्हें पूजते हैं, क्योंकि उन्होंने समस्त दुनिया को इंसानियत के रास्ते पर चलना सीखाया था। उनकी परम्परा ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाई पर बचन न जाई‘ पर टिकी है। देश के हर एक हिस्से में श्रीराम को ‘मर्यादा पुरूषोत्तम’ कहते हैं अर्थात वह मनुष्य जो मर्यादा बना सकता है, जिस मर्यादा की अन्तिम सीमा भगवान राम थे। ऐसा इसलिए भी क्योंकि राम, पुरूष में भी उत्तम थे और उनकी मर्यादा भी उत्तम थी। उन्होंने मानव मात्र के लिए ‘मर्यादा पालन’ का जो आदर्श प्रस्तुत किया था, वह संसार के इतिहास में कहीं और नहीं मिल सकता है।


                श्रीराम को हिन्दू धर्म में बहुत आस्था और निष्ठा के साथ भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में पूजा जाता है, लेकिन समय के बदलतेे स्वरूप के चलते राम की इतनी दयनीय स्थिति होगी, मैंने कभी ऐसा सोचा नहीं। प्रत्येक वर्ष अक्टूबर-नवम्बर माह आते ही सूबे के लगभग सभी क्षेत्र राम के नाम पर व्यापार करना शुरू कर देते हैं। अतः कालान्तर में लोगों के लिए कितना आसान सा रास्ता बन गया राम के नाम पर व्यापार करना। राम की लीला को लिखने वालों ने कभी नहीं सोचा होगा कि युग परिवर्तन के दौर में एक ऐसा दौर भी आयेगा, जब घर-गांवों, शहर-कस्बों में श्रीराम इतने सस्ते में बिकने लगेगा।

        एक प्रसंग राम भक्तों की व्यथा पर- अधिकांशतः देखा गया कि सूबे में मंचित होने वाली रामलीला के प्रत्येक दिन राम की लीला का मंचन सूबे के धनाढ़य लोगों को अतिथि के रूप में आमंत्रित कर की जाती है। रामलीला कमेटी के सदस्यों द्वारा स्मरण व आपसी बातचीत के माध्यम से तय कर लिया जाता है कि सूबे का कौन सा व्यक्ति पुरूषोत्तम राम के नाम पर आज सबसे ज्यादा पैसा देगा? तत्पश्चात उस धनाढ़य व्यक्ति को ही अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। सूबे की रामलीला में मुझे यह भी देखने को मिला कि कभी-कभार कुछ अतिथि राम के दरबार में आने से पूर्व शराब के नशे में दुत बने रहते हैं, जिससे वह अतिथि शराब के नशे से पूर्व श्रीराम भेंट जो देना चाहता था, वह अब नशे में श्रीराम भेंट उससे भी ज्यादा दे आता है और सम्भवतः राम लीला कमेटी भी यही आश लगाई होती है कि काश अतिथि आज कुछ ज्यादा राम भेंट दे जाए। ये स्मरण मेरा कुछ दिन पूर्व का है, जिसे मैंने अपने आँखों से देखा। इसके एवज में, मैंने कालांतर में होने वाली सूबे की रामलीला में आज तक न किसी ऐसे सज्जन गरीब को अतिथि के रूप में देखा और न सुना, जो अतिथि सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों के प्रति समर्पित रहा हो। वैसे अगर रामलीला के मंचन के लिए हमेशा अतिथि को आमंत्रित किया भी जाय तो किसी सामाजिक व्यक्ति/महिला या संस्कृति को संजोने वाले पुरोधा को आमंत्रित किया जाना चाहिए।

        मैं विगत कुछ वर्षों से यह भी देख रहा हूं कि राम की लीला में बुलाए गए अतिथियों में भी प्रतिस्पर्द्धा बनी हुई कि उसने राम भेंट इतना दिया तो मैं इतना दूंगा। इसीलिए तो आजकल राम भेंट में कोई 21 हजार तो कोई 51 हजार रूपये देकर अपने कद को बडा करने में लगे हैं। सूबे के बहुत से क्षेत्रों में राम के नाम पर इतना व्यवसायीकरण हो गया कि राम लीला कमेटी के लोग प्रत्येक दिन सरकारी और गैर सरकारी ऑफिसों में राम के नाम पर वसूली करते हुए भी देखे गये।

            मैं अपने बचपन के दिनों में राम के उन दरबारों में भी गया हूं, जहां रामलीला के प्रथम दिन के बाद अतिथि को रिबन काटने नहीं बुलाया जाता था और अतिथि उस दौर में दो शब्द सिर्फ राम के बारे में ही बताते थे न कि आजकल की तरह किसी विधायक-मंत्री को अतिथि के रूप में न्यौता देकर वह मंत्री राम के दरबार में अपने राजनीतिक पन्नों का बखान करने पर लगे रहते हैं। इस तरह कालांतर में मर्यादा पुरूषोत्तम राम के दरबार में ही मर्यादा खत्म होती दिख रही है। मुझे लगता है कि अगर कहीं भी राम की लीला मंचित होती है तो सिर्फ राम की ही लीला मंचित की जानी चाहिए और आपके द्वारा मंचित की जानी वाली रामलीला में मंचन करने वाले किरदारों/पात्रों में वो बात होनी चाहिए कि राम भक्त स्वयं राम की लीला को देखने राम के दरबार में उपस्थित हो जैसे कि पूर्व में सूबे के घर-गांवों में देखा जाता था, क्योंकि राम के भक्त सिर्फ राम की लीला देखने आते हैं न कि किसी बाहर से बुलाए गये गायककार के गाने सुनने। अगर कोई गाने सुनने आते हैं तो इसका मतलब ये है कि वे लोग राम की भक्ति के प्रति तटस्थ नहीं है, बल्कि वे राम के दरबार में तमाशा चाहते हैं, सीटी बजाना चाहते और नृत्य के साथ हल्ला करना चाहते हैं। क्या कभी ऐसा हो सकता है कि तुरंत हल्ला नाचगान के बाद व्यक्ति अपनी इंद्रियों को बस में करके सीधे राम के मंचन को या किसी शांत माहौल में बैठे?? नहीं। मुझे लगता है कि बैठने के बाद भी व्यक्ति तन-मन मात्राओं से बहुत देर तक उसी माहौल में डूबा रहता है।

             अतः रामलीला कमेटी के द्वारा गायककार को सम्भवतः इसलिए भी बुलाया जाता होगा, क्योंकि वे यह भी जान चुके होते हैं कि राम की लीला करने में हमारे सारे किरदार/पात्र असफल हैं और साथ ही हम राम के प्रति भी तटस्थ नहीं हैं बल्कि हम सिर्फ भीड़ और पैसे के प्रति तटस्थ हैं। इसलिए भी रामलीला कमेटी भीड़ जुटाने के लिए राम के दरबार में किसी गायककार/ नाटककार को आमंत्रित करते हैं।

                मैं अभी कुछ दिन पूर्व चमोली जिले के एक छोटे से कस्बे ‘मैठाणा’ में राम की लीला देखने गया था, जहां वर्ष 1961 से राम की लीला संस्कृत भाषा में मंचित की जा रही है। मैंने उस दिन अंगद और रावण के संवाद को संस्कृत भाषा में इतनी सहजता से देखा और यह भी देखा कि संस्कृत भाषा से अंजान लोग भी एक टकटकी लगाए हुए राम की लीला के कथोपकथन को सुन व देख रहे थे और तत्पश्चात भीड़ से ‘अद्भुत’ की आवाज और तालियों की गडगडाहट सुनाई दे रही थी। सभी रामभक्त अन्त तक राम की लीला का आनन्द ले रहे थे और सबसे अद्भुत बात कि मैठाणा की रामलीला में सिर्फ राम की लीला ही दिखाई गई न कि कोई गायककार या कोई भाषण। बस उस दिन दरबार में सिर्फ राम ही राम सुनाई दे रहा था। यहाँ तक कि अतिथि के रूप में भी किसी स्वामी जी को आमंत्रित किया गया था, जिस स्वामी के राम के प्रति जो बोल थे। उन बोलों ने भी राम के दरबार में चार चाँद लगा दिए।

           उस दिन जब मैं अक्षत् नाट्य संस्था के निर्देशक श्री विजय वशिष्ठ व अन्य कलाकारों के साथ गोपेश्वर से मैठाणा के लिए जा रहा था। तब मेरे मन में बस यही प्रश्न उठ रहा था कि छोटा सा कस्बा है।

         अतः राम के भक्तों की संख्या भी कम ही होगी, पर जब मैं वहां पहुंचा, तो देखा कि पूरा राम दरबार, दूर-दराज के गांव से आये राम भक्तों से खचाखच भरा हुआ था। तत्पश्चात रामलीला का मंचन देखने पर एहसास हुआ कि बड़े-बडे शहरों की रामलीला इस रामलीला के सामने फीकी है। दरबार में बैठकर राम की पवित्रता का एहसास हो रहा था। पात्रों के परिपक्व अभिनय और संवाद अदायगी ने उस दिन राम भक्तों के दिलों पर राज कर दिया। ऐसी रामलीला के प्रति मैं हमेशा से तटस्थ हूं और चाहता हूं कि ऐसे ही संस्कारपूर्ण मंनोरंजन से हर गांव में सामाजिक समरसता बनाई जाए।

                यहाँ एक बात फिर लिखूंगा कि मैठाणा की रामलीला का साउण्ड अच्छा था या बुरा??? पर इतना जरूर कहना चाहूंगा कि वहां के साउण्ड सिस्टम की ध्वनि इतनी तेज नहीं की गई थी कि ध्वनि प्रदूषण का माहौल बने, क्योंकि सूबे के बहुत से शहरों की रामलीला के साउण्ड सिस्टम की ध्वनि ने विद्यार्थी जीवन को क्षुब्ध करके रखा है। मुझे लगता है कि साउण्ड उतना ही होना चाहिए, जिससे कि लोगों का सुख चैन पर असर न पडें। भले ही हम विकास के दौर में क्यों न खडे हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रामलीला उस दौर से मंचित होती है, जब घर-गांवों में बिजली नहीं हुआ करती थी और तब रामलीला दरबार के दोनों ओर पेट्रोमैक्स रखकर रामलीला का मंचन किया जाता था। तब भी लोग घर-गांवों में कार्तिक माह के कामों से थके होने के बावजूद भी राम की लीला देखने आते थे और पात्रों के अभिनय पर खूब तालियां और वाहवाहियां करते थे न कि आज के दौर की तरह पात्र/किरदारों के अभिनय पर राम के भक्तों से ताली व पैंसे दोनों मांगनी पडती है। आपके पात्रों में अदाकारी की वो बात झलकनी चाहिए अथार्त आपके किरदार में वो बात होनी चाहिए कि मूक व मंत्रमुग्ध अवस्था में बैठे दर्शक खुद ताली बजाने के लिए विवश हो उठे।

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