भीमल के डंडे से रेशे निकालकर रस्सी बनाने की प्रक्रिया हुई विलुप्त..

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भीमल के डंडे से रेशे निकालकर रस्सी बनाने की प्रक्रिया हुई विलुप्त :- डॉ० दीपक सिंह

            चमोली। ये जो पानी में लकड़ियां नजर आ रही है ये आज की पीढ़ी के लिए एक नई बात भले ही हो, लेकिन 25-30 साल से ऊपर के लोगों की यादें इसे देख के यकीनन ताज़ा हो जायेगी।

           भीमल की टहनियों से जानवरों के लिए चारा (पत्तियां) निकालने के बाद ये डंडे/बलैठ से छाल निकाला जाता था और फिर छाल से रस्सियां बनाई जाती थी, जिसके लिए खड्ड तालाब में 2 से 3 महीने पानी में पत्थर से दबा कर रखा जाता था और उसके बाद इसकी छाल निकाल के रस्सियां बनाई जाती थी, जोकि काफी मजबूत होती है। इस छाल को ‘स्योऊ’ कहते थे। उसी छाल से उन दौरान स्कूली छात्र-छात्राएँ स्कूल की वार्षिक परीक्षा में कृषि प्रयोगात्मक परीक्षा में रस्सी बनाकर ले जाते थे।

           छाल निकालने के बाद जो लकड़ी बच जाती थी उसे आग जलाने में प्रयोग में लाया जाता था, क्योंकि वे लकड़ियाँ आग जल्दी पकड़ती थी, जिसे स्थानीय भाषा में ‘दौऊई’ कहते थे।

          मार्च-अप्रैल महीने में ग्रामीण भीमल के डंडे की गठरी बांधकर गधेरे में बने तालाब में डालते थे, जो प्रक्रिया अब विलुप्त के कगार पर पहुंच चुकी है।

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