फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ पर दो टूक कि अब आगे क्या ??? … लेख:- विभा पोखरियाल

फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ पर दो टूक कि अब आगे क्या ???  … लेख:- विभा पोखरियाल
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फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ पर दो टूक कि अब आगे क्या ??? … लेख:- विभा पोखरियाल।

      गोपेश्वर पिक्चर भी बन गई , रोना -पीटना, दोषारोपण का खेल भी हो गया ,पैसे बनाने वालों ने पैसे भी बना लिए ,किसी के जख्म खुद गए , राजनीतिक दलों ने फिर से मौकापरस्ती कर ली, आपको क्या मिला???

विचारणीय!!!!
                    क्या कुछ समय बाद आप पूछना चाहेंगे , कि धर्म के ठेकेदारों ने या सरकार ने, कश्मीरी पंडितों का दर्द कम करने के लिए क्या कदम उठाए हैं???
क्या उनको उनका घर पुनः प्राप्त हो सकेगा, क्या उनके जख्म कभी भर पाएंगे?????
नहीं, हमेशा की भांति रोमांच से भरपूर यह अनुभव भी आपके लिए इतिहास बनकर रह जाएगा बिल्कुल उसी तरह जो 1990 में कश्मीर में हुआ था ।प्रश्न उठता है कि क्या हमारी संवेदनशीलता इतनी गई गुजरी हो गई है कि हमें एकजुट होने के लिए इतना बड़ा नरसंहार अपने बच्चों को दिखाना पड़े।
सभी लोग अपने घर में इस बात पर चर्चा अवश्य करें ,चर्चा करें कि पिक्चर देखना उनकी कौन सी इन्द्री को तृप्त कर गया। प्रश्न यह भी पूछिये कि देश के प्रत्येक कोने में जो बलात्कार और निंदनीय घटनाएं रोज घट रही है उनका दर्द भी क्या इसी सिद्दत से आपके जेहन में रहता है या रोज घट रही राक्षसी घटनाक्रम अखबार की एक खबर मात्र है???
       

       प्रश्न यह नहीं है कि कहां क्या हो रहा है या कहां क्या हुआ था प्रश्न यह है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं। अगर देश का हर नागरिक इतना देशभक्ति से परिपूर्ण हो गया है तो फिर क्यों समाचार पत्र पढ़ने का मन नहीं करता ?क्यों ऐसी घटनाएं रोज न्यूज़ हेडलाइंस में होती है जिन्हें देखकर मानवता शर्मसार हो रही है? समय चीजों को समझने का है मैं पुनः अपनी बात पर अडिग हूं कि मरते हुक्मरान नहीं है ,मरता आम आदमी है।

इसलिये अपने आसपास अच्छा माहौल बनाए रखें, मानव धर्म को महत्व दें ना कि जाति धर्म को। शिक्षा को महत्व दें। राजनीतिक दलों की कठपुतली ना बने। आपकी लड़ाई सिर्फ अपने तक नहीं है । आगे जिनको हमने पैदा किया है उनको हम कैसा समाज दे रहे हैं उनके लिए भी हमारी जिम्मेदारी है। खून खराबे से युक्त फिल्में दिखाने से बच्चों की संवेदनशीलता खत्म होती है, वे उग्र हो सकते हैं, उनका मानवता से विश्वास ही उठ सकता है।
          हम इतिहास के जिस कालखंड में जी रहे हैं यह शायद मानव सभ्यता का सबसे सहूलियत भरा समय है जहां भीख मांग कर ही सही, सब के पेट भरे हुए हैं। 60 % जनता धनकुबेर बनी घूम रही है ।ऐसा इतिहास में कभी नहीं हुआ। मानव जीवन संघर्ष पूर्ण रहा है। लेकिन, अपनी सभ्यता को इस तरह से नष्ट करने का यह पहला दौर प्रतीत होता है जहां चंद लोग अपनी रोटी सेकने के लिए आम जनता की बलि चढ़ाए जा रहे हैं ।राजतंत्र में दासता की कहानियां थी लोग अन्न लिए तड़पते थे लेकिन वर्तमान समय अपने आपको स्वयं को खत्म करने का प्रतीत होता है। आप फिल्में देखें लेकिन विचार करें कि क्या आप अपने बच्चों के लिए ऐसे ही मनोरंजन का साधन ढूंढ रहे थे।

       धिक्कार है हम पर ! मानवीय संवेदनाओं को जगाने के लिए हमें अपने बच्चों को वह फिल्में दिखानी पड़ रही हैं जो किसी को भी मानसिक रूप से पागल करने के लिए काफी है। समझिए, आतंकवादी भी हमारे बीच से ही निकले हैं। फिर इस समस्या का समाधान भी हमारे बीच ही मौजूद होगा। मुझे तो लगता है जानबूझकर समाधान नहीं ढूंढें जाते हैं ।आम नागरिकों का खून पीने के लिए वह चंद खूनी लोग जो अपने स्वार्थ के लिए अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए हर रोज बलि दे रहे हैं, कभी कश्मीर में तो कभी बंगाल में तो, कभी कहीं, कभी यहां, तो कभी वहां, हमें समझना होगा लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करना होगा, नहीं तो हर शहर कश्मीर बनने को तैयार मिलेगा ।

        लेकिन मानवता के पक्षधर अपने आसपास एक ऐसा माहौल बनाए जिसमें सिर्फ मानवता ही एकमात्र धर्म हो, ना कोई हिंदू ना कोई मुस्लिम ना कोई और ।बुराई हो तो केवल आतंकवाद जिस से लड़ने के लिए हम सब एकजुट होकर आगे आएं। चाहे वह कोई भी हो बुराई को उसके अंजाम तक पहुंचा कर ही छोड़ें।

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