मैं कल तो छोड़ दूँगा गाँव, लेकिन मेरा यह गाँव हमेशा रह जायेगा मुझमें…😢

मैं कल तो छोड़ दूँगा गाँव, लेकिन मेरा यह गाँव हमेशा रह जायेगा मुझमें…😢
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      ‘जिकुड़ी’ में दबे पाँव चले आता है मेरा ‘गाँव’ ….

चलो छोड़ चले ये शहर की रौनकें,
चलो अब अपने-अपने गाँव चलते हैं।
क्योंकि
अब मन नहीं लगता कूलर, पंखा, एसी में….
हमारी तो जान बसती है
अपने पुंगड़ों व छज्जों की ठंडी-ठंडी हवाओं में…

अतः नहीं चाहिए हमें ये सुख-सुविधाएं
क्योंकि यहाँ जो रहते हैं वे अपनों से दूर रहते हैं……
हमें तो गाँव के वे संस्कार ही प्यारे लगते हैं
जहाँ गैरों से भी हम प्यार से मिलते हैं....

अब तो मेरी आँखें जलने लगी हैं
इन संगमरमर की दीवार व बल्बों की रोशनी में…..
क्योंकि हमारी जिंदगी तो कमेडु और लाल मिट्टी की दीवारों पर स्थित चिमनी में ही न्यारी थी…
जहाँ हमनें ना जाने बचपन की कितनी
अनमोल यादों को सहेज रखे हैं
इसलिए
एक बार फिर चलो चलते हैं अपने पैतृक गाँव
जहाँ होती है मस्ती और ज्ञान की बात
हर शाम बुजुर्गों के साथ….

शोरगुल से कई मीलों दूर
  चलो गाँव चलते हैं….
  सुकून के पास चलते हैं
   चलो गाँव चलते हैं….

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