अक्षत् नाट्य संस्था द्वारा दी गई वी.सी साहब की 72वीं पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रंद्धाजलि.…

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अक्षत् नाट्य संस्था द्वारा दी गई वी.सी साहब की 72वीं पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रंद्धाजलि.…

      चमोलीआज 24 जून को अक्षत नाट्य संस्था गोपेश्वर के प्रेक्षागृह में पर्यावरण मित्र श्रीमान मंगला प्रसाद कोठियाल व अक्षत नाट्य संस्था गोपेश्वर के संयुक्त तत्वावधान में प्रथम विक्टोरिया क्रॉस विजेता श्री दरवान सिंह नेगी जी की 72वीं पुण्यतिथि पर याद करके उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई।
       इस अवसर पर वीसी साहब की फ़ोटो पर पुष्प अर्पित कर उनके प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दी गई शहादत को याद कर नमन् किया गया। तत्पश्चात कार्यक्रम में उपस्थित सभी बुद्धजीवियों ने एक के बाद एक ने वीसी साहब की पुण्यतिथि पर समाज के वर्तमान दौर और तत्कालीन दौर के माहौल पर सूक्ष्म ज्ञान प्रेषित किया। इस कार्यक्रम में श्री मंगला प्रसाद कोठियाल, श्री विजय वशिष्ठ, श्री दीवान सिंह नेगी व गोपेश्वर नगर के भविष्य अर्थात छात्र-छात्राएं आदि उपस्थित रहें।

विक्टोरिया क्रॉस वीसी साहब–

प्रथम विश्वयुद्ध में दुनियाभर की फौजें शामिल थीं, लेकिन इनमें भारतीय सैनिकों के साहस और वीरता ने पूरी दुनिया में एक अलग छाप छोड़ी। यही वजह थी कि जब फ्रांस में ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियों के बीच दीवार बनी जर्मन सेना को कोई हिला नहीं पा रहा था, तब गढ़वाल के नायक दरवान सिंह नेगी के नेतृत्व वाली ब्रिटिश-भारतीय सेना ने रातोंरात इस दीवार को ढहा दिया। इस अप्रतिम विजय के लिए ब्रिटेन के किंग जॉर्ज ने स्वयं रणभूमि में जाकर उन्हें विक्टोरिया क्रॉस दिया था। वह इस वीरता पुरस्कार को पाने वाले पहले भारतीय थे।
दरवान सिंह का जन्म 4 मार्च 1883 को कफाडतीर गांव (वर्तमान में यह उत्तराखंड के चमोली जनपद में है) में हुआ था। अगस्त 1914 में भारत से 1/39 गढ़वाल और 2/49 गढ़वाल राइफल्स की दो बटालियन को प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा लेने भेजा गया। अक्टूबर 1914 में दोनो बटालियन फ्रांस पहुंची। वहां भीषण ठंड में दोनों बटालियन को जर्मनी के कब्जे वाले फ्रांस के हिस्से को खाली कराने का लक्ष्य दिया गया। इस इलाके में जर्मन सेनाओं के कब्जे के चलते ग्रेट ब्रिटेन के नेतृत्व वाली दो सैन्य टुकड़ियां आपस में नहीं मिल पा रही थीं। नायक दरवान सिंह नेगी के नेतृत्व में 1/39 गढ़वाल राइफल्स ने 23 और 24 नवंबर 1914 की मध्यरात्रि हमला कर जर्मनी से सुबह होने तक पूरा इलाका मुक्त करा लिया।

इस युद्ध में दरवान सिंह नेगी के अदम्य साहस से प्रभावित होकर किंग जार्ज पंचम ने सात दिसंबर 1914 को जारी हुए गजट से दो दिन पहले पांच दिसंबर 1914 को ही युद्ध के मैदान में पहुंचकर नायक दरवान सिंह नेगी को विक्टोरिया क्रॉस प्रदान किया था। नायक दरवान सिंह नेगी की वीरता के चलते गढ़वाल राइफल्स को बैटल आफ फेस्टूवर्ट इन फ्रांस का खिताब दिया गया (इसकी याद में उत्तराखंड के लैंसडाउन में स्थापित मुख्यालय में एक संग्रहालय बनाया गया है)। विक्टोरिया क्रॉस सम्मान मिलने के बाद जब अंग्रेजी प्रशासन ने दरवान सिंह नेगी से कुछ मांगने को कहा, तो उन्होंने गढ़वाल मंडल के कर्णप्रयाग में एक इंग्लिश मीडियम स्कूल की स्थापना करने और ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन बिछवाने की इच्छा जताई। उस वक्त गढ़वाल राइफल्स की दोनों बटालियन की 87 फीसद आबादी इन इलाकों से आती थी। 1915 में नायक दरवान सिंह आफिसर बनाए गए। उनको जमादार पद मिला। साथ ही उनके कमीशंड होने का प्रमाणपत्र भी जारी किया गया। 1918 में दरवान सिंह की मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने कर्णप्रयाग मिडल स्कूल की स्थापना की। (अब उत्तराखंड सरकार ने इसे इंटर तक कर दिया है। वर्तमान में इसका नाम वीरचक्र दरवान सिंह राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज है) वहीं, 1918 से 1924 तक रेलवे लाइन बिछाने का सर्वे भी अंग्रेजों ने किया। हालांकि तब जमीन की कमी के कारण यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका। 1924 में उन्होंने समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। 24 जून 1950 को 70 वर्ष की आयु में दरवान सिंह नेगी की मृत्यु हुई।

उनके तीन बेटे थे। उनके बड़े बेटे पृथ्वी सिंह नेगी उत्तराखंड में एडीएम पद पर थे (उनका देहांत भी हो चुका है)। दूसरे बेटे डॉ. दलबीर सिंह नेगी अमेरिका के स्टेनफर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट में हैं। जबकि छोटे बेटे कर्नल बीएस नेगी हैं। कर्नल नेगी को गढ़वाल राइफल्स में 1964 में कमीशन मिला था, जिसमें दरवान सिंह नेगी थे। वर्तमान में दरवान सिंह नेगी के पौत्र कर्नल नितिन नेगी को भी 1994 में गढ़वाल रेजीमेंट में कमीशंड किया गया।

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  1. महत्वपूर्ण जानकारी के लिए सादर 🙏

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